Thursday , July 27 2017
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उत्तर प्रदेश में प्रशांत किशोर की रणनीति फेल हो गई

नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी को राजनीतिक ब्रांड बनाने और बिहार में महागठबंधन के लिए कट्टर दुश्मनों लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को एक साथ लाने का श्रेय चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को दिया जाता है। लेकिन उनका जादू उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल में कांग्रेस के काम ना आया और दोनों ही जगहों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।

जब कांग्रेस ने किशोर की सेवाएं उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए ली, तो प्रदेश में कांग्रेसियों ने उनका स्वागत नहीं किया और हर कदम पर उनके फैसलों को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। चाहे वह 78 वर्षीय शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना हो या फिर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करना।

यहां तक कि अभिनेता से नेता बने उत्तर प्रदेश के प्रमुख कांग्रेसी नेता राज बब्बर ने उन्हें साउंड रिकार्डिस्ट करार दे दिया। बब्बर ने कहा, वे यहां चुनावों के दौरान पार्टी की विचारधारा को आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाने के लिए आए हैं।

उन्होंने सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ से राहुल गांधी और अखिलेश यादव के साथ मिलकर रोड शो करने की योजना बनाई तथा यूपी को ये साथ पसंद है जैसे जुबान पर चढऩेवाले नारे भी बनाए।

लेकिन मोदी लहर के आगे यह जोरदार अभियान पूरी तरह असफल रहा। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों ही जगहों पर कांग्रेस असफल रही। राजनीतिक विश्लेषकों और कांग्रेसी नेताओं ने स्वीकार किया कि किशोर की रणनीति असफल हुई है, लेकिन अकेले किशोर पर इसकी जिम्मेदारी नहीं डाली। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि अकेले किशोर पर हार का ठीकरा नहीं फोड़ा जा सकता।

उन्होंने बताया, 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 328 विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल की थी। यह स्पष्ट है कि हमारी रणनीतियां असफल हुई हैं, जबकि भाजपा अपनी योजनाओं और उसके कार्यान्वयन को लेकर काफी सर्तक थी।

लेकिन इसका किसी अकेले व्यक्ति को दोष देना सही नहीं होगा। इस हार की जिम्मेदारी किसकी है, इस पर पार्टी नेतृत्व को सामूहिक जबाव देना है।

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