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उत्तर प्रदेश में मोदी की ताबड़तोड़ चार रैलीयाँ, सांसदो पर चुनाव जिताने की ज़िम्मेदारी

फैसल फरीद

लखनऊ: जैसे जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहे  हैं, राजनीतिक दल खासकर भाजपा की सक्रियता बढती जा रही हैं। आगामी 23 दिन में प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश में ताबड़तोड़ चार रैलियां सम्बोधित करेंगे। मतलब हर हफ्ते प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश में होंगे।

यही नहीं, प्रदेश के 71 भाजपा सांसदों को, जो 2014 में चुनाव जीत गए थे, अब उनको भी काम दिया जायेगा—अपने क्षेत्र के विधानसभा सीटो पर विजय दिलाओ।

2014 लोक सभा चुनाव में भाजपा ने एकतरफा जीत दर्ज करते हुए अस्सी में से 71 सीट जीती थी, वहीँ दो सीट पर उसके सहयोगी अपना दल विजयी हुआ था। सपा को पांच और कांग्रेस को दो सीट मिली थी।

पहले चर्चा मोदी की ताबड़तोड़ रैलियों की, जिसमे मोदी की चार बड़ी रैली प्रदेश में प्रस्तावित हैं। मोदी 11 दिसम्बर को बहराइच, 19 दिसम्बर को कानपुर में रैली सम्बोधित करेंगे।

इसके बाद मोदी अपने निर्वाचन क्षेत्र बनारस का रुख करेंगे। 22 दिसम्बर को वहां वृहद् बूथ लेवल कार्यकर्ता सम्मलेन हैं। जहाँ मोदी सीधे संवाद करेंगे। यह कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें ज़मीनी कार्यकर्ता पहली बार मोदी से सीधे मुखातिब होंगे। यहीं से चुनाव जीतने का मंत्र भी मिलेगा। इस कार्यक्रम में 1800 बूथों के 20000 कार्यकर्ता जुटेंगे। प्रत्येक विधान सभा स्तर से 40-40 सेक्टर प्रभारी भी होंगे। मंशा यह है की प्रधानमंत्री को सीधे ज़मीनी स्तर कर फीडबैक मिलेगा विशेष कर नोटबंदी के मामले पर। इस कार्यक्रम के माध्यम से मोदी दुसरे सांसदों के सामने एक उदहारण भी प्रस्तुत कर देंगे कि वो भी ऐसा अपने क्षेत्र में करें।

इधर भाजपा की चार परिवर्तन रैली लगातार चल रही हैं। इनमे प्रतिदिन कोई न कोई केंद्रीय मंत्री आ रहा हैं। पूरे प्रदेश को चुनाव से पहले मथने का कार्यक्रम हैं। ये चारो परिवर्तन यात्रा 24 दिसम्बर को लखनऊ में समाप्त होंगी।पहले मोदी की रैली 24 दिसम्बर को होनी थी लेकिन अब इसमें परिवर्तन करके 2 जनवरी को कर दिया गया हिं। कारण जो हो लेकिन माना जा रहा है की तब तक नोटबंदी की समय सीमा भी समाप्त हो जाएगी और प्रधानमंत्री जनता के सामने होंगे।

अब बात भाजपा सांसदों की। ज़्यादातर सांसद जो 2014 में चुनाव जीते हैं वो अपने क्षेत्र में किर्याशील नहीं हैं। अपना चुनाव जीतने के बाद जिले लेवल की गतिविधिओ में उनकी भागीदारी नगण्य है। अब सांसदों के ऊपर ज़िम्मेदारी दी जा रही है कि वो अपने क्षेत्र की विधान सभा सीटो को जिताए। अपने क्षेत्र में बूथ प्रबंधन करे। सरकार की नीतिया सही दिशा में जनता के बीच पहुचाये। इसके अलावा जिले के नेताओ और उम्मीदवारों से समन्वय स्थापित करें। सांसदों के लिए ये खतरे की घंटी है क्योंकि माना जा रहा है की उनका अगला टिकट विधानसभा चुनाव में सफलता पर निर्धारित होगा।

अब तक सभी पार्टियों में भाजपा ही सबसे एक्टिव है और उसका काम सुनियोजित तरीके से हो रहा है आखिर कमान मोदी के हाथो में हैं। भाजपा को सुनिश्चित करना हिया की प्रदेश के विधानसभा चुनाव उसके आगे का भविष्य तय करेंगे।

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