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इबरत के मुक़ाम क़ब्रिस्तान में होर्डिंग नसब, वक़्फ़ बोर्ड फ़ौरी हरकत में आए

नुमाइंदा ख़ुसूसी - शहर में कोई क़ब्रिस्तान शायद ही ऐसा हो जहां अल्लाह के किसी पसंदीदा बंदा या वली की मज़ार ना हो या फिर शहरे ख़मोशां में उल्मा-ओ-मशाइख़ीन की हस्तियां आराम फ़र्मा ना हों जहां उन की क़ुबूर ना हूँ। क़ब्रिस्तान से बढ़ कर इंसा

नुमाइंदा ख़ुसूसी – शहर में कोई क़ब्रिस्तान शायद ही ऐसा हो जहां अल्लाह के किसी पसंदीदा बंदा या वली की मज़ार ना हो या फिर शहरे ख़मोशां में उल्मा-ओ-मशाइख़ीन की हस्तियां आराम फ़र्मा ना हों जहां उन की क़ुबूर ना हूँ। क़ब्रिस्तान से बढ़ कर इंसान के लिए और कोई इबरत का मुक़ाम नहीं होसकता। क़ारईन गौरतलब बात ये है कि आजकल इबरत के मुक़ाम क़ब्रिस्तान को भी आमदनी का ज़रीया बनालिया गया है।

इंसानों के असल घर (क़ब्रिस्तान) के ज़रीया ग़लत तरीक़ों से आमदनी हासिल करने के सिलसिला में कोई और नहीं ख़ुद हमारा ग़ैर कारकरद और काहिल महिकमा वक़्फ़ बोर्ड है। आज शहर के कई क़ब्रिस्तानों पर ऐसी होर्डिंग्स लगादी गई हैं जिस से उरयानीयत साफ़ ज़ाहिर होती है। दरगाह हज़रत शाह अबदुलक़ादिर सोफ़ीऒ (ख़ानक़ाह रोज़अलासफ़याय) की बाओनडरी के अंदर एक फ़िल्म की होर्डिंग लगी है।

होना तो ये चाहीए था कि इस दरगाह शरीफ़ के जो भी ज़िम्मेदार हैं वो इस किस्म की ख़ुराफ़ात की किसी को भी इजाज़त ना देते। मज़ारों और क़ब्रिस्तानों की बेहुर्मती होने से पहले इस को रोका जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस ख़ानक़ाह पर हर रोज़ सैंकड़ों अक़ीदतमंद ज़यारत के लिए हाज़िर होते हैं। हुसैन सागर से बिलकुल मुत्तसिल है और एक क़दीम क़ब्रिस्तान है।

होर्डिंग लगाने के लिए जो आहनी खंबे नसब किए गए हैं वो दरगाह के अंदरूनी हिस्सा में खुदवाई के बाद लगाए गए हैं। क़ब्रिस्तानों पर फिल्मों या शराब के उर्यां इश्तिहारात, पोस्टर्स या होर्डिंग का लगाया जाना ना सिर्फ दीनी लिहाज़ से नाजायज़ है बल्कि दुनियावी एतबार से भी गै़रक़ानूनी अमल है।

क़ारईन अब आप बतईए कि जिस वक़्त इश्तिहारी कंपनीयों से मुआहिदा होता है इस में ये बात वाज़िह तौर पर लिखी जाती है कि क़ब्रिस्तानों, मसाजिद, हज हाओज़ की अराज़ी पर शराब और फिल्मों के पोस्टर्स या होर्डिंग लगाने की हरगिज़ इजाज़त नहीं होगी और कंपनी इस शर्त को मंज़ूर करते हुए मुआहिदा करती है लेकिन सद अफ़सोस के हसीन सागर कटा से मुत्तसिल दरगाह शरीफ़ और क़ब्रिस्तान में फ़िल्म की होर्डिंग्स लगाई गई हैं।

फ़िल्म की होर्डिंग के ज़िमन में वक़्फ़ बोर्ड और मुताल्लिक़ा इश्तिहारी एजैंसीयों को बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा कमाती हैं। फिल्मों के इश्तिहारी होर्डिंग्स में से ख़ूब मुनाफ़ा कमाया जाता है। ऐसा मालूम होता है कि इश्तिहारी कंपनीयां भी वक़्फ़ बोर्ड की कमज़ोरीयों से वाक़िफ़ होगई हैं। वक़्फ़ बोर्ड के ओहदेदारों और अमला को कंपनीयां भी शायद अब अच्छी तरह पहचानने लगी हैं।

उन्हें अंदाज़ा होगया है कि ओक़ाफ़ी इमलाक पर क़बज़ा करलीं, मसाजिद को मकानों या गया रेजों में तबदील करलीं या फिर क़ब्रिस्तानों पर फिल्मों के होर्डिंग्स लगाऐं तो वक़्फ़ बोर्ड हसब-ए-आदत बेहिसी का ही मुज़ाहरा करेगा और इस के ओहदेदारों में कोई जुंबिश तक नहीं होगी। होसकता है कि वक़्फ़ बोर्ड को फिल्मों की होर्डिंग्स से अच्छी आमदनी होती होगी लेकिन क़ब्रिस्तानों जैसे मुक़ामात इबरत पर ग़ैर ग़लत क़ाबिल एतराज़ होर्डिंग्स नसब करने की इजाज़त दे कर ग़लत तरीक़े से आमदनी हासिल करना कभी अच्छी बात नहीं समझी जाएगी बल्कि बोर्ड और इस के हुक्काम की ये हरकत सख़्त क़ाबिल एतराज़ कहिलायगी जिस पर बोर्ड को तवज्जा दीनी चाहिए।

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