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इन्सानों की तस्करी में 60 फीसद का इजाफा

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2010 से 2014 के बीच, मानव तस्करी के मामले 3,422 से बढ़ कर 5,486 हुए हैं, यानि कि 60 फीसदी की वृद्धि हुई है। पिछले 5 वर्षों में, मानव तस्करी के मामलों में से केवल 23 फीसदी अभियुक्तों को दोषी ठहराया गया है। कम से कम 45375 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 10134 व्यक्तियों को दोषी ठहराते हुए दंड के रुप में जुर्माना से कर कारावास तक की सज़ा हुई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने अगस्त 2015 को विस्तार से बताया है। अधिकांश पीड़ित (3,351) “अनैतिक तस्करी ‘के तहत दर्ज किए गए हैं, जो यौन गुलामी का एक संदर्भ है। इसके बाद “मानव तस्करी” (2605) के तहत अधिकांश पीड़ितों की संख्या दर्ज हुई है जिसमें पुरुष एवं महिलाएं दोनों शामिल हैं जिन्हें ईंट भट्टों और निर्माण स्थलों पर काम करने के लिए मजबूर किया गया है।

हर रोज़, 15 भारतीयों का उनकी मर्ज़ी के खिलाफ व्यवसाय किया जाता है, जिनका अन्य बातों के अलावा यौन गुलाम होना या बेगार होना भी शामिल है लेकिन भारत में बढ़ती मानव तस्करी के मामलों – 2010 से 2014 के बीच मानव तस्करी के मामलों में 60 फीसदी वृद्धि हुई हैं। को रोकने के लिए तैयार किए गए नए कानून मसौदे की छह कारणों से आलोचना की जा रही है। यह स्पष्ट है कि मौजूदा कानून चार अधिनियमों के कारण विफल रहे हैं। एक दशक के दृष्टिकोण से, 2014 में समाप्त हुए दशक में, छोटी बच्चियों की तस्करी के मामलों में 14 गुना वृद्धि हुई है : उस वर्ष मानव तस्करी में लड़कियों और महिलाओं की हिस्सेदारी 76 फीसदी रही है। भारत में यौन गुलामी के लिए मानव तस्करी की आर्थिक विकास के मेल के साथ वृद्धि हुई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2016 में विस्तार से बताया है।

इन विफलताओं को संबोधित करने एवं मानव तस्करी के विविध पहलुओं – यौन गुलामी , भीख मांगने के लिए मजबूर श्रम और अंग की तस्करी – को संबोधित करने के लिए एक बंद कानून बनाने के लिए एक विधेयक मसौदा तैयार गया है जिसे व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2016, कहते हैं जिसे महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संसद के अगले सत्र में पेश किया जाएगा और यह इन बिन्दुओं के संदर्भ में अपर्याप्त है।

यह विधेयक “व्यक्तियों की तस्करी रोकने एवं तस्करी पीड़ितों को संरक्षण और पुनर्वास प्रदान करने और व्यक्तियों की तस्करी के खिलाफ एक कानूनी, आर्थिक और सामाजिक माहौल बनाने उससे संबंधित मामलों या आनुषंगिक के लिए” पेश किया जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की इस रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में मानव तस्करी के कम से कम 5,486 मामले – या जैसा कि हमने कहा प्रतिदिन 15 मामले दर्ज किए गए हैं। संस्थाएं जैसे कि मुंबई की रेक्यू फाउंडेशन और कोलकाता की संजोग, ने विधेयक के संबंध में चिंता व्यक्त करने के लिए एक समूह का गठन किया है। इसके खिलाफ मुख्य आलोचना पुनर्वास और अभियोजन पक्ष को लेकर हैं। 2015 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के इस अध्ययन के अनुसार, तस्करी से छुड़ाए गए 80 फीसदी बच्चों पर फिर से तस्करी का शिकार होने का खतरा रहता है। अधिकांश पीड़ित लंबे समय तक मानसिक विकारों से ग्रसित होते हैं जैसे कि अभिघातजन्य तनाव विकार (PSTD) , अवसाद और डायस्थायमिया (लंबे समय तक पीटीएसडी और अवसाद)।

कोलकाता की संस्था, संजोग द्वारा 2010 में की गई अध्यय, ब्रिंग इट ऑल बैक होम, के अनुसार पीड़ितों के पुनर्वास केन्द्रों से वापस आने के बाद कम से कम 78 फीसदी पीड़ितों में डायस्थायमिया का परिक्षण सकारात्मक पाया गया है। रुप सेन, संजोग भारत के सह-संस्थापक ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “वर्तमान में अधिकांश केन्द्रों में करीब 100 से भी अधिक लड़कियां हैं, और वे सलाहकारों और मनोवैज्ञानिकों प्रदान करते हैं जो उन्हें इससे बाहर निकलने में मदद करते हैं।” संजोग अध्ययन कहती है, सेन कहते हैं, वर्तमान प्रणाली एक “हिरासत दृष्टिकोण” का इस्तेमाल करती है जहां पीड़ित की राय को ध्यान में नहीं लिया जाता है। आवश्यकता है इसे “दृढ दृष्टिकोण” में बदलने की जिसमें पीड़ितों को शामिल किया जाए विशेषकर इसलिए क्योंकि बचाई गई लड़कियों में से 57 फीसदी वयस्क हैं।

सजा के निम्न स्तर के लिए प्राथमिक कारण धन और अलग-अलग राज्यों में 232 विरोधी मानव तस्करी यूनिट (AHTUs) के बीच समन्वय की कमी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2016 में विस्तार से बताया है। सेन कहते हैं, उद्हारण के तौर पर जब जांच अधिकारियों को राज्य की सीमाओं के पार के तस्कर को ट्रैक करते हैं, जांच और यात्रा की लागत चार साल तक के लिए प्रतिपूर्ति की जाती है, जो कई अधिकारियों के लिए हतोत्साह करनेवाली होती है। विधेयक, तस्करी के मामलों को संभालने के लिए एक नई एजेंसी की परिकल्पना करता है लेकिन इसके अधिकार और राशि स्पष्ट नहीं है।

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