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अज़दवाजी ज़िंदगी का बेशतर हिस्सा पुलिस स्टेशन और अदालती कार्रवाई की नज़र

ख़ुसूसी रिपोर्ट हैदराबाद 20 दिसंबर मज़हब-ए-इस्लाम ने हुक़ूक़ उल-ईबाद और फ़राइज़ की बाहमी अदाइगी का जितना मोतदिल ,ख़ूबसूरत और मेयारी अमली नमूना पेश कियाहै ,दुनिया का कोई मज़हब इसकी मिसाल पेश नहीं करसकता। आज मग़रिबी मुआशरा माद्दी

ख़ुसूसी रिपोर्ट हैदराबाद 20 दिसंबर मज़हब-ए-इस्लाम ने हुक़ूक़ उल-ईबाद और फ़राइज़ की बाहमी अदाइगी का जितना मोतदिल ,ख़ूबसूरत और मेयारी अमली नमूना पेश कियाहै ,दुनिया का कोई मज़हब इसकी मिसाल पेश नहीं करसकता। आज मग़रिबी मुआशरा माद्दी तरक़्क़ी की वजह से मुहज़्ज़ब मुआशरती निज़ाम का दावेदार है लेकिन इंसानी रिश्तों के तक़द्दुस में वो इस्लामी मेयार के किसी हद को भी नहीं पहुंच सका। मगर इस रोशन तरीन हक़ीक़त के बावजूद ये भी एक तल्ख़ हक़ीक़त है कि हुक़ूक़ उल-ईबाद के इस्लामी उसूलों से सब से ज़्यादा इन्हिराफ़ अब इसी मज़हब के पैरौ कार कररहे हैं ।

आज हैदराबाद का शायद ही कोई ऐसा मुहल्ला हो जहां ख़ानदानों के दरमयान एक दूसरे से रंजिश ओर गिला ना हो । मगर इन शिकवों और रंजिशों की वजह से रिश्तों की मज़बूत दीवारों में जो दराड़ें पड़ रही हैं इस से पूरा ख़ानदान ज़हनी करब में मुबतला होरहा है … दरअसल इन तमाम इख़तिलाफ़ात ,झगड़े और रंजिश की वजह है , हुक़ूक़ उल-ईबाद से रुगरदानी और उसकी पामाली ।

चूँकि हुक़ूक़ की पामाली से ही रिश्तों के बंधन में कमज़ोरी और फ़साद जन्म लेते हैं। गुज़शतादिनों काले पत्थर ताड़बन के एक मुहल्ले में पेश आए वाक़िया में एक शादी शूदा ख़ातून ने महज़ इस बात पर पुलिस स्टेशन का रुख किया कि उनके शौहर अपनी वालिदा की शहा पर उनके हुक़ूक़ पूरा नहीं कररहा है और घरेलू उमूर में उनकी इज़्ज़त नफ़स का ख़्याल नहीं रखा जाता ,अब ये ख़ातू न इस मसले को डोरी केस 498( A) के ज़रीया अदालत से रुजू करने की तैय्यारी में है । अलमीया ये है कि इस तरह के कई एक ऐसे मुआमलात आए दिन पेश आरहे हैं।

नुमाइंदा सियासत ने इस हवाले से जब शहर के मशहूर ऐडवोकेट मुज़फ़्फ़र उल्लाह ख़ान से बात की तो उन्होंने हुक़ूक़-ए- ज़ौजैन के हवाले से इस्लामी तालिमात पर अदम अमल आवरी और डोरी केस को इसकी बुनियादी वजह क़रार दिया और कहा कि तलाक़ और खुला के बढ़ते हुए वाक़ियात मुस्लिम मुआशरे का एक ऐसा नासूर है जिस पर अगर इजतिमाई तौर पर और फ़ौरी कंट्रोल करने की कोशिश नहीं की गई तो येनासूर धीरे धीरे पूरे मुस्लिम मुआशरे को तबाह कर देगा। बाक़ौल उनके ,तलाक़ या खुला का सबब बने वाले चंद ऐसी छोटी छोटी बातें और मुआमलात होते हैं

जिसे ख़ानदानी सतह पर ही बाहमी इफ़हाम-ओ-तफ़हीम के ज़रीया सुलझाया जा सकता है,मगर शौहर और बीवी से ज़्यादा दोनों ख़ानदानों की अनानीयत मुआमले को मज़ीद उलझाने का सबब बना देती है,और नतीजा पुलिस ,कोर्ट कचहरी का चक्क्र और तलाक़ की सूरत में निकलता है। बताया जाता है कि पूरे शहर में अवसतन हर माह तलाक़ के 100से ज़ाइद वाक़ियात पेश आरहे हैं ।

शहर के वुकला के मुताबिक़ , फ़ौजदारी अदालत में मुस्लमानों की जानिब से जो मुक़द्दमे दायर किए जाते हैं इन में निस्फ़ से ज़ाइद मुक़द्दमात का ताल्लुक़ डोरी केस से होता है, जबकि माबक़ी मुक़द्दमात जायदाद और दीगर तनाज़ों से ताल्लुक़ रखता है । मिस्टर मुज़फ़्फ़र उल्लाह ख़ान ने इस कर्बनाक हक़ीक़त का इन्किशाफ़ किया कि ज़्यादा तर मुआमलात में 498A ऐक्ट का ग़लत इस्तिमाल किया जा रहा है और उमूमन इसके लिए लड़की से ज़्यादा उनकी वालिदा ज़िम्मेदार होती हैं ,अगर कोई वकील उन्हें समझाने की कोशिश करे तो वो किसी और वकील के पास जाने को तरजीह देती हैं मगर जहेज़ हरा सानी केस दायर करने से पीछे हटना गवारा नहीं करतीं।

उन्हों ने कहा कि मुआमला बिगड़ जाने की सूरत में पहले , (1)डोरी केस की जाती है, जो बाद में ( ) तलब-ए- ज़ौजा() नफ़क़ा और फिर() फ़सख़ निकाह तक जुमला चार केसेस तक मुआमला पहुंच जाता है और इस तरह बरसों तक ये केसेस लड़ते लड़ते ना सिर्फ मियां बीवी बल्कि दोनों ख़ानदान तबाही-ओ-बर्बादी का शिकार हो जाते हैं। उन्होने अपने तजुर्बे की रोशनी में बताया कि ज़्यादा तर मुआमलात में ख़वातीन की जानिब से ही तलाक़ और खुला के मुतालिबात सामने आते हैं,जो अपने ससुराली रिश्तेदारों और शौहरों की जानिब से नजरअंदाज़ कर दिए जाने ,जहेज़ के हवाले से ताना व तशनीअ , फ़रीक़ैन के मिज़ाज में हम आहंगी का फ़ुक़दान और अज़दवाजी हुक़ूक़ की अदम तकमीलके बाइस , अपने शौहरों को सबक़ सिखाने का फ़ैसला करलेती हैं,या ऐसा करने पर मजबूर कर दी जाती हैं।

जहेज़ हरासानी के बढ़ते हुए केसेस और तलाक़ के मुआमलात पर मुज़्तरिब शहरीयों का ख़्याल है कि मुख़्तलिफ़ शोबा हाय ज़िंदगी से ताल्लुक़ रखने वाले समाज के बाअसर शख़्सियात की जानिब से इलाक़ाई सतह पर एक ताक़तवर कौंसलिंग सैंटर क़ायम किया जाय जो इस तरह के मुआमलात को पुलिस स्टेशन या अदालत पहुंचने से पहले ही इफ़हाम व तफ़हीम के ज़रीया सुलझाने की सलाहीयत रखता हो। इसके इलावा दीनी इजतिमाआत , और इस्लाही सेमिनार के ज़रीया भी हुक़ूक़ ज़ौजैन के हवाले से शऊर बेदार करने की सख़्त ज़रूरत है।इन इक़दामात के ज़रीया मुस्लिम मुआशरे में तलाक़ और खुला के बढ़ते हुए वाक़ियात को ख़तम ना सही कम ज़रूर किया जा सकता है।

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