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अब्दुल कलाम पर पथराव करने वाला किसान गम में छोड़ा दाना-पानी

बिहारशरीफ : एक वाकया साबिक़ सदर ए जमहुरिया एपीजे अब्दुल कलाम के साथ नालंदा में वाकेय हुआ था जब इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के संगे बुनियाद तकरीब के दौरान पिलखी गांव के कुछ गाँव वालों ने पथराव कर दिया था।

कलाम साहब के इंतकाल के बाद गांव के बुजुर्ग किसान भोला महतो को उस वारदात की टीस आज भी कचोटती है। उन्होंने पीर रात से ही अनाज और पानी छोड़ दिया है। पुरानी यादों को ताजा करते हुए भोला जज्बाती हो जाते हैं। कलाम साहब नालंदा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी की संगे बुनियाद रखने 8 फरवरी 2008 को यहां आए थे। राजगीर के पिलखी गांव में संगे बुनियाद तकरीब था। प्रो. कलाम यूनिवर्सिटी की सैकड़ों एकड़ जमीन और आसपास की कुदरती खूबसूरती को निहार रहे थे और साथ चल रहे वजीरे आला नीतीश कुमार उन्हें एकवाइर की गई जमीन की चौहद्दी बता रहे थे। इसी दरमियान पिलखी और आसपास के गांव के कुछ लोग नारेबाजी करने लगे, मौके का फायदा उठाकर कुछ लोग रोड़े-पत्थर चलाने लगे।

वजीरे आला समेत पूरा इंतेजामिया अमला सकते में आ गया। जब तक कलाम कुछ समझ पाते, उन्हें संगे बुनियाद मुकाम पर बने टेम्पोरोरी एडोटोरियम में ले जाया गया। इधर, पुलिस ने हल्का फोर्स का इस्तेमाल कर पथराव कर रही भीड़ को खदेड़ दिया। वजीरे आला ने खुद गाँव वालों के दरमियान जाकर उन्हें पुरअमन कराया और तसल्ली दी कि उनकी हर शिकायत दूर की जाएगी। इस वाकिया से निबट कर जैसे ही वजीरे आला कलाम साहब के पास पहुंचे उन्होंने पूछा, व्हाट हैप्पंड, लोग पत्थर क्यों चला रहे हैं? बताया, सर जमीन एकवाइर के बदले मुआवजा नहीं मिल सका है, इस वजह से वे नाराज हैं। कलाम साहब ने फौरन नाराज गाँव वालों से मिलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की।
वजीरे आला की हिदायत पर अफसरों ने पहल कर चार गाँव वालों का एक टीम बनाया और कलाम साहब से मुलाकात कराई। उस टीम में भोला महतो भी थे। उस मुलाकात को याद कर उनकी आंखें भर आई, कहा- कलाम साहब ने बड़े मुहब्बत से हमारी बातें सुनीं और हमलोगों को नालंदा यूनिवर्सिटी की क़याम का इंपोर्टेन्त समझाया। उन्होंने कहा था कि मुस्तकबिल में आपके बच्चे भी यहां आला तालीम हासिल कर सकेंगे। मुल्क और दुनिया के तालिबे इल्म यहां पढ़ने आएंगे, क़दीम नालंदा यूनिवर्सिटी का एजाज वापस लौटेगा। जहां तक जमीन के मुआवजे का सवाल है तो वह भी आपको जल्द मिल जाएगा। ऐसा हुआ भी, मुक़ामी इंतेजामिया ने कैम्प लगाकर बाक़ी बचे तमाम किसानों के दरमियान मुआवजे की रकम बांट दी।

भोला कहते हैं, मुआवजा तो मिल गया, लेकिन कलाम साहब के आने पर कुछ नौजवानों के फसाद की टीस आज भी कचोटती है। जब से टीवी पर उनके इंतेकाल का खबर देखा है, हलक से निवाला नहीं उतर रहा। पीर की रात से अनाज और पानी नहीं लिया है। अब तो उनके सुपुर्दे खाक के बाद ही कुछ खाऊंगा। कलाम साहब ने हम लोगों को इतनी बड़ी सौगात दी कि हमारा गांव एकबारगी दुनिया के नक्शे पर आ गया। भले ही मेरी पूरी जमीन यूनिवर्सिटी के काम आ गई, लेकिन आने वाली पीढ़ियों का मुस्तकबिल रोशन होगा, यह यकीन कायम है।

गांव के ही किसान सरयुग प्रसाद घर की बैठक में टंगी कलाम साहब के साथ खींची गई खुद की तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए जज्बाती हो गए। कहा- वे अमन का फरिश्ता थे। काश! उस दिन चलाए गए सारे रोड़े-पत्थर फूल बन गए होते। किसान सुनील प्रसाद, नथुन प्रसाद, परशुराम प्रसाद समेत पूरा गांव गम में डूबा है। सबने कहा कि कलाम साहब वाली दिल लीडरों और अफसरों में भी होनी चाहिए ताकि वे किसानों, नौजवानों से खुद को जोड़ सकें।

 

 

बशुक्रिया : दैनिक भास्कर 

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