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उर्दू के साथ बेइंसाफी, जस्टिस काटजू ने बयां किया अपना दर्द।

आँखों पर चश्मा, हाथ में मोबाइल और अंग्रेजी में बातचीत करती आज की नौजवान पीढ़ी आज की मॉडर्न ज़िन्दगी में ऐसे खो गयी है कि मानो वो अपनी जड़ें ही भूल बैठी हो। शायद खबर का मुखड़ा पढ़ कर एक बार आपको भी लगा हो कि यह खबर तो आज के मॉडर्न रंगों में रंगे मुस्लिम नौजवानों के लिए है तो आप गलत हैं जनाब।

यह खबर का ताल्लुक न तो रंगों से बांटे जा सकने वाले किसी मजहब से है और न ही किसी ऐसी विरासत से जिसका हिस्सा आप न हों।आज हम बात कर रहे हैं उर्दू जुबान की; वो उर्दू जिसे हमारे बाप-दादा पढ़ा, लिखा और बोला करते थे। बात उस वक़्त की है जब यह जुबान मुसलमान की न होकर हर मजहब की हुआ करती थी। और आज भी देश भर में कहीं भी किसी मश्हूर इमारत को जाकर देखें तो आपको उर्दू में लिखी इबारतें या इसके निशाँ जरूर मिल जायेंगे

यह तो हुई उर्दू के सेक्युलर होने की बात; और अगर हम थोड़ा और दूर तक नज़र दौड़ाएं थोड़ा और वक़्त निकाल कर उर्दू के इतिहास के पन्ने पलटें तो जो बात सामने आएगी वो यही होगी कि ” न हिन्दू की न मुसलमान की; उर्दू जुबान थी हर आवाम की।

लेकिन आज की मॉडर्न सोसाइटी की आदत है की हर पुरानी चीज़ को बेकार समझ कर काम में लाना छोड़ देती है। कुछ ऐसा ही हुआ उर्दू जुबां के साथ भी, कभी तहज़ीब और तमीज की जुबां समझी जाने वाली उर्दू को बोलने से लोग ऐसे कतराते हैं जैसे इसे बोलने पर उन्हें कोई सजा सुना देगा। उर्दू की इस हालत का ज़िम्मा सिर्फ हम लोगों पर ही नहीं सरकार पर भी है जिसने स्कूलों कॉलेजों में इन पुरानी और बेहतरीन जुबानों को पढ़ना बंद करवाया है।

आज हालत यह है की हम उर्दू और इसके जैसी ही और जुबानें भूलते जा रहे हैं। या यूँ कहें की जुबानें नहीं भूल रहे हम यह भूल रहें हैं कि बोला कैसे जाता है। इसी दर्द और परेशानी को 1969 में “साहिर लुधियानवी” ने अपनी शायरी के जरिये ग़ालिब साहिब की मौत की 100वीं सालगिरह पर बयान किया था आज उसी दर्द को बयां किया है देश की जानी मानी हस्ती ” जस्टिस काटजू ” ने, उन्होंने भी इस दर्द को “साहिर” की शायरी के जरिये ही पेश किया है। तो आइये पढ़ते हैं क्या कहा था साहिर ने।

” जिन शहरों में गूंजी थी ग़ालिब की आवाज़ बरसों
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ- निशाँ ठहरी।

आज़ादी का ऐलान हुआ जिस दिन
मातूब जुबां ठहरी, ग़द्दार ज़ुबाह ठहरी।

जिस वक़्त की सियासत ने यह ज़िंदा जुबां कुचली
उस वक़्त की सियासत को मरने वालों का ग़म क्यों है?
ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू का ही शायर था
उर्दू पर जुल्म ढा कर ग़ालिब पर करम क्यों है? ”

हिन्दुस्तान के बीच जब बंटवारा हुआ तो तेरा मेरा करते हिन्दू मुसलामानों ने ज़ुबानों का भी बंटवारा कर लिया हिंदी हिन्दू की हो गयी और उर्दू मुसलमान की। लेकिन बंटवारा करने वाले शायद यह नहीं समझ पाये की माँ को बांटा नहीं जा सकता। वो उर्दू माँ ही तो थी जिसको बांटने पर आमदा हुए थे आज एक से दो हुए यह लोग। साहिर ने इसी बात को बयां करते हुए कहा है कि

“ग़ालिब की वो आवाज़ जो कभी इन गली गलियारों में गूंजा करती थी आज के बाद वो एकदम से अनजानी हो गयी; वो जुबान जो कभी सबकी हुआ करती थी आज गद्दारों की बन कर रह गयी।

देश के चंद नेता जिन्होंने अपने फायदे के लिए इस ज़िंदा जुबान का क़त्ल कर डाला वह ग़ालिब पे इतना मेहरबान क्यों हैं।

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