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ईदी बाज़ार में दीवार गिरने पर मक़बरा पर क़बज़ा की हक़ीक़त आशकार

नुमाइंदा ख़ुसूसी-बाला पूर मैं अल्लाह के घर को मिस्मार करते हुए शायद गैर समाजी अनासिर ने अताब इलहि को दावत दे दी है । अब अल्लाह रबुल इज़त ने भी इन तमाम स्याह कारों की स्याह करतूतों पर से एक एक कर के पर्दे उठा रहा है । मस्जिद की शहादत

नुमाइंदा ख़ुसूसी-बाला पूर मैं अल्लाह के घर को मिस्मार करते हुए शायद गैर समाजी अनासिर ने अताब इलहि को दावत दे दी है । अब अल्लाह रबुल इज़त ने भी इन तमाम स्याह कारों की स्याह करतूतों पर से एक एक कर के पर्दे उठा रहा है । मस्जिद की शहादत को कुछ ज़्यादा दिन नहीं बीते कि दो दिन क़बल ईदी बाज़ार इलाक़ा में मुक़ामी लीडर की जानिब से अपने मकान की बोसीदा दीवार को मुरम्मत की ग़रज़ से गिराए जाने के साथ ही मकान के अहाता में मौजूद एक 400 साला क़दीम क़ुतुब शाही मक़बरा अवाम की नज़रों में आगया । जिसे सब ही दम बख़ुद होगए । मुक़ामी बुज़ुर्ग अफ़राद का कहना है कि ये मक़बरा बरसों क़बल अवाम के लिए खुला रहता था और लोग इस में आया जाया करते थे लेकिन बाद में इस पर क़बज़ा करलिया गया और आज ये मक़बरा मुकम्मल तौर पर मुक़ामी लीडर के घर का हिस्सा है । क़ारईन , बुज़ुर्गों की इत्तिला पर हम ने इस मुक़ाम का मुआइना किया तो देखा कि इस मक़बरा को चारों तरफ़ से घेर लिया गया है और अंदर जाने का रास्ता भी बंद है ।

जब हम ने इस ताल्लुक़ से वक़्फ़ बोर्ड से मालूमात हासिल कीं तो हम सकता में पड़ गए । हमें पता चला कि ये मक़बरा 400 साल क़दीम क़ुतुब शाही दौर-ए-इक्तदार में तामीर किया गया है और जमाल उनिसा-ए-बेगम का मक़बरा कहलाता है । ये मक़बरा क़ुतुब शाही दौर की ख़ूबसूरत फ़न तामीर का एक नादिर शाहकार है और इस दौर में फ़न तामीरमें क़ुतुब शाही हुकमरानों की दिलचस्पी को बयान करता है । इस मक़बरा को देखने से ही लगता है कि इस की तामीर से क़बल इमारत पर की जाने वाली नक़्क़ाशी के डिज़ाइन को तय्यार करने के लिए काफ़ी अर्सा तक अर्क़ रेज़ि की गई होगई है । इस मक़बरा पर मौजूद बैल बोटियां और दीगर अन्वा के दिलकश डिज़ाइन देखने से ताल्लुक़ रखते हैं ।

वक़्फ़ बोर्ड के रेकॉर्ड के मुताबिक़ ये मक़बरा 1,184.4 मुरब्बा गज़ पर मुहीत है । इस के इलावा वक़्फ़ गज़्ट की तफ़सीलात के मुताबिक़ इस मक़बरा से मरबूत दीगर जायदादें हसब ज़ैल हैं : 190/1, 191, 192/1 to 11 and 193/1, Dry Acres 50 and 8 Acres 25 guntas. Gaz No. 25.A, Sl.No. 1467, Gaz/F.No. Date 28-6-1984. । मक़बरा का पता ईदी बाज़ार , करीब रामचंद्रा नगर के एक मकान में है । मक़बरा के करीब ही हज़रत सय्यदना शुजाअ उद्दीन हुसैन कादरी क़िबला का आस्ताना है । इस के करीब गोसिया मस्जिद भी वाक़ै है । दरअसल रेन बाज़ार और ईदी बाज़ार क़दीम क़ुतुब शाही मुहल्ला जात हैं ।

रेन बाज़ार अपने दौर अज़मत में नाइट बाज़ार के नाम से जाना जाता था । इस मक़बरा को देखने से ज़्यादा ताज्जुब तो हमें वक़्फ़ रेकॉर्ड देखने पर हुआ जिस में मक़बरा और इस से मरबूत इतनी अराज़ी है । अपने वक़त की लाजवाब और बेमिसाल फ़न तामीर का शाहकार ये मक़बराआज ज़बूँहाली का शिकार ही नहीं है बल्कि उस को क़बज़ा में लेकर उस की क़दीम तारीख़ी अहमियत को ही मिटा दिया गया है । ये मक़बरा महिकमा आसार क़दीमा के वजूद पर एक सवालिया निशान है । अगर इसी क़दीम और बेशकीमती तारीख़ी आसार शहर में क़बज़ा किए जाते रहेंगे तो महिकमा आरक्योलोजी का क़ियाम का मक़सद ही बाक़ी कहां रह जाता है ?

महिकमा की मौजूदगी के बावजूद क़दीम इमारात और तारीख़ी विरसा को या तो मिटाया जा रहा है फिर क़बज़ा किया जा रहा है जब कि महिकमा के ओहदेदार वक़्त पर तनख़्वाहें हासिल कर के भी अपनी ज़िम्मेदारी से पहलू तिही कर रहे हैं जो कि क़ानून की नज़र में एक मुजरिमाना हरकत है । तारीख़ी विरसा के तहफ़्फ़ुज़ के लिए क़ायम महिकमा की मौजूदगी के बावजूद तारीख़ी यादगारें क़बज़ा कर के घरों के हदूद में खींच ली जा रही हैं जब कि ओहदेदार ख़ामोश तमाशाई बने बैठे हैं । एसा तो हो नहीं सकता कि महिकमा आरक्योलोजी और वक़्फ़ बोर्ड के ओहदेदारों को इस तारीख़ी और बेशकीमती मक़बरा और इस की अराज़ी का इलम ही ना हो । क़ारईन । ये कहावत भी मशहूर है कि कोई भी इमारत गिरने से पहले यह कोई क़दीम आसार मिटने से पहले क़ुदरती तौर पर एक इशारा होता है जो ये ज़ाहिर कर देता है कि इमारत गिरने वाली है यह निशानी मिटने वाली है ।

ये मशियत अलहि ही है कि मुक़ामी लीडर के मकान की बोसीदा दीवार , तामीर की ग़रज़से गिराए जाने के साथ ही क़दीम मक़बरा का वजूद लोगों की नज़रों में आगया , अगर दीवार ना गिराई जाती तो शायद किसी को इस बात की भनक तक ना पड़ती कि मकान के अंदर एक क़दीम और तारीख़ी अहमियत का हामिल मक़बरा भी है जो देखने में दिलकश-ओ-ख़ूबसूरत और क़ुतुब शाही दौर की बेमिसाल फ़न तामीर का शाहकार भी है । ज़रूरत इस बात की है कि महिकमा आरक्योलोजी के ओहदेदार इस मक़बरा का मुआइना करें , इस गुरू क़ुतुब शाही की आहक पाशी और तहफ़्फ़ुज़ के इक़दामात करें नीज़ उस क़दीम मक़बरा को अवाम के लिए खुलवाएं । वक़्फ़ बोर्ड के ओहदेदारों को भी चाहीए कि वो मक़बरा का मुआइना कर के इस का अज़ सर-ए-नौ सर्वे करवाएं और क़ाबज़िन को मंज़रे आम पर लाएं ।।

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