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आजमगढ़ में मुलायम की परीक्षा, स्थानीय नेताओ का विरोध

लखनऊ,फ़ैसल फ़रीद।आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र ने जब तब देश का ध्यान अपनी ओर खीचा हैं. जहाँ २०१४ में आजमगढ़ ने मुलायम सिंह को जिताया था और मोदी लहर में भी समाजवादी पार्टी की इज्ज़त बचा दी थी वही इससे पहले कांग्रेस को भी आजमगढ़ जीवनदान दे चूका हैं.

इमरजेंसी के बाद एक उप चुनाव में कांग्रेस ने मोहसिना किदवई को आजमगढ़ से उतरा. खुद इंदिरा गाँधी ने रुक कर उनका प्रचार किया और वो जीती. इसके बाद फिर सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई.

आज आजमगढ़ की तरफ फिर निगाह हैं. विधानसभा के नतीजो पर नज़र डाले तो आजमगढ़ समाजवादी पार्टी का गढ़ नज़र आता हैं. आजमगढ़ और लालगंज लोक सभा क्षेत्र मिला कर दस विधानसभा की सीटें हैं. इसमें से नौ पर सपा और एक पर बसपा २०१२ में जीती थी.

खुद मुलायम भी हमेशा अपने प्रचार की शुरुवात आजमगढ़ से करते हैं. सन २०१२ विधान सभा में वो नहीं कर पाए जब जनवरी में बारिश के कारण वो नहीं आ पाए और चुनावी सभा रद्द करनी पड़ी. इस बार हालांकि उन्होंने शुरुवात गाजीपुर में रैली से शुरुवात करी हैं लेकिन हमेशा कहते हैं की आजमगढ़ हमेशा हमारे साथ रहा जिसकी वजह से वो राजनीति में आगे बडे.

पूर्वांचल में आजमगढ़ ही ऐसा जिला हैं जहाँ मुसलमनो ने मुलायम को हाथो हाथ लिया हैं. उनके खिलाफ अगर मुस्लमान भी हुआ तब भी मुसलमान मुलायम के साथ रहे. २०१४ में जब उन्होंने लोक सभा के लिए परचा भरा तब उनके सामने गुड्डू जमाली बसपा से थे. जमाली ने २०१२ विधान सभा चुनाव में मुबारकपुर से सपा को हराया था. मुसलमानों में नारा चला–मुलायम तो जूनून हैं, गुड्डू जमाली अपना खून हैं. लेकिन मुसलमान इस नारे में नहीं बहके और मुलायम के साथ रहे. यहीं आजमगढ़ के कुछ लड़के जब बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए और उसके रिएक्शन में राष्ट्रीय उलेमा कौंसिल का गठन हुआ लेकिन कौंसिल के सदर मौलाना आमिर रशादी भी अपनी ज़मानत मुस्लिम बाहुल्य इलाके से नहीं बचा पाए और मुलायम जीते. इसी आजमगढ़ से पीस पार्टी के सदर डॉ अयूब ने अपने लड़के इरफ़ान को मुबारकपुर से चुनाव लडवाया लेकिन वो बुरी तरह हारा.

इस बार फिर चुनाव हैं और देखना हैं की मुसलमान क्या हमेशा की तरह मुलायम के साथ रहता हैं.
मौजूदा हालात पर नज़र डाले तो पता चलता हैं की मुलायम यहाँ से सांसद हैं लेकिन मुसलमानों के लिए खासकर अभी कुछ ख़ास काम देखने को नहीं मिला. हालात यूँ समझिये की सपा सरकार जिसने पैसा बांटने में कोई कसर नहीं रखी उसने शिबली अकादमी जैसी नामी संस्था को केवल पांच लाख देने का एलान किया जिससे एक बड़ा कमरा भी नहीं बन सकता. ज़ाहिर सी बात हैं अकादमी ने वो पैसा लेने से मन कर दिया.

आजमगढ़ में एक यूनिवर्सिटी की मांग करी गयी, सपा सरकार ने मन कर दिया.
दूसरी कारण जो सपा के नुकसानदेह है वो सपा के स्थानीय मंत्रियो का रवैय्या हैं. सदर से दुर्गा प्रसाद यादव की पकड़ ठीक ठाक है लेकिन बलराम यादव जो मुलायम के ख़ास है और मंत्री भी हैं उनका ज़बरदस्त विरोध हैं. हर सरकार में लोग उनसे दूर होते जाते हैं. उनके लड़के संग्राम यादव अतरौलिया से विधायक हैं लेकिन सपा को लोकसभा में अपने क्षेत्र से भी जिता सके. सपा के नेता भी मानते हैं कि बलराम यादव का जनता में ख़राब छवि पार्टी के हित में नहीं हैं. मौकापरस्त बलराम इस समय अखिलेश खेमे में हैं.

सपा के लिए दूसरी बुरी खबर ये हैं की भाजपा के नेता रमाकांत यादव जो मुलायम के खिलाफ लोकसभा चुनाव लादे थे और दुसरे नंबर पर थे उनका प्रभाव काफी है. यादवो में उनकी पकड़ काफी अच्छी हैं, कम से कम सपा के स्थानीय यादव बिरादरी के नेताओं में. मुलायम खुद खड़े हुए तब भी वो रमाकांत को मात्र ६३००० से हरा पाए थे. आजमगढ़ पूर्वांचल का द्वार माना जाता हैं और ऐसे में भाजपा का वहां विशेष ध्यान हैं.

आंकड़े वही हैं, लेकिन अब मुसलमानों पर एकाधिकार मुलायम का नहीं होता दिख रहा हैं ऐसे में इस वी आई पी क्षेत्र से उलटफेर वाले नतीजे आने की सम्भावनाये हैं.

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