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आतंकवाद को सबसे ज्यादा बढ़ावा देता है ईरान : अमेरिका

अमरीकी विदेश मंत्रालय ने ईरान को आतंकवाद को सबसे ज़्यादा बढ़ावा देनेवाला मुल्क कहा है वहीं पाकिस्तान पर लश्कर-ए तैबा, जैश ए मोहम्मद और हक्कानी नेटवर्क के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई नहीं करने का इल्ज़ाम लगाया है. दुनिया भर में आतंकवाद के प्रसार पर जारी अपनी सालाना रिपोर्ट में विदेश विभाग ने कहा है कि साल 2015 में आतंकवाद के मामलों में पिछले साल के मुक़ाबले 13 प्रतिशत की कमी देखी गई, लेकिन उसके ख़तरे में कमी नहीं आई है और ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले संगठन ने अपनी पहुंच और बढ़ा ली है. रिपोर्ट के मुताबिक इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के कब्ज़े वाले इलाकों में कमी आई है लेकिन पूरी दुनिया में आतंकवाद का सबसे बड़ा ख़तरा उसी से है.
रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया अभी भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के मामले में फ्रंटलाइन बना हुआ है. इसमें कहा गया है कि उत्तरी वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज की कार्रवाई से अल क़ायदा कमज़ोर हुआ है लेकिन अफ़गानिस्तान में कई हमलों को पाकिस्तान में मौजूद सुरक्षित पनाहगाहों से अंजाम दिया गया.रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 में पाकिस्तान में भी आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं में कमी आई लेकिन स्कूलों और दूसरे ऐसे ठिकानों को चरमपंथियों ने निशाना बनाना जारी रखा. अमरीकी विदेश विभाग का कहना है कि पाकिस्तान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को संचालित करनेवाली एजेंसी (पेमरा) ने लश्कर-ए-तैबा से जुड़े संगठन जमात उद दावा और फ़लह ए इंसानियत के मीडिया कवरेज पर रोक लगा दी, लेकिन सरकार ने उनके चंदा जुटाने की कार्रवाई पर कोई रोक नहीं लगाई.

रिपोर्ट के अनुसार लश्कर-ए-तैबा और जैश ए मोहम्मद दोनों ही पाकिस्तान में सक्रिय हैं, प्रशिक्षण दे रहे हैं और पैसा जुटा रहे हैं. तहरीक़ ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई है लेकिन अफ़गान तालिबान और हक्क़ानी नेटवर्क के ख़िलाफ़ जैसी चाहिए वैसी कार्रवाई नहीं हुई.
साथ ही रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि पाकिस्तान ने अफ़गान तालिबान और हक्क़ानी नेटवर्क को बातचीत के लिए राज़ी करने की कोशिशों में मदद की है.

रिपोर्ट में बांग्लादेश में भी आतंकवाद के मामलों में तेज़ी दर्ज की गई है और वहां अल क़ायदा और इस्लामिक स्टेट दोनों ने ही विदेशियों, अल्पसंख्यकों और उदारवादी ब्लॉगरों पर हमलों की ज़िम्मेदारी ली है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने परमाणु मामलों पर ज़रूर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ समझौता किया है लेकिन उसने हेज़बुल्ला और दूसरे चरमपंथी संगठनों को आर्थिक मदद और प्रशिक्षण देना जारी रखा है.

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