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आजिमे हज के लिए बेहतरीन रास्ते का खर्च तकवा है

नबी करीम (स०अ‍०व०) ने फरमाया-‘‘ ऐ लोगो!

नबी करीम (स०अ‍०व०) ने फरमाया-‘‘ ऐ लोगो! तुम्हारे ऊपर हज फर्ज किया गया है लिहाजा हज करो।’’ हज का जमाना आ गया। बैतुल्लाह के मेहमान बड़ी कोशिश से तैयारी में लगे हैं। हिन्दुस्तान से हाजियों की बड़ी खेप हरमैन शरीफैन को आबाद करने को तैयार है। उनकी तैयारी सिर्फ माद्दी ही नहीं है बल्कि वह रूहानी तैयारियों में भी काफी मसरूफ है। मिलने-मिलाने का सिलसिला भी जारी है। जौक व शौक से उस घर की तरफ दीवाना बने खिंचे चले जा रहे हैं। उस हुक्मे इलाही के पूरा करने का उनका वक्त आ ही गया। ‘‘अल्लाह तआला का हक है लोगो पर उस घर का हज, जो शख्स भी उस तक पहुंचने की इस्तताअत रखता हो।’’ (आले इमरान) और हुज्जाम ‘‘लब्बैक अल्लाहुम्म लब्बैक, लाशरीक लक लब्बैक…’’(मैं हाजिर हूं, मेरे अल्लाह मैं हाजिर हूं, तेरे कोई शरीक नहीं। मैं हाजिर हूं यकीनन सारी तारीफें तेरे ही लिए हैं। सारे एहसानात तेरे ही हैं। बादशाही सरासर तेरी ही है, तेरा कोई शरीक नहीं)।

यही नारा मस्ताना उन हाजियों के कल्ब व शऊर को जिंदा रखता है। यही गिजा उन रूह को हर दम ताजा रखती है। यही ख्याल उनकी फिक्र पर हमेशा गालिब रहता है। इसलिए वह अपने बाल-बच्चों को छोड़ रहा है, अपना घर, अपना कारोबार, अपने नाते-रिश्तेदार, अपने दोस्त व अहबाब, गरज कि बेशुमार अलायक व रवाबित को तोड़कर निकल रहा है। उसके पेशे नजर न कोई सैर व सयाहत, न कोई सजावट, न और कोई गरज बल्कि सिर्फ अल्लाह तआला की खुशनूदी की तलब की खातिर हर हाजी यहां से परवाज से कुछ पहले एहराम बांधकर एक इंतिहाई फकीराना लिबास जेब ए तन करता है जिसमें एक बगैर सिला तहमद और कांधे पर एक चादर रखता है और सर भी नंगा ही है। वह अपने तमाम दुनियावी लिफाफे उतार कर अलग कर देता है। वह जबाने हाल और जबाने काल से पुकारता है कि ऐ अल्लाह! हम बंदे हैं और सिर्फ तेरे ही बंदे हैं। चाहे कोई बादशाह हो या वजीर, कोई अमीर हो या भिखारी, कोई हाकिम हो या महकूम, कोई ऊंचा हो या नीचा, कोई जबरदस्त हो या जेरदस्त, सबको एक ही यूनिफार्म में अपने शहंशाहे हकीकी के दरबार में हाजिर होने की जल्दी है। हर तरह के कौमी, नस्ली, लसानी और वतनी इम्तियाज को पीछे छोड़कर हर तरह की हैवानियत से दूर सादे लिबास में फरिश्तों की मुशाबहत अख्तियार कर रहा है लेकिन अस्ल महरम तो वही होगा जो हालते एहराम में सिर्फ फकीर और बंदा-ए-आजिज होगा जिसने अपने दिल व दिमाग से हर तरह की बड़ाई और खुदाई निकाल दी हो, जिसने कौमी, इलाकाई व नस्ली भेदभाव को अपने जेहन से निकाल बाहर किया हो, जो लोगों के लिए सर से पांव तक रहमत व उलफत और खैर मुजस्सिम बन गया हो ताकि हज के अंदर पोशीदा मसलेहत अल्लाह के कलमे और इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के तरीके की मुवाफिकत के लिए अपने आप को तैयार करने पर कादिर हो सके और इसलिए दुनियावी जिंदगी से किनाराकश होकर कम से कम अपने रब से लौ लगाने और अपने मालिके हकीकी के रंग में रंगने के लिए इन दिनों को खास कर दे।

हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ही की तरह हाजी यह सब कुर्बानियां अपने आका की तलबी पर पेश कर रहा है। उसी की तलबी पर वह उसके घर का तवाफ इश्क के जज्बे से सरशार होकर ऐसे कर रहा है जैसे वह अपने महबूब पर सदके हो रहा हो, यह तवाफ पर अपने महबूब के संगेआस्तान का बोसा भी ले रहा है। कभी वह मुल्तजिम से चिमटता है जैसे गुलाम अपने मालिक की चैखट से चिमटा हुआ हो।

मालिक ने कहा बैतुल्लाह को छोड़कर मैदाने अरफात में आ। गुलाम ने कहा हाजिर हुआ। मुजदुल्फाह तलब किया गया उसने कहा मैं आ गया, मिना बुलाया गया उसने कहा लब्बैक जहां भी खुदावंदे आलम की तरफ से तलवी हुई हुज्जाज लब्बैक कहते हुए दौड़े चले जा रहे हैं। इस शऊरी लब्बैक में एक नशा है जो लाजिमन हर हाजी पर तारी हो जाएगा जिसे यह एहसास हो कि अल्लाह तआला के यहां उस नाचीज की तलबी हुई है। अल्लाह तआला के हुजूर अपनी नियाज मंदी का वालिहाना इजहार कर रहा है और हर हाजी जबाने काल से नहीं बल्कि जबाने हाल से भी इस आयत की तफसीरे नजर आ रहा है -‘‘बेशक मेरी नमाज मेरी कुर्बानी, मेरा जीना-मरना अल्लाह तआला के लिए है।’’ (अल कुरआन)

लेकिन अगर तकवा और रूहे तकवा मौजूद नहीं, अगर यह इरादा और अज्म नहीं कि हम अल्लाह के दीन के लिए माली व जानी कुर्बानी के लिए तैयार हैं तो अल्लाह तआला के यहां कुछ भी नहीं पहुँचेगा और न हमारे आमालनामे में किसी अज्र का इंदराज होगा। इसलिए शऊरी तौर से रूहे हज से वाकफियत के बगैर सिर्फ अरकाने हज की अदायगी से वह कैफियत तारी नहीं हो सकती।

इसलिए हुज्जाज से दरख्वास्त है कि नीचे लिखे नुक्तों पर संजीदगी से गौर व फिक्र करते हुए हज की तैयारी करे तो और ही मजा और लुत्फ आएगा। ‘‘अपनेे साथ जादे राह लिए जाओ, सबसे बेहतरीन जादेराह (राहे खर्च) तकवा है।’’ (कुरआन) वरना हम बकौल अल्लामा इकबाल रह गई रस्म अजां रूह बिलाली न रही के मिस्दाक ठहरेंगे।

नीयत की दुरूस्ती:- हज का फार्म भरने से लेकर इख्तितामे हज तक हम अपनी नीयत को दुरूस्त रखे, अल्लाह से इस्तआनत तलब करते रहे तौफीक मांगते रहे क्योंकि हर अमल का दारोमदार नीयत पर है। (हदीस) किसी तरह नाम व नमूद, शोहरत की चाहत, रिया हमारे दिलों के किसी गोशे मे बैठ न जाए वरना हमारी सब मेहनत बेकार चली जाएगी क्योंकि नीयत ही खालिसतन अल्लाह से लौ लगाने पर हमें हजे मबरूर नसीब होगा। नीयत की दुरूस्ती पर हमारा हर अमल इबादत में शुमार होगा।

अजकार:- अल्लाह तआला ही की याद वह चीज है जिससे दिलों को इत्मीनान नसीब हुआ करता है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है- तुम मुझे याद रखो मैं तुम्हे याद रखूंगा। हमारा दिल किसी तरह भी अल्लाह तआला की याद से गाफिल न हो। ज़ुबान हमेशा अल्लाह के जिक्र से तर हो, कुछ न हो तो कुरआन की जबानी ही तिलावत फरमाएं। कुरआने मजीद तो खुद अल्लाह का जिक्र है।

कुरआन में बार-बार अपने रब को याद करने का हुक्म है। ‘‘अपने रब का जिक्र सुबह व शाम करो’’ (अलदहर) नमाज भी अल्लाह तआला ही के जिक्र के लिए है। बंदा जब लोगों के बीच अल्लाह तआला का जिक्र करता है तो अल्लाह तआला उससे बेहतर मजलिस (मलायका) में बंदे को याद करता है। (हदीस) अल्लाह तआला का जिक्र ऐसे किया करो जैसे अपने बाप-दादाओं का जिक्र करते हो या उससे भी ज्यादा। (कुरआन)

तसबीहात: अपने रब की तसबीह करो जो सबसे बुलंद है, जबान पर हल्का लेकिन मीजान में भारी, सुब्हानल्लाह हर फर्ज नमाजों के बाद तसबीह फातिमी का दोहराना है तैंतीस बार सुब्हानल्लाह, तैंतीस बार अल्हम्दो लिल्लाह चौंतीस बार अल्लाहोअकबर। हर काम की शुरूआत बिस्मिल्लाह से और इख्तेताम अलहम्दो लिल्लाह पर। घर से निकलते वक्त बिस्मिल्लाह अच्छी और खूबसूरत चीज को देखकर माशाअल्लाह। खाने के बाद दुआ याद न होने पर कम से कम अलहम्दोलिल्लाह जरूर कह लिया करें। किसी को रूखसत करते वक्त फी अमानुल्लाह। इस तरह तसबीहात को भी हम अपनी जिंदगी का मामूल बनाएं।

दुआः- (दूसरे बेहतर हैं) या वह (अल्लाह) जो बेकरार की दुआ सुनता है। जब वह उसे पुकारे। (नमल-62) नबी करीम (स०अ‍०व०) ने इरशाद फरमाया- दुआ ही इबादत है। (तिरमिजी, इब्ने माजा, अहमद) और आप (स०अ‍०व०) ने फरमाया- दुआ ही इबादत का मग्ज है। दुआएं हमंे खुदा से करीब करती हैं। मोमिन का हथियार दुआ ही है। हम से जब गलतियां हो जाएं तो उसी से माफी मांगकर मगफिरत की दुआ करें। ‘‘ऐ हमारे रब! हमारी मगफिरत फरमा और हम पर रहम फरमा तू ही सबसे बड़ा रहम करने वाला है।’’ (कुरआन) बहुत सारी मसनून दुआओं की किताब पाकेट साइज में दस्तयाब है जो भी मिले अहले इल्म से मशविरा करके ले लें। उसमें अजकार मसनूना इमाम इब्ने कीम की दुआ के लिए बेहतरीन और कीमती मजमूआ है।

दुआ दिल खोलकर मांगिए। हम फकीर है वह गनी है। अपने भाइयों के लिए, रिश्तेदारों के लिए दीन की सरबुलंदी के लिए, मुजाहिदीन की नुसरत के लिए जरूर दुआ मांगे। मैदाने अरफात की दुआ जरूर ही कुबूल होती है। इस लिए जुहर, अस्र की नमाजों के बाद खड़े होकर सूरज डूबने तक खूब गिड़गिड़ा कर अल्लाह तआला से दुआ करें।

नमाज:- नमाज कायम करो मेरी याद के लिए। (कुरआन) और अपने रब का नाम लेकर नमाज पढ़ी (आला) फलाह की जमानत खुशूअ व खुजूअ वाली नमाज के साथ है। कुरआन में ‘दर्जनों’ मकामात पर नमाज के कयाम का जिक्र है। नमाजे जमाअत से कभी भी गफलत न हो जाए नबी करीम (स०अ‍०व०) हर हाल में नमाज बाजमाअत के लिए मस्जिद तशरीफ ले गए।

अब्दुल्लाह बिन मसूद (रजि0) फरमाते हैं कि मैंने नबी करीम (स०अ‍०व०) से दरयाफ्त किया कौन सा अमल अफजल है? आप (स०अ‍०व०) ने फरमाया वक्त पर नमाज अदा करना। (हदीस) नमाज नबी करीम (स०अ‍०व०) की आंखो की ठंडक है। नमाज मोमिनों की मेराज है। इसके इलावा नफिल नमाजों का कसरत से एहतमाम भी जरूरी है।

अल्लाह के नबी (स०अ‍०व०) से तहज्जुद की नमाज तो कभी तर्क नहीं हुईं अल्लाह तआला ने अपने खलील (अलैहिस्सलाम) से फरमाया- ऐ इबाहीम! मेरे घर को तवाफ करने वालों, एतकाफ करने वालों और रूकूअ व सजूद (नमाज) करने वालों के लिए पाक रखो, बैतुल्लाह शरीफ में हर रिकात का अज्र एक लाख गुना है जबकि मस्जिदे नबवी में एक हजार गुना है। वहां रहकर दुनियावी कामों में मशगूलियत और नमाज बाजमाअत से गफलत बड़ी महरूमी है।

इंफाक फी सबीलिल्लाह:- अल्लाह की राह में उसके बंदो पर खर्च को अल्लाह बहुत पसंद करता है और जिनके माल में एक मालूम हक है, सायल और महरूम का (मआरिज) तुम हरगिज भलाई को न पहुंचोगे जब तक राहे खुदा में प्यारी चीज खर्च न करो। (कुरआन) नबी करीम (स०अ‍०व०) ने फरमाया देने वाला हाथ लेने वाले हाथ से बेहतर है। लोगो! खैरात किया करो, सदका किया करो।

नबी करीम (स०अ‍०व०) ने फरमाया- लोगो! जहन्नुम की आग से बचो चाहे खजूर का एक टुकड़ा देकर क्यों न हो। अल्लाह के दिए हुए माल से सवाली, जरूरतमंद, मिस्कीन, मोहताज और मकरूज को जरूर दे क्योंकि आप वहां खर्च कर रहे हैं जहां की पाक जमीन पर वहि का नुजूल हुआ है।

खिदमते खल्क:- अल्लाह के बंदो की मदद हस्बे इस्तताअत जरूर होनी चाहिए। नबी करीम (स०अ‍०व०) ने फरमाया- जो जमीन वाले पर रहम नहीं करता आसमान वाला उस पर रहम नहीं करता। करो मेहरबानी अहले जमीन पर। खुदा मेहरबान होगा अर्शे बरीं पर। कभी रस्ता भूले को रास्ता दिखा दिया। किसी बीमार के लिए अस्पताल और शिफाखाने से दवा दिला दी। किसी बूढे़ को रास्ता पार करा दिया। अपने साथी कमजोर हाजी के लिए जरूरत की चीजें दिला दीं। अपना खाना लाते वक्त उनका खाना भी होटल से ला दिया। कमजोर हाजी का सामान उनके ठिकाने तक पहुंचा दिया। किसी रूक्न की अदाएगी में मदद कर दी। यही है इबादत यही है दीन व ईमान कि काम आए इंसान के।

अच्छे कामों के लिए कहना और बुरे कामों से रोकना:- अच्छे कामों का हुक्म और बुरे कामों से रोकना एक दीनी फरीजा है जिसे हस्बे मौका जरूर ही अदा करना है। नबी करीम (स०अ‍०व०) ने फरमाया- मेरी एक बात, तुम्हें मालूम हो तो दूसरों तक पहुंचा दो। तुम बेहतरीन उम्मत हो जो सारे जहां वालों के लिए वजूद में लाई गई है। तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और खुदा पर कामिल यकीन रखते हो। कामिल खैर ख्वाही के जज्बे से जो इल्म व दीन आप ने हासिल किया दूसरे को बता दिया कीजिए। अपने रब की तरफ दावत दो हिकमत के साथ और वाज करो दिलनशी अंदाज में। (कुरआन)

सब्रः- ऐ लोगो! सब्र और नमाज से मदद हासिल करो। (कुरआन) सफरेहज में हर कदम पर सब्र के जरिये ही कामयाब हो सकेंगे। नबी करीम (स०अ‍०व०) ने फरमाया- सब्र का बदला जन्नत है और अपने के वास्ते सब्र कीजिए। (कुरआन) किसी ने कुछ कहा। आप (स०अ‍०व०) ने दरगुजर किया, किसी ने बुरा-भला कहा। आप (स०अ‍०व०) ने सब्र किया। बड़ी से बड़ी तकलीफें पहुंची आप (स०अ‍०व०) उस पर साबित कदम रहे। यह भी सब्र है।

शहवानी फेअल:- गुनाह के काम और लड़ाई-झगड़े से परहेज। ‘‘जो शख्स हज के महीनोें में हज की नीयत करे उसे खबरदार रहना चाहिए कि हज के दौरान उससे कोई शहवानी फेअल, गुनाह के काम और लड़ाई-झगड़ा सरजद न हो।’’(कुरआन) ( डाक्टर जफीर अहमद)

———-बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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