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इस्लामी सज़ा का नफ़ा

इस्लाम ने ख़ाहिशात को जायज़ तरीक़ा से पूरा करने के लिए निकाह को बहुत आसान बनाया है। फिर ज़िना के मवाक़े को पर्दे का हुक्म दे कर और मख़लूत महफ़िलों से रोक कर बहुत मुश्किल बना दिया है। ऐसी सूरत में ज़िना का सुबूत मिलने की चंद सूरते हैं:

इस्लाम ने ख़ाहिशात को जायज़ तरीक़ा से पूरा करने के लिए निकाह को बहुत आसान बनाया है। फिर ज़िना के मवाक़े को पर्दे का हुक्म दे कर और मख़लूत महफ़िलों से रोक कर बहुत मुश्किल बना दिया है। ऐसी सूरत में ज़िना का सुबूत मिलने की चंद सूरते हैं:

*कोई शख़्स ज़िना बिलजब्र करे और औरत अदालत में गवाही दे कर साबित करे कि एक दरिन्दा नुमा इंसान ने मेरी इज़्ज़त को लूट लिया और मर्द अपने जुर्म का इक़रार कर ले। दूसरे लफ़्ज़ों में औरत ये कह रही है कि इस शख़्स ने मुझे मुआशरा में बाइज़्ज़त ज़िंदगी गुज़ारने से महरूम कर दिया। इस शख़्स ने मुझे कलबी सुकून से महरूम करके मेरी ज़िंदगी को अज़ाब बना दिया।

इस शख़्स ने मुझे ग़ैर महफ़ूज़ होने का एहसास दिलाकर सारी ज़िंदगी के लिए मुझे ख़ौफ़ में मुबतला कर दिया। इस शख़्स ने मेरा पर्दा बकारत ज़ाइल करके मुझे होने वाले ख़ावंद की नज़र में बेआबरु कर दिया। इस शख़्स ने मुझे हामिला बनाकर हराम बच्चा जनने पर मजबूर कर दिया, लोग ताने दिया करेंगे, मैं इस बच्चे की परवरिश कैसे करूंगी और कौन इसका वली बनेगा?।

मेरा होने वाला बच्चा सारा अमल हरामी यानी वलदुल ज़ीना कहलाएगा। लिहाज़ा क़ाज़ी साहिब से गुज़ारिश है कि मुझ पर और मेरे होने वाले बच्चे पर जो ज़ुल्म हुआ है, इसका बदला लिया जाए। इंसाफ़ का राग अलापने वाले ज़रा अपने ज़मीर की अदालत से फ़ैसला लें कि इस मुआमले में मज़लूमा का साथ दिया जाए या ज़ालिम का?। ज़ालिम का साथ देने का मतलब तो ये है कि इसे मामूली सज़ा दे कर आज़ाद कर दिया जाए, यानी इसे इस काम का एक और मौक़ा फ़राहम किया जाए।

मज़लूमा का साथ देने का मतलब ये है कि ज़ालिम को सख़्त तरीन सज़ा दे कर आइन्दा के लिए इस किस्म के ज़ुल्म का दरवाज़ा बंद कर दिया जाए। शरीयत ने अदल-ओ-इंसाफ़ के उसूलों की हिमायत करते हुए ज़ुल्म के दरवाज़े को बंद करने का हुक्म दिया है, लिहाज़ा ज़ानी को ऐसी सज़ा मिलनी चाहीए कि लोग उसे देख कर इबरत हासिल कर सकें।

* मर्द-ओ-औरत ज़िना बिल रज़ा करें, फिर ख़ौफ़ ए ख़ुदा से डरकर, क़ियामत की रुसवाई से बचने के लिए और दुनिया में पाक होने के लिए ख़ुद क़ाज़ी के सामने जुर्म का एतराफ़ कर लें। इस सूरत-ए-हाल में दुनिया की जितनी बड़ी सज़ा भी मिल जाए, वो आख़िरत की ज़िल्लत-ओ-रुसवाई और अज़ाब के मुक़ाबले में कोई हैसियत नहीं रखती।

* मर्द-ओ-औरत अलल-ऐलान बेखौफ-ओ-ख़तर ज़िना करते हुए पकड़े गए। अदालत में सुबूत मिल जाने के बाद दो सूरतों मुम्किन हैं, एक तो ये कि मर्द-ओ-औरत को मामूली सज़ा दे कर आज़ाद कर दिया जाये, ताकि वो जानवरों की तरह सड़कों के किनारे दुबारा इस फ़ेअले बद के मुर्तक़िब हों और दूसरों को भी दावत ए गुनाह दें। इस तरह तो मुआशरा से हया का जनाज़ा निकल जाएगा और इंसान-ओ-हैवान का फ़र्क़ ख़त्म हो जाएगा। जबकि दूसरी सूरत ये है कि मर्द-ओ-औरत को सख़्त तरीन सज़ा दे कर बेहयाई का दरवाज़ा बंद कर दिया जाए।

शरीयत ने शर्म-ओ‍हया की पासदारी करते हुए रजम का हुक्म देकर ज़ानी और ज़ानिया को बरसर-ए-आम ऐसी सज़ा तजवीज़ की है, ताकि लोग आइन्दा के लिए कानों को हाथ लगा लें कि हम को ऐसी बेहयाई नहीं करनी है। साबित हुआ कि रजम वहशियाना सज़ा नहीं, बल्कि निहायत मुंसिफ़ाना सज़ा है, अदल-ओ-इंसाफ़ की हिमायत करने वाले लोग इस हक़ीक़त को तस्लीम करने से इनकार नहीं कर सकते।

अवामुन्नास को रजम से वहशत महसूस होने की दो वजूहात हैं। अगर ठंडे दिल-ओ-दिमाग़ से सोचा जाए तो मौत की सज़ा कोई अनहोनी बात नहीं है। दो रोज़ा ज़िंदगी में इसकी कई मिसालें पेश की जा सकती हैं। अगर किसी इमारत को बनाते वक़्त मार्बल पत्थर या टाइल्स लगाए जाएं तो ज़रूरत के तहत पत्थरों और टाइल्स को काट काट कर टुकड़े कर दिया जाता है।

बदनुमा हिस्सों से नजात हासिल करके ऐसे पत्थर लगाए जाते हैं, जो ख़ूबसूरत लगे। इसी तरह ज़ानी मुआशरा का बदनुमा फ़र्द है, उसे रजम के ज़रीया मौत की नींद सुलाकर साफ़ सुथरे पाकीज़ा मुआशरा को प्रवान चढ़ने दिया जाता है। इसी तरह खेती बाड़ी और ज़राअत का इलम रखने वाले जानते हैं कि बाअज़ औक़ात खेतों में ख़ुदरो पौधे उग आते हैं। अगर उनको उखाड़ा ना जाए तो ये खेतों में बीमारी यानी वाइरस वग़ैरा फैलने का ज़रीया बनते हैं, बल्कि इज़ाफ़ी ख़ुराक इस्तेमाल करके खेती के असल पौदों को कमज़ोर कर देते हैं।

इन पौधों को दवाओं के ज़रीया मार दिया जाता है या इनको जड़ से उखाड़ दिया जाता है। दुनिया के हर मुल्क में ऐसी दवाएं आसानी से मिलती हैं, कोई एतराज़ नहीं करता कि पौधे की ज़िंदगी को क्यों ख़त्म किया जाता है?।

फलों और फूलों के दरख़्तों की शाख़ें तराशना रोज़मर्रा का मामूल बन चुका है। अगर कोई माली को देखे कि इस ने तर-ओ-ताज़ा पत्तों वाली शाख़ें काट कर ढेर लगा दिया तो ख़ुश होते हैं कि अब हमारा बाग़ या लॉन ख़ूबसूरत नज़र आएगा। फलदार दरख़्त की जो शाख़ें ख़ुश्क हो जाती हैं, उन्हें काटा ना जाए तो बक़ीया शाख़ों का फल कम हो जाता है, लिहाज़ा ऐसी शाख़ों की तराश लाज़िमी समझी जाती है।

मुआशरे में ज़ानी शख़्स को ज़िंदा रहने दिया जाए तो माहौल-ओ-मुआशरे में बेहयाई का वाइरस फैल जाता है, लोगों में हया के फल फूल कम हो जाते हैं, इसलिए ज़ानी की सर तराशी ज़रूरी है, ताकि बक़ीया मुआशरे को बेहयाई की ख़तरनाक बीमारी से बचाया जा सके।

अगर इंसान के जिस्म के किसी अज़ू में कैंसर हो जाए तो उसे काट कर अलग कर दिया जाता है। इसी तरह शूगर के बहुत से मरीज़ों के पाओ‍ं में कुछ इस किस्म का फोड़ा हो जाता है कि पैर काट कर बाक़ी जिस्म को बीमारी से बचा लिया जाता है। बाअज़ लोगों के पैरों में नाक़ाबिल ए ईलाज फोड़ा होने की वजह से उन की पूरी टांग काट दी जाती है। इसी तरह ज़ानी शख़्स भी मुआशरा के जिस्म पर फोड़े की मानिंद होता है, उस को रज्म करके फोड़े का ऑप्रेशन कर दिया जाता है और मुआशरा को बेहयाई की बीमारी से बचा लिया जाता है।

दुनिया के तरक़्क़ी याफ़ता ममालिक में भी अगर कोई शख़्स मुल्क के साथ ग़द्दारी करे तो उसे सज़ाए मौत दी जाती है। इसे इंसाफ़ के नामलेवा हरगिज़ बुरा नहीं समझते। अदालत सज़ाए मौत का हुक्म जारी करे तो पूरे मुलक में ख़बरें नशर की जाती हैं, ताकि अवाम को पता चल जाए और आइन्दा कोई दूसरा शख़्स ऐसी हरकत की जुर्रत ना करे। दीन ए इस्लाम ने भी अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से ग़द्दारी करने वाले ज़ानी शख़्स को सज़ाए मौत का हुक्म दिया और अवाम के मजमा में हद जारी करके बता दिया कि आइन्दा कोई दूसरा शख़्स ऐसी हरकत दुहराने की जुर्रत ना करे।

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