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Adab O Saqafat

ईद उल फ़ितर.. नज़ीर अकबराबादी की जुबान में

ईद उल फ़ितर.. नज़ीर अकबराबादी की जुबान में

है आबिदों को त‘अत-ओ-तजरीद की ख़ुशी और ज़ाहिदों को जुहाद की तमहीद की ख़ुशी रिन्द आशिकों को है कई उम्मीद की ख़ुशी कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी ऐसी न शब-ए-बरात न बक़रीद की ख़ुशी जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

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शीशा व‌ तीशा

शीशा व‌ तीशा

असरी तरक़्क़ी ! मालकिन ने नौकरानी को डाँटते हुए कहा : तुम तीन दिन से काम पे नहीं आई, और बताया भी नहीं? नौकरानी : बाजी मैंने तो फेसबुक पर इस्टेट्स अपडेट कर दिया था कि आई ऐम गोइंग टू गावं फ़ार थ्री डेज़ साहिब जी ने इस पर कमेन्ट भी किया था

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कुत्ते

कुत्ते

पतरस बुख़ारी इलम अलहिवा नात के प्रोफेसरों से पूछा। सल्लू तिरियों से दरयाफ़त किया। ख़ुद सर खपाते रहे। लेकिन कभी समझ में ना आया कि आख़िर कुत्तों का फ़ायदा किया है?

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उर्दू क्या है? एक कोठे की तवायफ है !

उर्दू क्या है? एक कोठे की तवायफ है !

खुशवंत सिंह - उर्दू का मुक़द्दर दो पड़ोसी मुल्कों में एक के बाद एक, दो दिनों में तै किया गया. 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में, जब इस ने ख़ुद को एक ख़ुदमुख़तार, आज़ाद मुस्लिम जमहूरीया क़रार दे दिया.

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बेकारी……. ……शौकत थानवी

बेकारी……. ……शौकत थानवी

बेकारी यानी बेरोज़गारी इस एतबार से तो निहायत लाजवाब चीज़ है कि हर छोटी से छोटी हैसियत का इंसान अपने घर में तमाम दुनिया से बेनयाज़ हो कर इस तरह रहता है कि एक शहनशाहे हफ़त अक़लीम(सारी दुनिया) को अपने महल में वो फ़ारिगुलबाली नसीब नहीं हो सकत

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कुछ ग़लत-उल-आम अलफ़ाज़ के बारे में

कुछ ग़लत-उल-आम अलफ़ाज़ के बारे में

(साबिर अली सिवानी)... दुनिया की किसी भी ज़ुबान पर क़ुदरत हासिल करना निहायत मुश्किल अमर होता है। अगर कोई शख़्स ये दावा करता है कि उसे मुख़्तलिफ ज़ुबानों पर उबूर हासिल है, तो वो कहीं ना कहीं मुबालग़े से काम लेता है।

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जूता-

जूता-

निदा फ़ाज़ली........ जूता इंसान और ज़मीनी रिश्ते के बदलते दौर की तारीख़ का बयानिया है। सर्दी से बचने के लिए रूई , ऊन और जानवरों की खालें वजूद में आईं।

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न्यूज़िलैंड में बैनुल अ़कवामी मुशायरा

न्यूज़िलैंड में बैनुल अ़कवामी मुशायरा

उर्दू हिन्दी असोसिएशन न्यूज़िलैंड की जानिब से बैनुल अ़कवामी (अंतर्राष्ट्रीय) मुशायरा कवि सम्मेलन हुआ। इस त़करीब में साज़ पर ग़ज़लें भी पेश की गयीं।

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वो ….. (वली तनवीर का अफ़साना )

वो ….. (वली  तनवीर का अफ़साना )

मर्कज़ी कुतुबख़ाने की बुलंद-ओ-बाला इमारत के ज़ीनों से उतरते हुए मेरे क़दम निढाल थे और दिल में एक सोज़-ओ- गुदाज़ की दुनिया सी आबाद थी। सुबह के दस बजे से उस वक़्त तक मैं एक पुरासरार नावेल का मुताला करता रहा था, जिसमें एक तिश्नाकाम (प्यासी) और न

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कुछ काम करो

कुछ काम करो

एक नौजवान किसी से मिलने जाता है। उस से पूछा जाता है: आप क्या करते हैं? वो कहता है: शायरी। सवाल फिर पूछा जाता है: काम क्या करते हो? जवाब मिलता है: यही मेरा काम है। सवाल करने वाला कहता है: जाओ, कुछ काम करो।

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अदबी लतीफ़े

अदबी लतीफ़े

एक महफ़िल में मौलाना आज़ाद और मौलाना ज़फ़र अली ख़ान हाज़िर थे। मौलाना आज़ाद को प्यास महसूस हुई तो एक बुज़ुर्ग जल्दी से पानी का हयूला ले आए। मौलाना आज़ाद ने हंस कर इरशाद किया- ले के इक पैर-ए-मुग़ां हाथ में मीना, आया

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फिर वो कौन था जो इतनी देर बोलता रहा

फिर वो कौन था जो इतनी देर बोलता रहा

कायनात में सबसे अहम जितनी चीज़ें हैं, उनमें से सांसों के बाद अगर कोई सब से ज़रूरी चीज़ है तो वह..लफ़्ज़ है, लेकिन कभी-कभी एक और चीज़ उस पर भारी पड़ जाती है और वह है ख़ामोशी। किसी ने शायरी के बारे में कहा है कि यह दो लफ़्ज़ों के बीच की ख़ाली

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