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आवश्यक है विकलांगो को आत्मनिर्भर बनाना

15वीं राष्ट्रीय जनगणना 2011 के अनुसार भारत मे कुल 2.68 करोड़ लोग विकलांगता के शिकार हैं। इनमे से 150564 लोग मानसिक रुप सेविकलांग हैं अर्थात कुल आबादी का 6 प्रतिशत लोग मानसिक विकलांगता का दंश झेल रहे हैं। महत्वपूर्ण ये है कि यें आंकड़े भी ठोस नही हैं क्योंकि इनमें वो लोग और परिवार शामिल नही है जो समाज मे बदनाम होने के डर से अपनी मानसिक बिमारी को लोगो से और कभी-कभी तो अपने परिवार से भी छुपाते हैं।

हालंकि ये अफसोस की बात है कि ऐसे लोगो को एक समान्य जीवन से जोड़ने के लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस कदम नही उठाया जा रहा

है।

लेकिन नई दिल्ली वाई-एम- सी-ए डिवीजन ने 1980 मे ऐसे लोगो के विकास और उन्हे सामान्य जीवन देने के लिए (स्पेशल एजुकेशन)
विशेष शिक्षा देने की शुरुआत की जिसके बदले छात्रों से बहुत कम राशि ली जाती है और वैसे छात्र जो आर्थिक रुप से सक्षम नही हैं उन्हे संस्था द्वारा छात्रवृत्ति भी उपलब्ध कराई जाती है। वाई-एम- सी-ए ने इस ओर ठोस कदम उठाया और इसके अंतर्गत विकलांग बच्चों को सामान्य

बच्चों के साथ शिक्षा ग्रहण करने का भरपूर अवसर दिया ताकि विंकलाग बच्चें भी अन्य बच्चों की तरह एक ही माहौल मे न सिर्फ शिक्षा ग्रहण कर सकें बल्कि इससे उनका मानसिक विकास हो और जीवन मे कुछ करने का लक्ष्य और आत्मविश्वास पैदा हो। इस प्रयास का असर जब साकारात्मक आया तो इसे जारी रखने का निश्चय किया गया साथ ही विकलांगो के विकास की ओर एक और कदम बढ़ाते हुए शिक्षा के साथ साथ वार्षिक क्षमता महोत्सवका आयोजन किया गया |ताकि सांस्कृतिक कार्यक्रम और अन्य कार्यक्रम जैसे- संगीत, नाटक, नृत्य, पेंटिग, हस्तकला- शिल्पकला के द्वारा वो अपनी कला का प्रदर्शन कर सकें और उनके व्यक्तित्व का विकास हो। इस महोत्सव मे दिल्ली के उन 30 स्कूलों को भी सम्मिलित किया गया जहां विकलांग बच्चे अच्छी शिक्षा पा रहे हैं। इस महोत्सव द्वारा सबको एक दूसरे से मिलने और उनकी प्रतिभा को जानने का मौका मिलता है।

इन सब कार्यो द्वारा वाई-एम- सी-ए के कार्यकर्ता विकलांग बच्चो के कौशल को पहचानने ओर उन्हे और आगे ले जाने का काम कर रहे हैं।ताकि विषेश शिक्षा के अंतर्गत शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे अपने आत्मविशवास के बल पर जीवन मे आगे बढ़ सकें। अच्छी बात ये है कि बच्चों के विकास को सिर्फ विशेष शिक्षा तक ही सीमित नही रखा गया है बल्कि फिजियोथैरेपी और वाक – चिकित्सा (स्पीच थेरेपी) द्वारा एक- एक बच्चें की शारीरीक विकास पर भी पूरा ध्यान दिया जा रहा है।

व्यवसायिक प्रशिक्षण देकर भी ऐसे बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही है जिसके अंतर्गत मोमबत्ती, पेपर बैग, लिफाफ बनाना, गिफ्ट पैक करना, इत्यादि काम सिखाए जाते हैं।

सभी विकलांग बच्चों में से कुछ वैसे बच्चे जो भले ही शारीरिक रुप से विकलांग लेकिन मानसिक रुप मे उनकी स्थिति अच्छी है उन्हे कंप्यूटर और घर के छोटे मोटे काम का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। ताकि समय आने पर वो इसका भरपूर प्रयोग कर सकें।

वाई-एम- सी-ए ने वर्ष 1987 मे विकलांगो के लिए विशेष शिक्षा के अलावा विशेष ओलंपिक आंदोलन को करवाने का बीड़ा उठाया। और 1987 से लेकर 2002 तक वाई-एम- सी-ए के निजामउद्दीन प्रखंड नेविशेष ओलंपिक आंदोलन का निदेशक के तौर पर मार्गदर्शन किया। साल 2001 मे आइरलौंड मे होने वाले विश्व विशेष ओलंपिक मे भाग लेने वाले दिल्ली के महावीर जिन्होने शारीरीक रुप से अक्षम होने के बाद भी इटालियन खेल बोछी मे अपना शानदार प्रदर्शन कर स्वर्ण पदक हासिल किया। महावीर के अलावा भी सफलता की ऐसी बहुत सी कहानीयाँ मौजुद है जिसने विशेष शिक्षा के अंतर्गत शिक्षा प्राप्त करने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रौशन कर ये साबीत किया है कि हौंसले के आगे विकलांगता छोटी पड़ जाती है।

अपने शानदार प्रदर्शन के साथ ही अब वाई-एम- सी-ए का उद्देशय विकलांगो के लिए चलाए जा रहे विशेष शिक्षा को उन समुदाय तक पहुंचाने की है जो अब तक इनकी पहुंच से दुर हैं। इस कार्य के लिए कई प्रकार के जागरुकता अभियान को आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों मे किए जाने की योजना है। जिसके अंतर्गत मुख्य रुप से विकलांग जनो के माता पिता को विकलांगता के प्रति जागरुक करने के साथ साथ अपने बच्चों के प्रति उनके रवैये और नजरिये को भी बदलने का लक्ष्य रखा गया है ताकि बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने मे उन्हे पूरी-पूरी मदद दी जा सके।

मानसिक रुप से विकलांग लोगो के लिए समाज की सोच को बदलने का प्रयास इस जागरुकता अभियान का मुख्य विषय है जिससे लोगो को येअहसास हो कि विकलांग जन किसी दूसरी दुनिया से नही आते बल्किहमारे ही समाज का हिस्सा हैं।

(चरखा फीचर्स)

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सरवजीत सिंह

(लेखक वाई-एम- सी-ए निजउद्दीन के सहायक महासचिव हैं।)

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