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आखिरकार मुर्शिदाबाद को मिल ही गया नवाब

मुर्शिदाबाद: नवाबों की नगरी मुर्शिदाबाद को आखिरकार नवाब मिल ही गया। मीर कासिम के परिवार से संबंध रखने वाले मुर्शिदाबाद के पहले नवाब नवाब हसन अली मिर्जा के नवासे को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराधिकारी बताते हुए मुर्शिदाबाद का नवाब बताया है।

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न्यूज़ नेटवर्क समूह प्रदेश 18 के अनुसार देश के इतिहास में मुर्शिदाबाद एक ऐतिहासिक स्थान है। औरंगजेब के ज़माने में मुर्शिद कुली खान को यहां का राज्यपाल बनाकर भेजा गया था। उस समय उस शहर का नाम मकसूदबाग था, जो बाद में मुर्शिद कुली खान के नाम पर मुर्शिदाबाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सिराजुद्दौला ने यहां से ही पलासी के युद्ध लड़े, जिसमें उन्हें शहीद कर दिया गया। यहाँ आज भी उनका मकबरा मौजूद है। मीर कासिम अंग्रेजों की सत्ता में यहां के नवाब बने, लेकिन सिर्फ नाम के लिए क्योंकि अधिकार मालगुजारी पर अंग्रेजों का कब्जा था।

हालांकि उसके बाद नवाब तो परिवार के व्यक्ति को ही नियुक्त किया जाने लगा, लेकिन पेंशन के अलावा अन्य प्रोत्साहन नहीं मिलता था। परिवार के सदस्य के नवाब के दावेदारी को भी स्वीकार नहीं किया गया।

वर्ष 1949 से 2015 तक यहां कोई नवाब नहीं रहा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सैयद अब्बास अली मिर्जा के नवाब के दावेदारी के दावे पर मुहर लगाते हुए उन्हें तमाम रियायतों के साथ मुर्शिदाबाद का नवाब स्वीकार किए जाने का निर्देश दिया।

पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की सबसे अधिक आबादी है। आज भी यह जिला ऐतिहासिक पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यहां हर तरफ नवाबी अवधि की यादगारें बिखरी पड़ी हैं। नवाबों की सबसे बड़ी मिलकियत हजार द्वार पैलेस भी पुरातत्व विभाग के अधीन है। मुर्शिदाबाद के नवाबी महलें जहां जीवन तो आबाद है, लेकिन दीवारें यहां के निवासियों के पिछड़ेपन का हाल बयान करती हैं।

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