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असदुद्दीन ओवैसी का ऐलान: मुसलमान अब सेकुलरिज्म का कुली नहीं बनेगा

मुल्क के सियासी अफाक़ पर एक नये सितारे का उरूज़ हो चुका है. मुसलमानों में वह बहुत ही मकबूल है और अब दलितों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहा है. हैदराबाद शहर के एमपी असदुद्दीन ओवैसी की सियासत अब पूरे मुल्क में पांव पसार रही है. इसके पहले उनकी सियासी ज़मीन सिर्फ हैदराबाद में ही थी. वहां उनके वालिद सुलतान सलाउद्दीन ओवैसी भी इलेक्शन जीता करते थे.

उनके खानदान की सियासी तंज़ीम आल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लमीन इस बार महाराष्ट्र के विधान सभा इंतेखाबात में बाकायदा अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुका है. वहां आल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लिमीन ( एमआईएम) ने सिर्फ 24 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन मुसलमानों के वोट के सहारे शिवसेना और बीजेपी को रियासत में शिकस्त देने वाली कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया. हालांकि असदुद्दीन ओवैसी इस बात को कुबूल नहीं करते लेकिन सच्चाई यह है कि उनकी सियासी सरगर्मी की वजह से सियासत में पहचान और सेकुलरिज्म की बहस में एक फैसलाकुन नया आयाम जुड़ चुका है.वे अब भी यही दावा करते हैं कि वे सिर्फ हक की लड़ाई लड़ रहे हैं.

एबीपी न्यूज़ ने एक घंटे का एक नया प्रोग्राम शुरू किया है. सरगर्म सीनीयर सहाफी दिबांग के इस प्रोग्राम का फार्मट बहुत ही दिलचस्प है. ‘प्रेस कॉन्फ्रेन्स’ नाम के इस प्रोग्राम में एक लीडर को बैठाकर उस से दिबांग सवाल पूछते हैं, उसके बारे में बहुत सारी मुतनाज़ा जानकारी के पुराने टीवी फुटेज दिखाते हैं और फिर शुरू होता है सवालों का सिलसिला . इस सवाल जवाब के लिए दिबांग के साथ दिल्ली में काम करने वाले बारह सहाफी भी शामिल होते हैं. यह बहुत ही दिलचस्प प्रोग्राम है.

आज इस प्रोग्राम में आल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सदर असदुद्दीन ओवैसी मेहमान थे.

एक घंटे के इस प्रोग्राम में उनसे बहुत ही मुश्किल सवाल पूछे गए. और उन्होंने करीब करीब हर सवाल का जवाब देने की कोशिश की. यह अलग बात है कि बहुत सारे सवालों के जवाब उनके पास नहीं थे. मसलन अगर किसी ने किसी मुसलमान बच्चे को नुक्सान पंहुचाया तो उस शख्स की आंख निकाल लेने के बजाय सर काट लेने की बात करने वाले उनके तकरीर की क्लिपिंग जब उनको दिखाई गयी तो वे खासी मुश्किल में पड़ गए. यह जान लेना ज़रूरी है कि असदुद्दीन ओवैसी दहशतगर्द के किसी केस में पकडे गए मुस्लिम नौजवान को “नच्चे” कहते हैं.

इसी तरह जब उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी के बारे में सवाल हुए तो भी उन्होंने इधर उधर के कुछ जुम्ला कहकर जान बचाए क्योंकि अकबरुद्दीन ओवैसी ने एक तकरीर में दावा किया था कि उनको अगर हुकूमत पन्द्रह मिनट का वक्त दे दे तो वे हिन्दुओं को उनकी औकात दिखा देगें.

कुछ असहज मौकों के अलावा प्रोग्राम में उन्होंने कुछ ऐसी बातें ज़रूर बताईं जिसके बाद उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की सियासत में मुसलमानों के वोट के ज़ोर पर सियासत करने वालों को झटका ज़रूर लगेगा.

असदुद्दीन ओवैसी ने साफ़ कहा कि बीजेपी फिर्कापरस्त पार्टी है लेकिन उसको हराने का ज़िम्मा सिर्फ उनका ही नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि वे सेकुलरिज्म के कुली नहीं हैं. नाम निहाद सेकुलर पार्टियों को चाहिए कि वे फिर्कावाराना पार्टी बीजेपी को हराएं. उनका अकेले का ज़िम्मा नहीं है कि वे बीजेपी को कमज़ोर करें. उनको इस बात से भी नाराजगी है कि कांग्रेस किसी को सेकुलर बनाने की सर्टिफिकेट देती रहती है और बीजेपी किसी को भी हुब्बलवतनी बनाने का ठेका लिए घूमती है.

बीजेपी और कांग्रेस के लीडर उनकी इस बात की तरदीद करती हैं. उन्होंने साफ़ दावा किया कि वे इस मुल्क में रहते हैं इसलिए कि यह मुल्क उनका है. हिन्दुस्तान उनका घर है, वे यहां किरायेदार नहीं हैं. दिलचस्प बात यह है कि पूरी बातचीत में वे जब भी “हम” कहते थे, उनका मतलब पूरी मुस्लिम बिरादरी का होता था. ऐसा लगता है कि वे खुद और उनकी पार्टी ऑल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लिलमीन अब अपने को मुल्क के सारे मुसलमानों का सरपरस्त मानने लगी है. हालांकि जब उनको याद दिलाया गया कि वे पाकिस्तान के बानी मुहम्मद अली जिन्नाह के तरह कौम की कियादत की बात कर रहे हैं तो उन्होने बहुत ही मजबूती के साथ दावा किया कि उन्होंने यानी उनके बुजुर्गों ने जिन्नाह के दो मुल्को के असूलों को ठुकरा दिया था और हिन्दुस्तान में रहने का फैसला किया था.

इस सारी बहस के बीच इस प्रोग्राम से कुछ बातें ऐसी निकलीं जो मुल्क के मुस्तकबिल की सियासत को मुतास्सिर करेगीं. उनको नज़र अन्दाज़ न तो सियासत की बिरादरी कर सकती है और न ही सहाफी की बिरादरी. असदुद्दीन ओवैसी ने जब भी इस्तेहसालज़दा शिकार जनता का नाम लिया तो उन्होंने मुस्लिम-दलित कह कर मुखातिब किया. इस एक जुमले में आने वाले इंतेखाबात की बयार की सिम्त तय करने का माद्दा है. बिहार, मगरिबी बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधानसभा इंतेखाबात अगले दो साल के अन्दर हो जायेगें. इन इंतेखाबात जैसे ही अहम इलेक्शन मुंबई और थाणे के नगर निगम इलेक्शन होते हैं. इन इंतेखाबात में आल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लिमीन के उम्मीदवार खड़े होंगें. मुसलमानों की ताइद के दावेदार लीडरों , लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव के लिए ऑल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लिमीन का उभार बहुत अच्छा इशारा नहीं है.

जिसने भी उत्तर प्रदेश के मस्लिम अक्सरियत वाले इलाकों का सर्वे किया है उसको मालूम है कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान नौजवानों में असदुद्दीन ओवैसी की खासी इज्ज़त है. उसके साथ साथ उन्होने दलितों की मुसीबतों को भी मुद्दा बना रखा है. सब जानते हैं कि दलितों की सियासत के बल पर कई बार सत्ता का मज़ा ले चुकी बहुजन समाजपार्टी की सदर मायावती ने दलितों को इज़्ज़त तो दिलवाया है लेकिन मायावती की सियासत से दलितों की माली हालात में कोई बदलाव नहीं नहीं आया है. अगर ऑल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लिमीन के लीडर को दलितों के इस तब्के को साथ लेने में कामयाबी मिल गयी तो उत्तर प्रदेश में मायावती की सियासत को भारी नुक्सान हो सकता है.

अब तक माना जाता था कि उत्तर प्रदेश के दलितों को बहुजन समाज पार्टी से अलग नहीं किया जा सकता. लेकिन 2014 के लोकसभा इंतेखाबात के दौरान उत्तर प्रदेश में बीजेपी के इस वक्त के इंचार्ज अमित शाह ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश के उन इलाकों के दलितों को भी बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ सरगर्म किया जा सकता है जहां तकरीबन सभी दलित मायावती के साथ थे. मगरिबी उत्तर प्रदेश में दलित आबादी आक्सरियत वाले इलाकों में उन्होंने दलित नौजवानों को बीजेपी से जोड़ दिया था. इस तरह हम देखते हैं कि अगर ऑल इण्डिया मुस्लिम इत्तेहादुल मुस्लिमीन उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम आबादी को एकजुट करने में कामयाब हो जाती है और उसके सदर असदुद्दीन ओवैसी को मामूली कामयाबी भी मिल जाती है तो बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश की जीत तय हो जायेगी क्योंकि बकौल असदुद्दीन ओवैसी मुसलमान और सेकुलरिज्म का कुली नहीं बने रहना चाहते.

बशुक्रिया: एबीपी न्यूज़

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