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अमेठी- कांग्रेस के लिए किला बचाने की चुनौती

फैसल फरीद, लखनऊ। जैसे ही आप अमेठी में दाखिल होते हैं आपको गाँधी परिवार से जुड़े हुए तमाम किस्से सुनने को मिल जाते हैं. संजय गाँधी, राजीव गाँधी, मेनका गाँधी, सोनिया गाँधी और अब राहुल गाँधी. ज़ाहिर है, अमेठी और रायबरेली ही वो दो सीटें थी जो २०१४ के लोक सभा चुनाव में भी मोदी लहर से प्रभावित नहीं हुई और कांग्रेस के पास रही.

ज़ाहिर सी बात हैं अमेठी के लोगो का गाँधी परिवार से भावनात्मक रिश्ता तो है लेकिन सिर्फ इस रिश्ते पर अब चुनाव होगा ऐसा मुमकिन नहीं लगता. पिछले २०१२ के विधान सभा चुनाव में अमेठी जो कांग्रेस का किला माना जाता रहा है उसमे दरार पड़ गयी. अमेठी लोक सभा क्षेत्र की पांच विधान सभा सीटो में से समाजवादी पार्टी ने तीन जीत ली. कांग्रेस के ये लिए सदमा था क्योंकि सपा ने अमेठी जनपद की अमेठी और गौरीगंज सीट के अलावा सलोन सीट जो रायबरेली में हैं जीत ली. कांग्रेस सिर्फ तिलोई और जगदीशपुर ही जीत सकी.

अब हालात बहुत कांग्रेस के पक्ष में नहीं हैं. अमेठी सीट की राजनीति भूपति भवन जो राजा संजय सिंह का निवास है वहीँ से चलती हैं. संजय सिंह कांग्रेस, भाजपा के बाद अब फिर कांग्रेस में हैं और राज्यसभा सदस्य हैं. पिछली बार उनकी पत्नी अमिता सिंह अमेठी से हार गयी थी उन्हें सपा के मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति ने हराया था. इस बार वो फिर मैदान में होंगी.

कांग्रेस की दूसरी दिक्कत तिलोई को लेकर हैं जिसपर उसके विधायक मोहम्मद मुस्लिम पार्टी छोड़ कर बसपा में चले गए हैं. ज़ाहिर सी बात हैं कांग्रेस उस पर अपना कब्ज़ा बरक़रार रखना चाहेगी.

कांग्रेस के लिए परेशानी की बात ये भी हैं की स्मृति ईरानी जिन्हें राहुल ने लोक सभा में हराया था उनका दखल अभी क्षेत्र में बरक़रार हैं. उन्ही की पहल पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने अमेठी के दो गाँव–हरिहरपुर और बरौलिया को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद भी लिया हैं. ज़ाहिर हैं भाजपा को यहाँ कमज़ोर नहीं माना जा सकता.

दूसरी ओर बसपा का भी अपना फिक्स्ड वोट हैं और उसके प्रत्याशी यहाँ पहली भी जीत चुके हैं. ऐसे में वो पुरे दम ख़म से मैदान में हैं.

पेंच कांग्रेस के लिए अभी और भी हैं. अगर कांग्रेस और सपा का गठबंधन होता हैं तो सपा द्वारा तीन जीती हुई सीटो का क्या होगा. क्या कांग्रेस को अपना दावा छोडना होगा. फिर राजा संजय सिंह की पत्नी कहाँ से लड़ेगी.

इन्ही सब चुनौतियों से झूझते हुए कांग्रेस को इस विधान सभा चुनाव में अपना किला भी बचाना है और वहीँ इस उम्मीद को कायम रखना हैं कि अभी भी अमेठी में गाँधी परिवार की विरासत चलती हैं

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