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अर्ज़ हिंद पर सब से पहले बोली जाने वाली ज़बान अरबी

हैदराबाद । १४ फरवरी : ( सियासत न्यूज़ ) : अर्ज़ हिंद पर सब से पहले जो ज़बान बोली गई वो अरबी ज़बान है । हज़रत आदम अलैहि अस्सलाम जब जन्नत से दुनिया का रुख किए तो आप को सरनदीब के मुक़ाम पर उतारा गया था । जो हिंदूस्तान का इलाक़ाथा और हज़रत आद

हैदराबाद । १४ फरवरी : ( सियासत न्यूज़ ) : अर्ज़ हिंद पर सब से पहले जो ज़बान बोली गई वो अरबी ज़बान है । हज़रत आदम अलैहि अस्सलाम जब जन्नत से दुनिया का रुख किए तो आप को सरनदीब के मुक़ाम पर उतारा गया था । जो हिंदूस्तान का इलाक़ाथा और हज़रत आदम की ज़बान अरबी थी । जब कि इन की तौबा की क़बूलीयत का सबब कलिमा तुय्यबा था जो अरबी ज़बान में था अरबी ज़बान की ख़ुसूसीयत ये है कि वो 99फ़ीसद अपने क़वाइद पर चलती है अगर कभी हटती भी है तो इस की कोई ना कोई वजह ज़रूर होती है । इन ख़्यालात का इज़हार मौलाना मुहम्मद ख़्वाजा शरीफ़ ने रोज़नामा सियासत की जानिब से शुरू किए जाने वाले अरबी के सैंटर का सय्यद अली चबूतरा मैंइफ़्तिताह के मौक़ा पर किया ।

मौलाना ने इस वक़्त आलम अरब में मौजूद एक मुहैय्यरअलाक़ोल लड़की का हवाला देते हुए कहा कि इस लड़की को इमाम मालिक , बुख़ारी शरीफ़, मुस्लिम शरीफ़ मुकम्मल तौर पर हिफ़्ज़ है और इस लड़की ने हैदराबाद की माया नाज़ शख़्सियत अल्लामा सय्यद इबराहीम अदीब पर अपना पी एचडी का मक़ाला मुकम्मल किया है ।

मौलाना ने अपना ख़िताब जारी रखते हुए कहा कि अहल दक्कन ख़ुशकिसमत हैं कि यहां पर उलूम-ओ-फ़नून की पज़ीराई करने वाले मौजूद हैं जिन में काबिल-ए-ज़िकरमुहतरम ज़ाहिद अली ख़ां ऐडीटर रोज़नामा सियासत हैं । आए दिन होने वाली साज़िशों का शिकार सिर्फ़ मुस्लमान ही नहीं हैं बल्कि अरबी ज़बान भी इन साज़िशों का शिकार होती रहती है । लेकिन इस की मोजज़ाना सलाहीयत अपना दिफ़ा करने में कामयाब है । उन्हों नेमज़ीद कहा कि अरबी ज़बान बहुत ही सहल है ।

अगर कोई हर्फ़-ओ-नहू के दस्ता पंद्रह क़ायदा पढ़ ले तो वो अरबी बड़ी हद तक सीख सकता है । जहां तक हज़रत आदम अलैहि अस्सलाम का ताल्लुक़ है वो अपने साथ लाखों ज़बानें लेकर आए थे लेकिन आप की ज़बान अरबी थी । आज भी उम्मत मुस्लिमा के इस इन्हितात के दौर में नज़र डाली जाय तो अब भी सारी दुनिया मईशत में अरबों की मुहताज नज़र आती है और दुनिया का कोई ख़ित्ता ऐसा नहीं है कि जहां मईशत में अरबों का रोल ना हो ।

आप ने मज़ीद कहा कि अगर चीका अंग्रेज़ी का आज अपना एक मुक़ाम-ओ-एहमीयत है लेकिन दुनिया के बहुत सेममालिक ऐसे हैं जहां पर अंग्रेज़ी का चलन नहीं है इसी तरह फ़्रांसीसी जापानी और चीनी ज़बानों का मुआमला है । लेकिन अरबी ज़बान तमाम सरहदों और ख़तों की कशाकश सेआज़ाद है । और हर ख़ित्ता और मुल्क में इस के पढ़ने और पढ़ाने वाले मौजूद हैं । मौलाना ने सयासतकी जानिब से की जाने वाली इन काविशों की सताइश करते हुए कहा कि सियासत की ये मुहिम वक़्त की आवाज़ है । इस को और वुसअत दिया जाना चाहीए । आप ने ज़िम्मा दारान सियासत के लिए दाये ख़ैर करते हुए कहा कि अल्लाह रब अलाज़त इन हज़रात को इस कार-ए-ख़ैर का ख़ूब अज्र अता फ़रमाए ।।

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