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अली सरदार जाफ़री की नज़्म: “माँ है रेशम के कारख़ाने में..”

मां है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ सूती मिल में है
कोख से मां की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारखानों के काम आयेगा
अपने मजबूर पेट की खातिर
भूक सरमाये की बढ़ाएगा

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
ख़ून इसका दिए जलायेगा

यह जो नन्हा है भोला भाला है
ख़ूनी सरमाये का निवाला है
पूछती है यह इसकी खामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है!

(अली सरदार जाफ़री)

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