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Adab O Saqafat

दुश्मनों को भी सोशल मिडिया पर गाली ना दें: ओवैसी की मुस्लमानों से अपील

नई दिल्ली : AIMIM के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी का इन दिनों एक अपील सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. उनके किसी चाहने वाले ने नेशनल एमआईएम न्यूज़ पेज पर पोस्ट किया है। जो उस ने पोस्ट लगा रखा है वह इस प्रकार है ने भारत के सभी मुसलमान भाइयो …

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सभी के लिये कम से कम 18000  रुपये तनख्वाह किये जायें : CITU

नयी दिल्ली: मरकज़ी लेबर तंज़ीम सीटू ने ठेका मजदूरों के दस्तूरुल अमल के मसौदे की तन्क़ीद की है जिसमें मुआहिदे पर काम करने वाले मुलाज़िम के लिये तनख्वाह 10,000 रुपये कम से कम करने समेत दीगर तजवीज किये गये हैं।  ट्रेड यूनियन ने सभी के लिये कम से कम तनख्वाह …

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अब वही हर्फ़-ए-जुनूं सबकी ज़बां ठहरी है… (फ़ैज़)

अब वही हर्फ़-ए-जुनूं सबकी ज़बां ठहरी है जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है आते आते यूं ही दम भर को रुकी होगी बयार जाते जाते यूं ही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है वस्ल की शब् थी तो किस दर्जा सुबुक़ गुज़री थी, हिज्र की शब् …

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“अदम-बर्दाश्त” माहौल के खिलाफ़ मराठी सहाफ़ी ने भी लौटाया अवार्ड

“अदम-बर्दाश्त” माहौल के खिलाफ़ मराठी सहाफ़ी  ने भी लौटाया अवार्ड

प्रमोद मुन्घते ने आज कहा कि उन्होंने महाराष्ट्र की सरकार का अवार्ड और उसकी इनामी रक़म 10000 रूपये लौटा दी है, मुन्घते आर एस टी एम नागपुर यूनिवर्सिटी में मराठी के प्रोफेसर हैं. उन्होंने ये अवार्ड मुल्क में बढ़ रहे “अदम-बर्दाश्त ” के माहौल के खिलाफ़ लौटाया . प्रोफेसर मुन्घते …

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`पोस्टमॉर्टम’

`पोस्टमॉर्टम’

एनाउन्सर स्टेज पर आकर कुछ बोलना शुरू करता है तो लगता है कि वह ड्रामे का तआरुफ दे रहा है और जल्द ही ड्रामा शुरू होगा, लेकिन दर असल ड्रामा शुरू हो चुका होता है। एक एक फ़नकार को स्टेज पर बुला कर उसका तआरुफ देना ड्रामे के पहले या बाद में

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फूलबन

फूलबन

अंग्रेज़ी दानिश्वर इशपन्गलर कहता है:जब अक़वाम रुहानी क़ुव्वत और अहम तहज़ीबी इक़दार की इशाअत के फ़रीज़े से बेनयाज़ होकर महज़ माद्दी जरूरतों और आसाइशों के लिए वक़्फ़ होजाएं तो इन में दूसरों को मुतास्सिर करने की सलाहियत कम हो जाती है और

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‘ए टेल आफ़ शेकन फ़ेथ ‘

‘ए टेल आफ़ शेकन फ़ेथ ‘

ए टेल आफ़ शेकन फ़ेथ (मुतज़लज़ल एतिमाद की कहानी) के ज़रिये ब्रीगेडीयर मनमोहन शर्मा ने फ़ौज में पाई जाने वाली बदउनवानियों और अक़रबा परवरी से पर्दा उठाने की कामियाब कोशिश की है।

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मुझ को भी पढ़ किताब हूँ मज़मून ख़ास हूँ

मुझ को भी पढ़ किताब हूँ मज़मून ख़ास हूँ

सब से पहले में क़ारईन को एक ज़िंदा ज़बान की हरकियाती ख़ुसूसीयात के बारे में चंद अहम असरी मालूमात पहुंचाना चाहूंगा ताकि उर्दू के असातिज़ा इस पर ग़ौर करें । ये ज़बान ज़ाहिर है अंग्रेज़ी के सिवा और कोई दूसरी हो नहीं सकती। अंग्रेज़ी ज़बान की क़दी

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अपना अंदर बदलईए

अपना अंदर बदलईए

अगर अंडे को बाहर से तोड़ा जाये तो...ज़िंदगी दम तोड़ देती है> जबकि अंडा अंदर से टूटे तो..ज़िंदगी जन्म लेती है। मुसबत तबदीली हमेशा अंदर से पैदा होती है। अपना अंदर बदलईए। नामालूम

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इंसान और इंसानियत

इंसान और इंसानियत

एक इंसान दूसरे इंसान से मायूस हो सकता है लेकिन...इंसानियत से मायूस नहीं होना चाहिए। इस लिए कि इंसान सिर्फ़ ज़मीन में सांस लेता है...और इंसानियत ज़मानों में ज़िंदा है। {जोन ईलिया}

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ग़ज़ल क्या है

ग़ज़ल क्या है

ग़ज़ल के मुतअतिलक इज़हारे ख्याल करते हुये एक मौ़के पर मैंने कहा था ग़ज़ल इन्तेहाओं का एक सिलसिला है. यानि हयात व क़ायनात के वो मरकज़ी हक़ायक जो इन्सानी जि़न्दगी केा ज्यादाह से ज्यादह मुतास्सिर करते हैं.

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जड़ें

जड़ें

सबके चेहरे उड़े हुए थे। घर में खाना तक न पका था। आज छठा दिन था। बच्चे स्कूल छोड़े, घर में बैठे, अपनी और सारे खानदान की जिंदगी मुहाल कर रहे थ।.

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सब ग़ुलाम

सब ग़ुलाम

जैसे ही उसकी आँख खुली, उसे शॉक-सा लगा। रेलवे प्लेट फार्म की बैंच पर लेटे-लेटे पता नहीं उसकी आंख कैसे लग गयी थी। हालाँकि उसका हाथ जेब पर ही था, लेकिन उसे पता नहीं चल पाया कि यह कैसे हुआ। उसे लगा कि उसकी जेब से पर्स ग़ायब हो गया है। इस हसा

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दो बदन एक जान

दो बदन एक जान

गली के नुक्कड पर मुश्किल से आठ दस लोग ख़ड़े ह़ैं, लेकिन जैसे ही मर्फा (अरबी बाजा) बजना शुरू हुआ, शादी के घर में से कई लोग बाहर निकल आये। अब्दुल्लाह, अल हबीब, अबूद और अकबर मर्फे के बाजों पर हल्के से हाथ फिरा रहे है।

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पिदरी ज़बान

पिदरी ज़बान

जोश ने पाकिस्तान में एक बहुत बड़े वज़ीर को उर्दू में ख़त लिखा। इस का जवाब वज़ीर ने अंग्रेज़ी में दिया।

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ऐसी तो …

ऐसी तो …

सहारनपुर में ईदन एक गाने वाली थी, बड़ी बाज़ौक़, सुख़न फ़हम और सलीक़ा शआर, शहर के अक्सर ज़ी इल्म और मोअज़्ज़िज़ीन उसके यहाँ चले जाया करते थे।

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पूछरइं और कड़कड़ारइं सब जने

पूछरइं और कड़कड़ारइं  सब जने

फिर से सूली पो चढारइं सब जने दूसरी शादी करारइं सब जने क्या करा, बस उनकी गली में गया एक सुर में करकरारइं सब जने ख़ाब में होती थी ऐसी कैफ़ियत अब तो दिन में बड़बड़ारइं सब जने जब से जद्दे को गया बेटा मेरा घर को मेरे आरइं सब जने

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हुए तुम दोस्त

हुए तुम दोस्त

इस तरह कर रहा है हक़-ए-दोस्ती अदा उसका ख़ुलूस है मुझे हैरां किए हुए मुद्दत से है अनाज का दुश्मन बना हुआ मुदत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए

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