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अल्लाह और रसूल ( स०अ०व०) पर ईमान लाओ

ईमान लाओ अल्लाह और इसके रसूल ( स०अ०व०) पर और ख़र्च करो (उसकी राह में) इन मालों में से, जिनमें इसने तुम्हें अपना नायब बनाया है। पस जो लोग ईमान लाए तुम में से और (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते रहे उनके लिए बहुत बड़ा अज्र है। (सूरत अलहदीद।७)

ईमान लाओ अल्लाह और इसके रसूल ( स०अ०व०) पर और ख़र्च करो (उसकी राह में) इन मालों में से, जिनमें इसने तुम्हें अपना नायब बनाया है। पस जो लोग ईमान लाए तुम में से और (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते रहे उनके लिए बहुत बड़ा अज्र है। (सूरत अलहदीद।७)

कभी ईमान लाने की दावत उन लोगों को दी जाती है, जो नेअमत ए ईमान से महरूम हैं और गाहे-गाहे उन लोगों को भी दावत ईमान दी जाती है, जो ईमान तो ले आए होते हैं, लेकिन ईमान के तक़ाज़ों को पूरा करने में ग़फ़लत और सुस्ती का मुज़ाहिरा करते हैं।

इस्लाम को सरबुलंद करने के लिए अगर किसी माली और जानी क़ुर्बानी की उन्हें दावत दी जाती है तो वो शौक़ और आमादगी इनमें नज़र नहीं आती, जो ईमान का तक़ाज़ा है। ये आयात ग़ज़वा-ए-तबूक के मौक़ा पर ऐसे ही लोगों के हक़ में नाज़िल हुईं।

ये ग़ज़वा रूमी सलतनत के ख़िलाफ़ था, जो मदीना पर हमलावर होकर मुसलमानों को मलियामेट कर देने के मंसूबे बना रहे थे। तीस हज़ार का लश्कर जर्रार लेकर हुज़ूर अकरम (स०अ०व० ) पेशक़दमी करते हुए रूमी इलाक़ा में तबूक के मुक़ाम पर आकर ख़ेमा ज़न हुए थे।

इस मुहिम को सरअंजाम देने के लिए जितने सरमाया की ज़रूरत थी, वो मुहताज बयान नहीं। हज़रत सिद्दीक़ अकबर, हज़रत फ़ारूक़ आज़म, हज़रत उसमान ग़नी और दीगर सहाबा किराम रज़ीयल्लाह अन्हुम ने ईसार-ओ-फ़दाईत के ऐसे ऐसे मुज़ाहिरे किए कि उन्हें पढ़ कर आज भी ईमान ताज़ा हो जाता है, लेकिन बाअज़ ऐसे लोग भी थे जो मुसलमान तो थे, मगर अल्लाह की राह में माल पेश करना उनके लिए बड़ा जान जोखों का काम था।

उनको बरअंगेख़्ता करने के लिए उन्हें फिर दावत ईमान दी जा रही है और जो अहद वो पहले कर चुके हैं वो याद दिलाया जा रहा है, ताकि आज़माईश के वक़्त वो नाकाम ना हो जाएं।

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