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आसान नहीं हैं बिना साइकिल चुनाव लड़ना

लखनऊ,फैसल फरीद। उत्तर प्रदेश में चुनाव तो राजनितिक दल और उनके उम्मीदवार लड़ते हैं लेकिन कहीं न कहीं चुनाव निशान का अपना रोल रहता हैं. एक वक़्त ऐसा भी आता हैं जब चुनाव सीधे चुनाव निशान के इर्द गिर्द घूमने लगता हैं.

पार्टियाँ भी ये बात बखूबी समझती हैं इसीलिए वो अपने चुनाव निशान का प्रचार भी ज़बरदस्त तरीके से करती हैं. चुनावी नारे, भाषण भी चुनाव निशान के इर्द गिर्द रहते हैं. ऐसे में जब चुनावी बिगुल बज चूका हैं और पार्टियाँ मैदान में हैं तब समाजवादी पार्टी का झगडा और उसके चुनाव निशान साइकिल की दावेदारी चुनाव आयोग के पाले में हैं. क्या होगा, अगर चुनाव निशान सीज हो गया और अखिलेश, मुलायम को अलग निशान पर चुनाव लड़ना पड़ा.

मुश्किलें दोनों के सामने होंगी. नए चुनाव निशान को इतने कम समय में घर घर पहुचाना बहुत मुश्किल हैं. लाख कहा जाये की आजकल टेक्नोलोजी का ज़माना हैं लेकिन अभी भी उत्तर प्रदेश में चुनाव निशान अहम् भूमिका निभाता हैं. वैसे आप उत्तर प्रदेश की जागरूकता का इस बात से अंदाज़ा लगाये की खुद अखिलेश यादव जब एक सरकारी स्कूल गए और पुचा कि वो कौन हैं तो बच्चे ने जवाब दिया–राहुल गाँधी. यहीं नहीं समाजवादी पेंशन बांटते समय जब एक महिला से पुछा की पेंशन किसने दी तो वो कोई जवाब नहीं दे पाई. ऐसी हालत है प्रदेश की खुद अखिलेश कई बार कह चुके हैं की उन्होंने काम तो बहुत किया है लेकिन प्रचार नहीं कर पाए. ऐसे में नए निशान पर वो कैसे प्रचार कम समय में कर पाएंगे.

दूसरी बात साइकिल को सपा २५ साल से चला रही हैं. उसके नेता अपनी रैलियों में साइकिल चलाते हैं., खुद अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनने के बाद फिरोजाबाद में साइकिल चलायी हैं. साइकिल रैली सपा का अपना प्रचार का तरीका हैं. साइकिल चलाते हुए नेता अपनी फोटो पोस्टर पर छपवाते हैं. खुद अखिलेश की फोटो भी साइकिल चलाते हुए हैं. मुलायम, शिवपाल सबने साइकिल चलायी हैं. यहीं नहीं सपा का प्रचार भी साइकिल के इर्द गिर्द घूमता हैं. सारे नारे, चुनावी गीत सब साइकिल पर बने हैं. कार्यकर्ता अपने नेता को सोने चांदी की साइकिल तक भेट करते हैं. ऐसे में नया चुनाव निशान सब डिस्टर्ब कर देगा.

साइकिल निशान को अखिलेश ने अपनी सरकार में खूब प्रचारित भी किया हैं. सर्कार के लेबर वेलफेयर डिपार्टमेंट ने लगभग ८ लाख साइकिल बांटी हैं. अखिलेश ने खुद अपने हाथ से साइकिल बांटी हैं और मंत्री शहीद मंज़ूर ३४ जिले जा कर साइकिल बाँट कर आये हैं. दूसरी ओर अखिलेश ने लगभग ३००० किलोमीटर साइकिल ट्रैक का निर्माण करवाया हैं. ये उनका ड्रीम प्रोजेक्ट रहा हैं इसके माध्यम से साइकिल का खूब प्रचार भी हुआ हैं. यहीं नहीं इटावा से आगरा के बीच देश का सबसे लम्बा साइकिल ट्रैक बनवाया हैं जिससे साइकिल की खूब ब्रांडिंग हुई हैं.

वहीँ दूसरी ओर साड़ी प्रचार सामग्री मार्किट में दुकानों पर साइकिल निशान की ही उपलब्ध हैं. नया माल बनवाने में टाइम लगता हैं. बहुत नेताओ ने एडवांस बुकिंग कर रखी थी ऐसे में नए सिरे से सब कुछ करना होगा. सबसे बड़ी बात साइकिल निशान जाने पर मतलब सपा ख़त्म. नयी पार्टी, नया निशान और सब कुछ नया–मतलब अखिलेश को एक नयी शुरुवात करनी होगी. ये देखने वाली बात है कि बिना साइकिल के चुनाव इतना आसान भी नहीं हैं जैसे समझा जा रहा है.

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