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अब मदरसों में सेटेलाइट से होगी पढाई, 10 मदरसों में हुई शुरुआत

नई दिल्ली: मदरसे के क्षात्रों में आधुनिक शिक्षा पाने की ललक दिखने लगी है इस सिलसिले में पहल करते हुए मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के कुलपति ज़फ़र सरेशवाला की पहल पर 10 मदरसों को सेटेलाइट से जोड़ दिया है.

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हमेशा इल्ज़ाम लगता है कि देश में संचालित मदरसे ख़ुद को मुख्यधारा से जोड़ने में संकोच महसूस करते हैं लेकिन आधुनिक शिक्षा पाने के लिए उनमें बदलाव की ललक दिखने लगी है और मदरसों का सेटेलाइट से जुड़ना इस बात की सबूत है, अब सेटेलाइट के ज़रिए माहिर शिक्षक मदरसों के बच्चों को तकनिकी शिक्षा दे सकेंगे.
कैच न्यूज़ के अनुसार जफ़र सरेशवाला ने कहा कि ‘ मदरसों में तालीम और ट्रेनिंग पूरी तरह मजहबी किताबों पर आधारित है लेकिन आधुनिक शिक्षा से दूर होने के कारण जीवन में काफ़ी पिछड़ जाते हैं नौकरी या केरियर नहीं बना पाते हैं. हमने अभी सिर्फ़ प्रयोग के तौर पर 10 मदरसों को इससे जोड़ा है मगर इस प्रोजेक्ट से देश का कोई भी मदरसा जुड़ सकता है.
आपको बता दें कि इस प्रोजेक्ट में तीन समूहों के बीच समझौता किया गया है. इनमें मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्याल, सेटेलाइट लिंक मुहैया करवाने वाली कंपनी और संबंधित मदरसे.
10 चुने गए मदरसों में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, सम्भल और देवबंद के मदरसे हैं. इनके अलावा दिल्ली, मुंबई, बिहार और गुजरात के मदरसों को भी सेटेलाइट लिंक से जोड़ा जाएगा. इन मदरसों में सेटेलाइट का ढांचा विकसित करने का ख़र्च ज़फर सरेशवाला उठाएंगे. मुंबई से इन मदरसों का लिंक जोड़ा जायेगा पेशेवर माहिर टीचर मुंबई से सेटेलाइट के ज़रिए इन मदरसों के बच्चों को पढ़ाएंगे. उन्होंने कहा, कि ‘हम बेहतरीन टीचरों को हायर करेंगे और मदरसे के छात्रों को मुख्यधारा के बच्चों की क़तार में ला खड़ा करेंगे. हम उन्हें मेडिकल और इंजिनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए भी विशेष कोचिंग की व्यवस्था करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि ‘मदरसा आधुनिकीकरण’ अब एक मुहावरा बनकर रहा गया है, इस मुहावरे को सच करने की जरूरत है. ज़मीनी स्तर पर कुछ काम नहीं हुआ है और इस मद में सरकार द्वारा आवंटित किए गए 100 करोड़ रुपए बिना ख़र्च के पड़े हैं.
इस के अलावे, देशभर में संचालित मदरसों में दी जाने वाली मज़हबी तालीम का कोई एकसमान पैटर्न भी नहीं है. सब अपने अपने पैटर्न के हिसाब से मदरसा चलाते हैं. कुछ राज्यों में मदरसा डिग्री के लिए मान्यता प्राप्त बोर्ड भी है, लेकिन मदरसा प्रबंधन तालीम के मामलों में सरकार की दख़लअंदाज़ी नहीं चाहता. “शिक्षा का अधिकार अधिनियम” के दायरे में भी मदरसे नहीं आते. ज़फर कहते हैं, ‘हम इन मदरसों से सिर्फ़ मस्जिदों केलिए इमाम पैदा कर पा रहे हैं. इनकी डिग्रियों को कोई भी बोर्ड मान्यता नहीं देता जिस कारण ये हमेशा बेरोज़गार रहते हैं. इन्हें अपने दरवाज़े आधुनिक शिक्षा के लिए खोलने ही होंगे’ ताकि दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चल सके.

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