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अमल की कुबूलियत की शर्तें

(मौलाना मोहम्मद अजमत उल्लाह मोहम्मदी ) दुनिया दारूल अमल है तो आखिरत दारूल जजा है। दुनिया को आखिरत की खेती भी कहा जाता है जैसी खेती दुनिया में की जाएगी वैसी फसल आखिरत में काटी जाएगी। यह दुनिया एक इम्तेहान गाह है जिसका नतीजा आखिरत मे

(मौलाना मोहम्मद अजमत उल्लाह मोहम्मदी ) दुनिया दारूल अमल है तो आखिरत दारूल जजा है। दुनिया को आखिरत की खेती भी कहा जाता है जैसी खेती दुनिया में की जाएगी वैसी फसल आखिरत में काटी जाएगी। यह दुनिया एक इम्तेहान गाह है जिसका नतीजा आखिरत में जाहिर होगा।

अमल करना कमाल नहीं है, कमाल तो यह है कि हमारा अमल अल्लाह को कुबूल और मंजूर करार पाए। अमल की कुबूलियत के लिए तौहीद को अपनाना और शिर्क से बचना बेहद जरूरी है वरना शिर्क की आमेजिश से सारा अमल बर्बाद हो जाएगा।

क्योंकि शिर्क दीमक की तरह है। जिस तरह दीमक धीरे-धीरे लकड़ी, कपड़ा और दीगर चीजों को खाकर खत्म कर देती है बिल्कुल उसी तरह शिर्क तमाम आमाल को बर्बाद कर देता है। जैसा कि अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया-‘‘यकीनन (ऐ मोहम्मद) ! आप की तरफ और आपसे पहले के तमाम नबियों की तरफ भी वहि की गई है कि अगर आपने शिर्क किया तो बिला शुब्हा आप का अमल बर्बाद हो जाएगा और बायकीन आप घाटा उठाने वालों में से हो जाएंगे।’’ (सूरा जमर-65)

इसी तरह सूरा इनाम में अट्ठारह जमीलुल कद्र अम्बिया-ए-कराम का जिक्र करने के बाद फरमाया गया ‘‘अगर बिलगरज यह हजरात भी शिर्क करते तो जो कुछ यह नेक आमाल करते थे वह सब अकारत हो जाते।’’ (सूरा इनाम-88) ऊपर की दोनों आयते इस बात का सबूत है कि शिर्क आमाल की बर्बादी का बाइस बनने वाला गुनाहे कबीरा है। इसीलिए कुरआन में बार-बार बंदो को शिर्क से दूर रहने की सख्त ताकीद की गई है और तौहीद पर जोर दिया गया है।

इखलास:- बारगाहे इलाही में किसी भी अमल की कुबूलियत के लिए तौहीद के बाद सबसे पहली शर्त इखलास का होना जरूरी है। इखलास तमाम इबादत और नेक आमाल की रूह है। इखलास के बगैर कोई अमल न सालेह हो सकता है और न ही कुबूल। सल्फ का कौल है अगर तुम अपने आमाल के मुकम्मल सवाब के ख्वाहिशमंद हो तो अपने आमाल में इखलास पैदा करो।

कुरआने मजीद में कई मकामात में इखलास अख्तियार करने पर जोर दिया गया है। अल्लाह का इरशाद है-‘‘उनको इनके सिवा कोई हुक्म नहीं दिया गया था कि वह एक अल्लाह की बंदगी करें खालिस उसी की इताअत करते हुए यकसू होकर।’’ (सूरा बैयनह-5) तो कहीं फरमाया गया -‘‘ खालिस बंदगी सिर्फ अल्लाह ही के लिए है।’’ (सूरा जमर-3) नमाज, रोजा, जकात, सदका व खैरात, उमरा, हज, दुआ व कुर्बानी गरज कि सारे आमाल बल्कि मोमिन की पूरी जिंदगी में इखलास बहुत ही जरूरी है।

नफ्से इंसानी पर सबसे मुश्किलतरीन अगर कोई चीज है तो वह इखलास है। क्योंकि दिखावा, शोहरत व नामवरी इखलास की राह में रूकावट बनते हैं। अदम इखलास और रियाकारी की वजह से बड़े से बड़ा अमल भी बर्बाद हो जाता है। और बंदा जहन्नुम में फेंक दिया जाता है।

सही मुस्लिम की वह तवील हदीस इस बात की शाहिद है जिसमें एक आलिम, एक मालदार सखी और एक शहीद के फी सबीलिल्लाह का तजकिरा किया गया और बताया गया है कि कयामत के दिन सबसे पहले इन्हीं के हक में जहन्नुम का फैसला किया जाएगा और उनको जहन्नुम में दाखिल किया जाएगा।

इस हदीस के रावी अबू हुरैरा (रजि0) हैं जब वह यह हदीस बयान करते तो उनपर गशी तारी होती और वह बेहोश हो जाते। इस हदीस में रियाकारी का अंजामे बद बयान किया गया है। इसीलिए कुरआन व हदीस में रियाकारी से मना किया गया है। अल्लाह कयामत के दिन रियाकारों से कहेगा उन लोगों के पास जाओ जिनको खुश करने के लिए तुम दुनिया में नेकिया किया करते थे और देखो वह तुम्हे क्या बदला देते हैं।

एक रिवायत में रियाकारी को शिर्के असगर कहा गया है। रियाकारी से बचना बहुत मुश्किल काम है। अस्ल कमाल यही है कि बंदा रियाकारी से बच कर इखलास के साथ अमल सर अंजाम दे।

सुन्नत की मवाफिकत:- इखलास के बाद दूसरी अहम शर्त सुन्नते नबवी की मवाफिकत है यानी इबादत अल्लाह की और तरीका रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) का। हर वह इबादत जो खालिस अल्लाह की खुशनूदी के लिए की जाए, सुन्नते नबवी की इत्तबा करते हुए की जाए वरना अल्लाह के अलावा हर इबादत रसूलुल्लाह के तरीके के अलावा गुमराही है। आज बाज लोग फरायज, सनन, नवाफिल, वाजिबात मुस्तहबात सबपर पाबंदी से अमल करते हैं लेकिन किताब व सुन्नत की शाहराह से हटकर करते हैं, इस से भी सारा अमल बेकार होता है।

इबादात, मामलात बल्कि जिंदगी के हर शोबे में आप का अमल उम्मत के लिए नमूना है। अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया- ‘‘यकीनन तुम्हारे लिए रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की जिंदगी में बेहतरीन नमूना है।’’ (सूरा एहजाब-21) मालूम हुआ कि काबिले तकलीद व काबिले नमूना अगर किसी की जात है तो वह सिर्फ आप (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की जात है। इसीलिए अमल की कुबूलियत के लिए इत्तबा-ए-सुन्नत को शर्त करार दिया गया है। जैसा कि आप ने नमाज के हवाले से फरमाया कि तुम नमाज ऐसे पढ़ो जैसे तुमने मुझे नमाज पढ़ते हुए देखा है।

(हदीस) यानी हकीकत में नमाज वही है जो तरीका-ए-नबवी के मुताबिक अदा की जाए। इसी तरह आप ने हज से मुताल्लिक इरशाद फरमाया- तुम मुझ से मनासिके हज सीख लो। (हदीस) यानी हज के तमाम अरकान व मनासिक भी उसी तरीके से अदा किए जाएं जिस तरीके से आप ने हज किया और अपनी उम्मत को तालीम दी है। अब अगर कोई किसी इबादत के मामले में नबी करीम (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) का तरीका छोड़कर बिला वजह तकलीफ अख्तियार करे और यह सोंचे कि मेरी इबादत अल्लाह को कुबूल होगी और मैं सवाब का मुस्तहक हूंगा तो यह ख्याल गलत है। इबादत वही मतलूब व मकसदू और महबूब व मकबूल है जो नबी करीम (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम0) के नमूने और तरीके पर अदा की जाए।

ऊपर की बातों से यह बात वाजेह होती है कि अमल को अल्लाह के लिए मकबूल बनाने के लिए तौहीदे खालिस को अख्तिार करते हुए शिर्क और शिर्क की किस्मों से बचा जाए और साथ ही सुन्नते नबवी की मवाफिकत करते हुए रियाकारी से गुरेज करके इखलास के साथ अमल सर अंजाम दिया जाए और अमल की कुबूलियत के लिए अल्लाह से दुआ की जाए। इब्राहीम (अलै0) ने हुक्मे इलाही की तकमील करते हुए अपने बेटे इस्माईल (अलै0) को अपने साथ लेकर काबा की तामीर फरमाई जब आप तामीर से फारिग हुए तो दरबारे इलाही में उस अंदाज से दुआगो हुए जिसको अल्लाह ने यूं इरशाद फरमाया- ‘‘ऐ हमारे रब, इस अमल को हमारी तरफ से कुबूल फरमा ले बेशक तू बड़ा सुनने वाला और जानने वाला है।’’ (सूरा बकरा-127)

इब्ने अबी हातिम ने वहब बिन अलूरद के बारे मंे लिखा है कि वह यह आयत पढ़ते जाते थे और रोते जाते थे और कहते थे कि खलीलुर्रहमान आप अल्लाह का घर बना रहे थे और डर रहे थे कि कहीं आप का अमल कुबूल न किया जाए। मालूम हुआ कि मोमिन खालिस अमल करता है और डरता है कि कहीं उसका अमल उसके मुंह पर न मार दिया जाए।

दुआ है कि अल्लाह इखलास पैदा फरमाए रियाकारी से बचाए और सुन्नते नबवी के मुताबिक आमाल अंजाम देने की तौफीके नेक अता फरमाए और इन आमाल व हसनात को शरफे कुबूलियत बख्शे- आमीन।

‍‍‍‍‍बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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