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इस्लाम की नशात ए सानिया के लिए जामे मंसूबा बंदी की ज़रूरत

सारी ज़मीन अल्लाह ताला की मिल्कियत है, वो जिस को चाहता है इस का वारिस बनाता है।

सारी ज़मीन अल्लाह ताला की मिल्कियत है, वो जिस को चाहता है इस का वारिस बनाता है।
ज़मीन पर किसी की इजारादारी नहीं और कोई ज़मीन हमेशा किसी की मम्लूक‍ ओ‍ मक्बूज़ा नहीं रही। इन्क़िलाबात ( क्रांती ) ज़माना के साथ साथ ज़मीन‌ के मालिक‍ ओ‍ वारीस‌ भी तबदील होते रहते हैं। दुनिया की तारीख़ में कोई क़ौम हमेशा एक सरज़मीन पर सुकूनत पज़ीर और हाकिम नहीं रही, बल्कि एक मूल्क के बाशिंदा का दूसरे मूल्क को हिज्रत करना और दूसरे मूल्क के साकिन का पहले मुल्क को अपना मस्कन बनाना क़ानून-ए-फ़ित्रत की तरह क़दीम है।

अल्लाह ताला के क़ानून में किसी मुल़्क पर हुक्मरानी करने के लिए इस का क़दीम से रिहायश पज़ीर होना वजह तर्जीह नहीं, बल्कि हुक्मरानी के लिए सलाहीयत-ओ-क़ाबिलीयत मोतबर है। अल्लाह ताला का इरशाद है तहक़ीक़ कि हम ने तौरात के बाद ज़बूर में लिख दिया है कि मेरे नेक (सलाहीयत रखने वाले) बंदे ज़मीन (की सल्तनत) के वारिस होंगे। (सूरत अन्बीया ।१०५)

ज़मीन का सीना इंसान की तरह तंग-ओ-तारीक नहीं, बल्कि वो अपने अंदर लामुतनाही वुसअत रखती है, जो भी इस में बस्ता है, वो इस का दिल से इस्तेक्बाल करती है और अपनी कोख में इस को पनाह देती है, जिस तरह माँ अपने बेटे को सीने से चिम्टा लेती है।
मुसल्मान हिंदूस्तान की ज़रख़ेज़ ज़मीन का रुख किए तो सरज़मीन हिंद ने मुसल्मानों का इस्तिक्बाल किया। पसमांदा तबक़ात पर ज़ुल्म-ओ-बरबरीयत का शिकवा की और अदल-ओ-इंसाफ़ और अमन-ओ-अमान, भाई चारा की उम्मीद में मुसल्मानों को हुक्मरानी की दावत दी।

अहल ए इस्लाम ने कई सदीयों तक इस ज़मीन पर हुकूमत की। रंग-ओ-नसल, अक़ाइद-ओ-नज़रियात के इख़तेलाफ़ के बावजूद सरज़मीन हिंद को अमन-ओ-अमान, प्यार-ओ-मुहब्बत का गहवारा बनाए रखा और जब मुसल्मानों में क़ाइदाना सलाहीयतें मफ़क़ूद हो गईं तो अल्लाह ताला ने उन के सरों से ताज ए क़ियादत छीन लिया और बरसहा बरस बीत जाने के बाद भी मुसल्मान अपनी गुमशुदा दौलत क़ाइदाना सलाहीयत के हामिल ना बन सके। आज तक मुस्लिम क़ौम ख़ुद एतिमादी, क़ुव्वत-ए-इरादी, बुलंद हौसलगी, क़ाइदाना जौहर, वसीअ उल-नज़री जैसे आला सिफ़ात से महरूम है और जज़ईआत-ओ‍सतहियात में उलझी हुई है।
नज़र-ओ-फ़िक्र के दायरे तंग हो गए, अफ़सोस कि मुस्लिम क़ौम आज दीगर अक़्वाम की इख़तिराआत-ओ-ईजादात से मुस्तफ़ीद हो रही है। वो ग़ैरों की बनाई चीज़ों से फ़ैज्याब हो रही है। मुसल्मान सिर्फ ग़ैरों के सामने अपनी झोलियां दराज़ किए हुए मोहताजों की तरह क़तार में उम्मीद-ओ-यास में सफ़ बस्ता खड़े हैं। इन की ग़ैरत-ओ-हमीयत को साँप सूंघ गया है, वो सिर्फ़ दुनिया से लेना जानते हैं, इन में दुनिया को देने की सलाहीयत नहीं रही। ना उन के पास हुनर है, ना फ़न है, ना इल्म है, ना हिक्मत है, ना अख़लाक़ है और ना कोई मुस्तक़बिल का मंसूबा है, वो एक नशा में बदमस्त इंसान की तरह ज़िंदगी गुज़ार रहा है, जिस को दुनिया हसरत भरी निगाह से देख रही है और इस को दुनिया और अहल दुनिया की कोई परवाह नहीं।

मुसलमानो ! अपनी मदमसती से बाज़ आओं, ख़ाब-ए-ग़फ़लत से बेदार हो जाओं, तंगनज़री के ख़ौल से निकल कर आफ़ाक़ी वुसअत नज़री के हामिल हो जाओं। ये सरज़मीन फिर से सूख गई है, ज़ुल्म-ओ-ज़्यादती, नफ़रत-ओ-अदावत, फ़िर्कावाराना असबीयत की मस्मूम फ़िज़ा ने इस के गुलशन को तबाह कर दिया, उस की रौनक-ओ-बहार को ख़त्म‌ करदिया, इस के चेहरे से मुस्कुराहट को छीन लिया। ये सरज़मीन अदल-ओ-इंसाफ़ की प्यास से मरी जा रही है। प्यार-ओ-मुहब्बत की आस में तड़प रही है। ये सरकशों और शिद्दत पसंदों से नालां है, नफ़रत-ओ-अदावत के बीज बौने वालों से बेचैन-ओ-मुज़्तरिब है। एसी मायूसी में इस की निगाहें सिर्फ़ इस्लाम की तरफ़ टिकी हुई हैं, ये (ज़मीन) मुस्लमानों से पुरउम्मीद है।

मुसलमानो! तुम्हारे पास एक अजीब सा ख़ज़ाना मौजूद है, तुम्हारे सीने में एसी ताक़त-ओ-क़ुव्वत है, जिस के सामने सुपर पावर ममालिक के मोहलिक हथियार भी आजिज़-ओ-बेबस हैं। तुम्हारे दिल में ईमान की दौलत है, तुम्हारे दिल ख़ुदा ए वहिदा ला शरीक की मुहब्बत से मामूर हैं, तुम्हारी ज़बानें ज़िक्र ख़ुदा से ज़म्ज़मा संज हैं, तुम्हारा हामी-ओ-मददगार ख़ालिक़ कायनात शहनशाह दो जहां, रब उल आलमीन है। तुम्हारे लिए ये जहां क्या चीज़ है, तुम इस फ़र्श पर रह कर अर्श वाले से ताल्लुक़ रखते हों। तुम इस ज़मीन में ख़ालिक़ कायनात के नायब-ओ-जांनशीन हो, तुम अल्लाह के ख़लीफ़ा हो, ये दुनिया तुम्हारे लिए पैदा की गई, इस ज़मीन की हर चीज़ तुम्हारे इस्तिफ़ादा के लिए बनाई गई है। शमस-ओ-क़मर, लैल-ओ-नहार को तुम्हारे ताबे कर दिया गया। अल्लाह ताला ने तुम को हाकिम-ओ-ग़ालिब बनाया, दुनिया को तुम्हारा ख़ादिम बनाया, दुनिया वालों की हिफ़ाज़त‍ ओ‍ सियानत, नुसरत-ओ-हिमायत के लिए तुम को मुंतख़ब किया। तुम आख़िरी आलम्गीर नबी मुकर्रम स.व. के उम्मती हो। तुम सारी इंसानियत की रहनुमाई, फ़लाह-ओ-बहबूद के लिए पैदा किए गए हों। तुम्हारा दिन आफ़ाक़ी, तुम्हारी तालीमात आफ़ाक़ी, तुम्हारा पैग़ाम आफ़ाक़ी है।

इसराईल का रकबा हैदराबाद-ओ-सिकंदराबाद से कम है। सिख क़ौम से कम तादाद यहूदीयों की है। वो दुनिया की सब से कम अक़ल्लीयत है, लेकिन उन के पास मक़सद है, बुलंद हौसलगी है, क़ुव्वत-ए-इरादी, ख़ुद एतिमादी का जौहर है, जहद मुसलसल का जज्बा है, इस लिए मुट्ठी भर होने के बावजूद दुनिया की मईशत पर यहूदीयों का सिक्का चल्ता है। दुनिया के ज़राए इब्लाग़ पर उन की हुकूमत है, दुनिया के आला ब्रांड्स उन के तैयार कर्दा हैं, दुनिया की आला यूनीवर्सिटीज़ उन की हैं, सब से आला दिमाग़ उन के पास है, सब से ज़्यादा नोबल ईनाम याफ़्ता यहूदी हैं। दुनिया का कोई मुल़्क यहूदीयों के मंशा के ख़िलाफ़ नहीं जा सक्ता। पच्चास से ज़ाइद मुस्लिम ममालिक हैं और यहूदीयों की सिर्फ एक ही मम्लकत है। दुनिया में साठ लाख से मुतजाविज़ यहूदी हैं और सिर्फ हिंदूस्तान में करोड़ों की तादाद में मुसल्मान हैं, इस के बावजूद ना उन के पास क़ौमी सयासी जमात है, ना उन के पास हिंदूस्तान की बेहतरीन यूनीवर्सिटी है और ना ही वो कोई काम्याब सनअत के मूजिद हैं। कोई कसीर उल-इशाअत अंग्रेज़ी अख़बार भी उन के पास नहीं है।
इस्लाम की नशात ए सानिया के लिए जामे मंसूबा बंदी और अमली इक़दामात की ज़रूरत है। ज़िंदगी के हर शोबा में इबतिदाई सतह से आख़िरी मरहला तक मुनज़्ज़म प्लानिंग और मुसल्सल जद्द-ओ-जहद होनी चाहीए, सिर्फ मुसल्मानों के लिए काम करने की बजाए बीला लीहाज़ मज़हब-ओ-मिल्लत हर एक की नफ़ारसानी-ओ-दादरसी की फ़िक्र हो।

हिंदूस्तान में मुस्लमानों की मुक़ामी या क़ौमी सतह की कोई सयासी जमात नहीं है, जिस का मंशूर हिन्दू, मुस्लिम, सीख, ईसाई सब की फ़लाह-ओ-बहबूद के लिए यकसाँ हो। हिंदूस्तान में गिरानी, बेरोज़गारी, तालीमी-ओ-तिब्बी मसाइल, ग़िज़ाई अज्नास की क़िल्लत, अमन-ओ-अमान की बरक़रारी, फ़िर्कावाराना मुनाफ़रत का इंसिदाद, फ़ित्ना-ओ-फ़साद, क़त्ल-ओ-ख़ून, जराइम, रिश्वत, बदकारी-ओ-बेहयाई, ये एसे मसाइल हैं, जिस के ख़ात्मा की फ़िक्र समाज के हर फ़र्द को होनी चाहीए, ये ज़िम्मेदारी किसी ख़ास तबक़ा के साथ मख़सूस नहीं। इन ही आला-ओ-मुशतर्का मक़ासिद के हुसूल के लिए मुस्लमानों को आगे आना चाहीए और एसी हिक्मत-ए-अमली-ओ-पेशक़दमी करनी चाहीए कि ग़ैर मुस्लिम को भी यक़ीन हो कि इन बुनियादी मक़ासिद को हासिल करने के लिए सिवाए मुसल्मानों के किसी का साथ नहीं दिया जा सकता।

मुसल्मानों के मदारिस-ओ-स्कूल में बिलउमूम मुस्लिम बच्चे तालीम हासिल करते हैं, इस के बरख़िलाफ़ ईसाई मदारिस में हर फ़िर्क़ा-ओ-तबक़ा के लोग अपने बच्चों के दाख़िला के लिए मुतफ़क्किर रहते हैं। इसी तरह मुस्लिम ज़ेर-ए-इंतिज़ाम शिफ़ा ख़ानों से बिलउमूम मुसल्मान इस्तिफ़ादा करते हैं, ग़ैर मुस्लिम और आला तबक़ा के अफ़राद मुस्लिम दवा ख़ानों की तरफ़ रुजू नहीं होते।
दुनिया के हर कोने में तालीम याफ़ता सोसाइटी में मुसल्मानों को घर ख़रीदने या किराया पर हासिल करने में काफ़ी मुश्किलात दरपेश होती हैं। आला तालीम याफ्ता ग़ैर मुस्लिम हज़रात की ये ख़ाहिश नहीं होती कि वो किसी मुस्लिम मुहल्ला में घर हासिल करें।

इस के इलावा दीगर मुआमलात में भी ग़ैर मुस्लिम ज़हन-ओ-फ़िक्र को तबदील करने, इस्लाम का नाम रोशन करने, मुस्लमानों के वक़ार को बुलंद करने के लिए ग़ैरमामूली इक़दामात की सख़्त ज़रूरत है।

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