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अमीर देश सिर्फ देख रहे है और रिफ्यूजियों का खर्च उठाने को मजबूर हैं केवल 10 देश: एमनेस्टी

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मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि केवल दस देश मिलकर दुनिया के आधे से अधिक शरणार्थियों का खर्च उठा रहे हैं, जो धनी देशों के स्वार्थ को दर्शाता है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वभर में 21 लाख लोग शरणार्थी जीवन जी रहे हैं। लंदन स्थित मनावधिकार संगठन का कहना है कि बहुत जल्द पड़ोसी देशों को भी इस वैश्विक शरणार्थी समस्या का खामियाजा भुगतना होगा।

रिपोर्ट कहता है कि 50 फीसदी शरणार्थी केवल 10 देशों में रहने को मजबूर हैं। इसके लिए एमनेस्टी ने प्रस्ताव दिया है किव के सभी देशों को हर साल 10 प्रतिशत लोगों को घर उपलब्ध कराना चाहिए। एमनेस्टी के महासचिव सलिल शेट्टी ने कहा है कि कुछ देशों का इस दुर्दशा की वजह उनके पड़ोसी देश हैं जो उनकी मदद नहीं कर हैं।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि परिस्थितियों का मुख्य कारण सीरिया, दक्षिण सूडान, अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों से लाखों लोगों का युद्ध और उत्पीड़न के कारण भागना है। इस समय जरूरी है कि विश्व के नेताओं इस समस्या पर बात करें और इसके सामाधान का रास्ता निकाले। एमनेस्टी का कहना है कि शरणार्थियों का सबसे अधिक मदद जोर्डन रहा है, जिसने अबतक 27 लाख से अधिक लोगों को शरण दिया है। जबकि तुर्की ने 25 लाख से अधिक, पाकिस्तानी 16 लाख और लेबनान 15 लाख से अधिक शरणार्थियों को अपने यहां जगह दी है।

बाकी बचे दस देशों में शेष छह ऐसे देश हैं, जो शरणार्थियों को हजारों और सैकड़ों की संख्या में अपने यहां शरण दिए है। ईरान ने 9,79,400; इथियोपिया 7,36,100; केन्या 5,53,900; युगांडा 4,77,200; लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो 3,83,100 और चाड 3,69,500 ने शरणार्थियों को अपने यहां पनाह दी है।

यह सभी आकड़े ‘यूनाटेड नेशन हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी’ पर आधारित है। एमनेस्टी ने कहा है कि दुनिया के धनी देशों ने सबसे कम शरण दी है या उससे भी कम। कुछ लोग तो केवल थोड़ा-बहुत सहायता राशि देकर टाल रहे हैं। यह सहायता के लिए पैसा भेजने जैसा बात नहीं है। एमनेस्टी का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय रिफ्यूजी समस्या का सामाधान नहीं किया गया तो उसके बहुत गम्भीर परिणाम होंगे।

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