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इस्मतरेज़ि, फ़ांसी और सियासी शोबेदा बाज़ी

दिल्ली में इतना बड़ा इस्मत रेज़ि का वाक़िया पेश आने और पूरी दिल्ली में एहतिजाज-ओ-नारा बाज़ी और पुलिस की चौकसी के बाद नए साल के आग़ाज़ की रात एक 17साला स्कूल तालिबा के साथ दिल्ली के पाश इलाके‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍ सफदरजंग एनक्लेव में इस्मत रेज़ि की

दिल्ली में इतना बड़ा इस्मत रेज़ि का वाक़िया पेश आने और पूरी दिल्ली में एहतिजाज-ओ-नारा बाज़ी और पुलिस की चौकसी के बाद नए साल के आग़ाज़ की रात एक 17साला स्कूल तालिबा के साथ दिल्ली के पाश इलाके‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍ सफदरजंग एनक्लेव में इस्मत रेज़ि की गई और ठीक उसी रात से पहले ऐसी मुतअद्दिद ख़बरें भी आई, जिन में दिल्ली में ही मुतअद्दिद लड़कीयों के साथ छेड़छाड़ और जिन्सी हिरासानी के वाक़ियात पेश आए।

ऐसी भी ख़बरें मुलक की दीगर रियास्तों ख़ुसूसन राजिस्थान हरियाणा और उत्तरप्रदेश से भी आई कि लड़कीयों की इस्मत रेज़ि की गई उन के साथ जिन्सी ज़्यादती की गई और उन्हें जला दिया गया या मार डाला गया। हाँ!इस नए साल के आग़ाज़ में ऐसी जो ख़बरें आई हैं इस से एहसास-ए-महरूमी नाउम्मीदी और ग़म-ओ-ग़ुस्सा में इज़ाफ़ा कर दिया है।

पूरा मुल्क इस तरह के वाक़ियात से पशेमान-ओ-परेशान है पूरा हिंदुस्तान एसे वहशयाना वाक़ियात पर शर्मिंदगी महसूस कररहा है। हर रोज़ मासूमों को सताया जा रहा है हर दिन उन की इस्मतें लूटी जा रही हैं और हर रोज़ इन मासूम लड़कियों और ख़वातीन की इज़्ज़तें तार तार की जा रही हैं।

क्या ये इंसानियत के नाम पर बदनुमा दाग़ नहीं है? लेकिन इन तमाम वाक़ियात के पेश आने के बावजूद सियासतदां अजीब-ओ-ग़रीब बयानात जारी कररहे हैं। अजीब अजीब माफ़ौक़-उल-आदत और माफ़ौक़-उल-फ़ित्रत बातें कररहे हैं और इन तमाम इस्मत रेज़ि के वाक़ियात के साथ साथ हम एसे मुआमलात का रेप कर रहे हैं इस पर ख़ूब सियासत हो रही है सियासत सिर्फ़ कांग्रेस और दाएं बाज़ू वाली जमातों के दरमयान नहीं होरही है बल्कि आम शहरीयों और फ़ौजीयों के दरमयान भी सियासत शुरू होचुकी है।

में अपने इस क़ीमती तहरीर को मुतनाज़ा बनाने की ख़ाहिश नहीं रखती हूँ। सब से बुनियादी बात इस सिलसिले में ये यही कही जा सकती है कि किसी भी क़लई साज़ टेलर मास्टर्स फ़ौजीयों मुल्लाहों ग़रीब अफ़राद अमीर लोगों फ़क़ीरों चोरों मंत्रियों या उन से वाबस्ता संतरियों को किसी भी तरह से क़ानूनी या गै़रक़ानूनी तौर पर इस मुआमले में टांग अड़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है । किसी भी सरकारी ओहदेदार या सरकारी चमचे को इस मुआमले में मुदाख़िलत का कोई हक़ हासिल नहीं है।

ये अनोखी बात सुन कर हैरत भी हो रही है कि वो अह्द वसती के ज़माने की बातें कररहे हैं और मुतालिबा कर रहे हैं कि ख़ातियों को फांसी दे दी जाये या उन्हें नामर्द बनादिया जाये । आज के कुछ दाएं बाज़ू जमात से ताल्लुक़ रखने वाले सियासतदां इस बात का मुतालिबा कररहे हैं कि अह्द वसती से ताल्लुक़ रखने वाले बादशाहों या दूसरे तानाशाही अह्द के तानाशाहों की तरह राइज करदा सरकलम किए जाने या उज़ू मख़सूस की बुरीदगी की बातें कररहे हैं ।

में एक ज़माने से ये लिखती आ रही हूँ कि फांसी दिया जाना या उन ख़ातियों को नामर्द बना दिया जाना इस मसले का हल नहीं है । दरहक़ीक़त ये तरीक़ा सरासर नर अजीत की अलामत है । इस तरीक़े से सैंकड़ों मासूमों की जानें तलफ़ हो जाएंगी या आअज़ा रईसा नाकारा बना दिए जाऐंगे और इस काम को वो लोग अंजाम देंगे जिन का उन से कोई ना कोई रिश्ता या ताल्लुक़ होगा ।

जिस तरीक़े से सरकारी मिशनरी में तेज़ी से कुरप्शन सराएत करता जा रहा है इस से पर हक़ीक़त साबित होचुकी है कि जो असल ख़ाती होते हैं वो अपनी इक़तिदार की ऊंची कुर्सीयों पर निहायत सुकून-ओ-इतमीनान के साथ बिराजमान होती हैं लेकिन जो पैदल राहरू होते हैं उन्हें उन के नाकर्दा गुनाहों की सज़ा मिल जाती है और उन्हें इस मुलक की जेलों में बंद कर दिया जाता है ।

उन पर मुक़द्दमात चलाए जाते हैं और फिर अदालतें इन मुक़द्दमात की समाअत में मसरूफ़ होजाती हैं । इस लिए इस बात का बहुत कम एहतिमाल पाया जाता है कि बेगुनाहों पर इस्मत रेज़ि के इल्ज़ामात आइद नहीं किए जाऐंगे और उन्हें फांसी पर नहीं लटकाया जाएगा और ये बात हम सालों बाद महसूस कर रहे हैं कि असल ख़ाती वो लोग हैं जिन पर फ़िर्कावाराना कशीदगी फैलाने के इल्ज़ामात आइद किए गए हैं ।

एसे सियासतदां असल गुनहगार हैं जिन पर फ़िर्कावाराना मुनाफ़िरत फैलाने का इल्ज़ाम है और जिन्होंने पुलिस मिशनरी पर पूरी तरह कंट्रोल कर रखा है । पुलिस उन के इशारे पर नाचती है उन के हुक्म के आगे सर तस्लीम ख़म करती है । इस सिस्टम में हम मासूमों को ही फांसी पर लटकाएं गे और गुनहगार आज़ादाना खुली फ़िज़ा में सांस लेंगे । ये तरीका-ए-कार इस बर्फ़ को पिघलने नहीं देगा जो बरसों से यूं ही हमारे मुआशरे और हमारे मुलक में पाया जाता है ।

अगर हम इक़तिदार के ग़लत इस्तिमाल का रिकार्ड मुशाहिदा करें तो अंदाज़ा होगा कि इन सियासतदानों में एसे एसे गुनहगार मौजूद हैं जिन्हों ने इक़तिदार का ग़लत इस्तिमाल कर के गै़रक़ानूनी ग़ैर इंसानी और ग़ैर फ़ित्री आमाल के ज़रीये मुलक को बर्बादी की राह पर डाल दिया है और कमाल की बात ये है कि यही लोग मुलक की तरक़्क़ी की बातें करते हैं और मुलक की ग़ैर मौज़ूं तौर पर तरक़्क़ी की वकालत करते हैं जिस का हक़ीक़त से कोई रिश्ता नहीं होता है और ना ही उन की बातों में सदाक़त नज़र आती है ।

इस से क़बल कि हम इस गुनाह के मुताल्लिक़ कोई फ़ैसला सादर करें या किसी सख़्त सज़ा की मांग करें हमें बाली वुड प्रोड्यूसर्स और डाइरेक्टर्स को भी निशाना बनाना चाहीए जो थर्ड क्लास की फिल्में बनाने में मसरूफ़ हैं जो अरयानीत को बढ़ावा देने में लगे हैं और जो आइटम सांग के नाम पर फ़हश रक़्स और जिस्म की नुमाइश को बढ़ावा दे रहे हैं ।

उन्हें इस तरह की फिल्में बनाने उन की तशहीर करने और अरयानीत को फ़रोग़ देने की इजाज़त क्यों दी जाती है ? एसे रक़्स के ज़रीये आइटम गर्ल्स के जिस्मानी नशेब-ओ-फ़राज़ को इस तरह कैमरे के सामने पेश किया जाता है कि जिसे देखने के बाद नाज़रीन के दिलों में हीजानी और शहवानी कैफ़ीयत पैदा होती है ।

अब ये मुनासिब-ए-वक़्त आगया है कि एसे अवामिल को अपने बीच‌ से दूर किया जाये जो इंसानों को दरिन्दा बनने पर मजबूर करते हैं जिस की वजह से इंसानों में वहशयाना हरकतें अंजाम देने की ख़ाहिश पैदा होती है जबकि बाली वुड के बड़े बड़े स्टारस सयासी तौर पर बरसर-ए-इक़तिदार पार्टी का हिस्सा हैं लेकिन उन के ज़रीये एसी कोई कोशिश नहीं की जा रही है जिस से फिल्मों में अरयानीत को बढ़ावा देने से रोका जाये ।

उन फ़िल्मसाज़ों में से किसी पर भी अरयानिय‌त की तशहीर के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार नहीं किया जाता जो फ़ह्हाशी को आम लोगों तक फैलाने और उन के ख़ाबीदा ख़ाहिशात को बरअंगेख़्ता करने का काम करते हैं इस लिए हमें आगे बढ़ कर एसी फिल्में बनाने वालों का बाईकॉट करना चाहीए उन को सज़ा दिलाने की मांग करनी चाहीए जो लड़कीयों को बाज़ारों में उर्यां कर के पेश करते हैं जो अरयानीत की तशहीर अपने फिल्मों और आइटम सांग के ज़रीये करते हैं जिस की वजह से नाज़रीन के दिलों में इस के तईं ख़ाहिशात अनगड़ाईआं लेने लगती हैं ।

हमें इस्मत रेज़ि के बुनियादी अवामिल को ख़त्म करना होगा जो इस घटिया हरकत अंजाम देने के लिए नौजवानों को उकसाते हैं इस पर हमें संजीदगी से ग़ौर करने की ज़रूरत है ।
-हुमेरा क़ुरैशी

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