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अफ़्ग़ानिस्तान में अमरीकी फ़ौज के क़ियाम में तौसीअ ज़रूरी है

अमरीका ने अफ़्ग़ानिस्तान में अपनी फ़ौज बरकरार रखने का फ़ैसला किया है। इस फ़ैसले को अफ़्ग़ानिस्तान में अमन और सलामती के लिए इंतिहाई अहम समझा जा रहा है। मुल्की इदारों की ग़ैर तसल्ली बख़्श कारकर्दगी और तालिबान के एक मर्तबा फिर ज़ोर पकड़ने के तनाज़ुर में अफ़्ग़ानिस्तान में अमरीकी फ़ौज के क़ियाम में तौसीअ को मुबस्सिरीन ने दानिशमंदाना फ़ैसला क़रार दिया है।

तजज़ियाकारों का ख़्याल है कि इस में कोई शक नहीं कि अफ़्ग़ान हुकूमत के अहम इदारों की ग़ैर तसल्ली बख़्श सूरते हाल ने ही तालिबान अस्करीयत पसंदों को एक मर्तबा फिर पूरी क़ुव्वत से सर उठाने का मौक़ा फ़राहम किया है और इस बाइस इंतिहा पसंदों की अस्करी कार्यवाईयों में कमी आने के बजाय इज़ाफ़ा हुआ है।

अफ़्ग़ानिस्तान में अशर्फ़ ग़नी और सोवीयत यूनीयन दौर के जंगी सरदार अबदुल्लाह अबदुल्लाह की यूनिटी हुकूमत को क़ायम हुए एक साल बीत गया है लेकिन कई मुआमलात में सियासी तात्तुल और इख़तिलाफ़ात की सूरते हाल शिद्दत से महसूस की जाती है।

इस तात्तुल ने भी अफ़्ग़ान इदारों में अदम इतमीनान और तक़सीम पैदा की है और यही तक़सीम सारे मुल्क में तशद्दुद की ऐसी फ़िज़ा को पैदा करने का सबब बनी जो बरसों में नहीं देखी गई।

अभी एक दो हफ़्ते क़ब्ल शुमाली शहर कंदूज़ पर तालिबान अस्करीयत पसंदों की शोर्श और चंद रोज़ा क़ब्जे ने काबुल हुकूमत के तमाम दावों की क़लई खोल कर रख दी थी।

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