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असल रिहायशी की शिनाख्त बने 1932 का खतियान

1932 का सर्वे सेटलमेंट खतियान वाले ही झारखंडी माने जायेंगे। झारखंड की तशकील आदिवासी-मूलवासी को सेंटर पॉइंट मान कर किया गया है। इसलिए आदिवासी-मूलवासी ही झारखंडी है। ये बात बिरसा मुंडा के 114 वीं शहादत दिवस पर कदमा उलियान वाकेय शहीद नि

1932 का सर्वे सेटलमेंट खतियान वाले ही झारखंडी माने जायेंगे। झारखंड की तशकील आदिवासी-मूलवासी को सेंटर पॉइंट मान कर किया गया है। इसलिए आदिवासी-मूलवासी ही झारखंडी है। ये बात बिरसा मुंडा के 114 वीं शहादत दिवस पर कदमा उलियान वाकेय शहीद निर्मल महतो सामुदायिक भवन में झारखंड मुजाहेरीन और दानिश्वरों की तरफ से मुनक्कीद झारखंडी डोमिसाइल गौर-फिक्र कैंप में निकला।

कैंप में झारखंड किसके लिए? झारखंडी कौन और डोमिसाइल क्यों पर गौर व फिक्र किया गया। कैंप में मुक़र्ररीन ने हुकूमत की तरफ से डोमिसाइल पॉलिसी के ताईन कमेटी की सिफारिश-रियासत तशकील के 15 साल (यानी 1985) से पहले रहने वाले को झारखंडी और खतियान धारी को असल रिहायशी होने के तजवीज को एकसिरे से खारिज कर दिया। कैंप में कुल 9 तजवीज पास किये गये। जिसे झारखंड दानिश्वरों का एक वफद रियासत हुकूमत को जल्द सौंपेगा।

झारखंडी मुद्दे पर मुक़र्ररीन के तर्क

मुक़र्ररीन ने तर्क दिया है कि डोमिसाइल पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट 9 जनवरी 2002 को हुआ है। जिसका नंबर 1998 का सीए 5834 है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज बीएन खरे और जस्टिस बीएन अग्रवाल की बेंच ने निज़ाम दी है कि कोई भी भारतीय शहरी किसी एक रियासत का ही असल रिहायशी हो सकता है। जहां उनके अबाई लोग रहते आए हैं। यानी एक शहरी दो रियासतों के असल रिहायशी नहीं हो सकते हैं। रिजर्वेशर के मामले में भी पटना हाइकोर्ट ने भी साल 2009 में एक दरख्वास्त की सुनवाई करते हुए निज़ाम दी है कि रियासत की नौकरियों में बाहरी लोगों को रिज़र्वेशन का फाइदा नहीं मिलेगा। इस सिलसिले में हाइ कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के असल रिहायशी के दो अदालती अफसरों की तकर्रुरी मंसूख कर दी थी।

2009 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अपना असल रियासत छोड़ कर दीगर रियासत में जा बसे लोग अपनी ज़ात की बुनियाद पर मुतल्लिक़ रियासत में रिज़र्वेशन का फाइदा नहीं ले सकते हैं। कानून की दफा 371(डी) में तजवीज आंध्र प्रदेश रियासत की तर्ज पर 1932 के सर्वसेटलमेंट के खतियान की बुनियाद पर झारखंड में डोमिसाइल पॉलिसी मुकर्रर होनी चाहिए।

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