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आलम की रिहाई में मुफ्ती का हाथ नहीं !

अलहैदगीपसंद लीडर मसरत आलम की रिहाई मामले में एक नया मोड आता दिख रहा है। खबर है कि मसरत के खिलाफ नए इल्ज़ाम दर्ज न किए जाने का फैसला मुफ्ती मोहम्मद सईद का इक्तेदार में आने से एक हफ्ते पहले ही ले लिया गया था।

अलहैदगीपसंद लीडर मसरत आलम की रिहाई मामले में एक नया मोड आता दिख रहा है। खबर है कि मसरत के खिलाफ नए इल्ज़ाम दर्ज न किए जाने का फैसला मुफ्ती मोहम्मद सईद का इक्तेदार में आने से एक हफ्ते पहले ही ले लिया गया था।

ज़ाहिर है यह मुतनाज़ा फैसला जम्मू-कश्मीर में 49 दिनों के गवर्नर राज के दौरान ही ले लिया गया था। मंगल के रोज़ एक रियासत के होम सेक्रेटरी की तरफ से जम्मू के डीएम को लिखा एक खत सामने आया है।

4 फरवरी को लिखे इस खत के मुताबिक मसरत को अब बदअमनी फैलाने के इम्कान की बुनियाद पर ज्यादा दिनों तक जेल में नहीं रखा जा सकता। होम सेक्रेटरी का खत मिलने के बाद डीएम ने एसपी को एक खत लिखा। इसके बाद मसरत को रिहा करने का फैसला लिया गया। ज़राये का कहना था कि मसरत को रियासत में विधानसभा इंतेखाबात के पहले ही रिहा किया जाना था लेकिन इंतेखाबी अमल में खलल पडने के इम्कानात के चलते इस फैसले को रोक लिया गया।

इंतेखाबात के बाद यहां गवर्नर राज लग गया और जैसे ही हुकूमत बनी मसरत को रिहा करने का फैसला ले लिया गया। दूसरी ओर, अलहैदगीपसंद लीडर की रिहाई पर मुफ्ती सरकार ने अपना जवाब मरकज़ी हुकूमत को भेज दिया है।

हैरानी की बात यह है कि मुफ्ती सरकार ने इस जवाब में इस अलहैदगीपसंद लीडर को दो जगह “श्री मसरत आलम” से खिताब किया है। हालांकि इसमें यह भी कहा गया है कि वह अलहैदगी पसंद लीडर हैं और साल 2010 में नौजवानों की तरफ से की गई पत्थरबाजी में उनका किरदार था।

मसरत आलम की रिहाई ने पीडीपी-बीजेपी इत्तेहाद में सियासी तूफान ला दिया है। आलम पर साल 2010 के इलेक्शन के दौरान लोगों को भडकाने का इल्ज़ाम है जिसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे। गुज्श्ता चार सालों से मसरत आलम को पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत बार-बार नज़रबंद किया जाता रहा है।

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