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अमेरिकी सऊदी अरब को देगा 1.15 अरब डॉलर के हथियार

अमेरिकी सीनेटरों ने सऊदी अरब के साथ हथियारों की ब्रिकी से जुड़ी 1.15 अरब डॉलर की डील को हरी झंडी दिखा दी है. इस डील के खिलाफ प्रस्ताव खारिज हुआ.
अमेरिकी सीनेटरों ने सऊदी अरब के साथ हथियारों की ब्रिकी से जुड़ी 1.15 अरब डॉलर की डील को हरी झंडी दिखा दी है. सीनेट में इस डील के खिलाफ आए प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया है. सीनेट में हुए मतदान के दौरान प्रस्ताव के पक्ष में 27 जबकि इसके विरोध में 71 मत वोट पड़े. यमन में 18 महीनों से जारी लड़ाई में सऊदी अरब की भूमिका पर सवाल उठाते हुए रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल और डेमोक्रैट क्रिस मर्फी ने ये प्रस्ताव पेश किया था.
लेकिन सीनेट में बहुमत वाले दल के नेता मैककॉनेल ने कहा, “मुझे लगता है कि अमेरिका को सऊदी अरब के साथ जितना संभव हो सके, उतने अच्छे रिश्ते बनाकर रखने चाहिए.” वहीं सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति के चेयरमैन जॉन मैक्केन ने कहा कि अमेरिका इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ रहे अपने सहयोगी देशों को हथियार देने से इनकार नहीं कर सकता है. उन्होंने कहा, “अगर टैंकों की इस बिक्री को रोक दिया गया तो न सिर्फ सऊदी अरब बल्कि खाड़ी क्षेत्र में हमारे दूसरे साझीदार भी यही सोचेंगे कि अमेरिका ने इस क्षेत्र को लेकर जो वादे किए वो उन पर अमल नहीं कर रहा है और सुरक्षा के मामले में वो भरोसेमंद साझीदार नहीं है.” यह पांचवीं पीढ़ी का टैंक है. रूस ने इसे 2015 में लॉन्च किया. इस टैंक को रोबोटिक कॉम्बैट व्हीकल में भी बदला जा सकता है. हाल ही में रूस ने इस पर 152 एमएम की तोप लगाने का एलान किया है. रूसी उपप्रधानमंत्री दिमित्रि रोगोजिन के मुताबिक, यह तोप “एक मीटर मोटी स्टील की चादर को भेद सकती है.”

1.15 अरब डॉलर की इस डील में सऊदी अरब को 100 से ज्यादा बैटल टैंक, मशीन गन, स्मोक ग्रेनेड लॉन्चर, रात में देख सकने वाले उपकरण, युद्धक्षेत्र से क्षतिग्रस्त वाहनों लाने वाले वाहन और बड़ी मात्रा में ट्रेनिंग में काम आने वाला गोलाबारूद दिया जाएगा. सऊदी अरब यमन में अंतरराष्ट्रीय समर्थन वाली सरकार का साथ रहे क्षेत्रीय सैन्य गठबंधन का नेतृत्व कर रहा है और पूर्व राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के समर्थक शिया बागियों से लड़ रहा है. अमेरिका का कहना है कि सऊदी अरब यमन संकट में सिर्फ सलाहकार की भूमिक अदा कर रहा है. इस संकट में अब तक 10 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं जबकि तीस लाख बेघर हुए हैं.

दुनिया भर में आयात किए जाने वाले कुल हथियारों का 14 फीसदी केवल भारत में आता है. हथियारों का आयात भारत में चीन और पाकिस्तान से तीन गुना ज्यादा है. सिपरी की रिपोर्ट में इसका कारण “भारत की अपनी आर्म्स इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धी स्वदेशी हथियार डिजाइन कर पाने में असफल रहना” बताया गया है. सबसे ज्यादा हथियार रूस (70%), अमेरिका (14%) और इस्राएल (4.5%) से आते हैं.

वहीं सऊदी अरब को हथियारों की डील के आलोचकों का कहना है कि उसने यमन में ऐसे ठिकानों पर भी बमबारी की है जहां अमेरिका ने उससे कार्रवाई न करने को कहा. उनका कहना है कि यमन में अल कायदा और आईएस तेजी से अपने पांव फैला रहे हैं. पिछले हफ्ते अमेरिकी बार एसोसिएशन ने कहा कि विश्वसनीय रिपोर्टें हैं कि सऊदी सेना ने अमेरिका निर्मित सैन्य साजोसामान का इस्तेमाल आम लोगों पर हमला करने के लिए किया है. इसी के आधार पर अमेरिकी सरकार से कहा गया कि वो सऊदी अरब के साथ अपना सहयोग खत्म कर दे. लेकिन सीनेट ने फिलहाल सऊदी अरब के साथ हथियारों की डील को रोकने से इनकार कर दिया है.

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