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उर्दू यूनीवर्सिटी में उर्दू दां तबक़ा नज़रअंदाज

हैदराबाद 19 जनवरी ( सियासत न्यूज़ ) मुस्लिम अक़लियत को जितना मुस्लिम इकलियती इदारों ने नुक़्सान पहोनचए आए है किसी और ने नहीं पहुंचाया । हक़ीक़त ये है कि इकलियती इदारों के मुंतज़मीन हुकूमत के पास इकलियतों का रोना रो कर करोड़ों रु

हैदराबाद 19 जनवरी ( सियासत न्यूज़ ) मुस्लिम अक़लियत को जितना मुस्लिम इकलियती इदारों ने नुक़्सान पहोनचए आए है किसी और ने नहीं पहुंचाया । हक़ीक़त ये है कि इकलियती इदारों के मुंतज़मीन हुकूमत के पास इकलियतों का रोना रो कर करोड़ों रुपय की इमदाद हासिल कर के हड़प करते जा रहे हैं उन लोगों से हिसाब किताब दरयाफ़त करने वाला कोई नहीं । उन के अलफ़ाज़ दूसरों के लिए हुक्म का दर्जा रखते हैं । अगर इमानदारी से जायज़ा लिया जाय तो तमाम ओहदों पर मुंतज़मीन के रिश्तेदार , दोस्त-ओ-अहबाब ही नज़र आते हैं । जहां पर गरीब के किसी बच्चे को मुलाज़मत मिलना मुम्किन नहीं क्यों कि मख्लुआ जायदादों पर अपने रिश्तेदारों को क़बल अज़ वक़्त ही तक़र्रुरात अमल में लाए जाते हैं ।

बाद में हुकूमत की आँखों में धूल झोंकने के लिए अख़बारात में इश्तिहारात दे कर इंटरव्यूज़ का ड्रामा रचाया जाता है और काबिलियत और मुसाबक़त कि बुनियाद पर इंतिख़ाब का ऐलान कर दिया जाता है ये तालीमी माफिया हुकूमती स्कीमों को अक़लियत के नाम पर अपना ज़ाती फ़ायदा हासिल कररहे हैं । अलमीया तो ये है कि अक़ल्लीयतों के गरीब बच्चे तालीम याफ्ता होते हुए भी मज़दूरी या फिर ख़ानगी मुलाज़मत करने पर मजबूर हैं क्यों कि वो मुलाज़मत के लिए मना मांगी रक़म देने से क़ासिर हैं । ये बातें हैदराबाद में क़ायम मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनीवर्सिटी पर सादिक़ आती हैं जहां का माहौल कुछ इस तरह बना हुआ है कि एक इकलियती इदारा के नाम पर लाखों रूपयों में मुलाज़मतें फ़राहम की जा रही हैं ।

यही नहीं बल्कि अक्सरीयती तबक़ा के गैर उर्दू दां अफ़राद के तक़र्रुरात अमल में लाए जा रहे हैं । पंच साला मंसूबे में अक़ल्लीयतों के लिए बड़ी बड़ी उसके में , बेला सोदी या कम शरह सूद पर बड़े बड़े क़र्ज़ और खासतौर पर हुकूमत की जानिब से तालीम के नाम पर बेश बहा दौलत ख़र्च करना इस बात की ग़म्माज़ है कि हुकूमत अक़ल्लीयतों की तरक़्क़ी के लिए कितनी संजीदा है । लेकिन दूसरी तरफ़ अपनों के ज़रीया ही हमें शदीद घाटे का सौदा करना पड़ रहा है । एक सदी क़बल एक तवील जद्द-ओ-जहद के बाद हैदराबाद में उर्दू के नाम से एक क़ौमी यूनीवर्सिटी का क़ियाम अमल में लाकर उसे आज़ाद हिंदूस्तान के पहले वज़ीर तालीम मौलाना अब्बूल-कलाम आज़ाद के नाम से मानून किया गया ।

जिस का असल मक़सद उर्दू दां तबक़ा को उर्दू में आला तालीम के मवाक़े फ़राहम करना था लेकिन आज इस यूनीवर्सिटी की हालत एसी है कि यहां के असातिज़ा ख़ुद गैर उर्दू दां हैं एसे अफ़राद उर्दू वालों की क्या ख़िदमत करेंगे इस ताल्लुक़ से ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने की ज़रूरत है । तदरीसी और गैर तदरीसी अमला का ये आलम है कि उर्दू के नाम से क़ायम होने वाली मुतज़क्किरा यूनीवर्सिटी अब उर्दू को ही दफ़न करने के दरपे है क्यों कि हालिया दिनों में इस क़ौमी यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर्स , एसोसी एट और अस्सिटैंट प्रोफेसर्स के तक़र्रुरात अमल में लाए गए लेकिन ये तक़र्रुरात एसे किए गए हैं कि मुंतख़ब उम्मीदवार कम अज़ कम अहलीयती काबिलियत भी नहीं रखते । इस के साथ ही यूनीवर्सिटी में होने वाले बदउनवानीयाँ उरूज पर पहूंच गएं हैं ।

गुज़शता साल 27 जनवरी को तदरीसी शोबा में 30 अदद एसोसी एट और मज़ीद 30 अदद अस्सिटैंट प्रोफेसर्स के तक़र्रुरात के लिए आलामीया जारी किया गया था । एसोसी एट प्रोफेसर्स के ज़ुमरे में गैर महफ़ूज़ यानी आम ( खुले ) ज़मुरा में तीन में से 2 मुंतख़ब अफ़राद कम अज़ कम काबिलियत भी नहीं रखते । उर्दू यूनीवर्सिटी में किसी भी शोबा से वाबस्तगी के लिए 10+2+3 ( दसवीं , एंटर या डिग्री ) में एक मज़मून के तौर पर उर्दू रहना बुनियादी लाज़िमी है । अगर इसी काबिलियत रहती है तो ही दरख़ास्त का जायज़ा लेकर इंटरव्यू के लिए तलब किया जाना चाहीए लेकिन इन बुनियादी शराइत को नज़र अंदाज कर दिया गया ।

एक उम्मीदवार को उर्दू से अदम वाक़फ़ियत के बावजूद तक़र्रुर किया गया तो दूसरे को सिर्फ उर्दू प्रोफैंसी सरटिफ़िकेट की बुनियाद पर किया गया । सैंटर्ल यूनीवर्सिटी का एज़ाज़ रखने वाली इस यूनीवर्सिटी में मुलाज़मतों से मुताल्लिक़ कोई जवाबदेह नहीं है । जिस से अंदाज़ा होता है कि यूनीवर्सिटी की क्या सूरत-ए-हाल है । यूनीवर्सिटी के वाइस चांसलर का दावा है कि यूनीवर्सिटी को असरी टैक्नालोजी से आरास्ता किया जा रहा है ताहम ये दावा सिर्फ़ ज़बानी बोल ख़र्च के हद तक महदूद हैं । यूनीवर्सिटी में एक ओहदेदार पर तक़र्रुरात के मुआमला में अहम रोल अदा करने की इत्तिला है और तक़र्रुरात के सिलसिला में उम्मीदवारों से 10 लाख रुपय बतौर रिश्वत के ज़रीया नशिस्तें फ़रोख़त की जा रही हैं ।

तक़र्रुरात की बरोकरी करने वाले का दफ़्तर रोड नंबर 76 जुबली हिलज़ पर वाक़ै है । इसी रोड पर वाक़ै एक इदारा में बरसर ख़िदमत के किसी रिश्तेदार उर्दू यूनीवर्सिटी में भी आला ओहदा पर फ़ाइज़ हैं जो मुआमलात तै करने की इत्तिलाआत आम हैं । उर्दू यूनीवर्सिटी के एक आला अहल-ए-कार ने अपना नाम मख़फ़ी रखने की शर्त पर बताया कि मौजूदा वाइस चांसलर का तरीका कार इबतदा-ए-से ही गैर तश्फ़ी बख़श रहा है । इन सारे मुआमला के क़ता नज़र उर्दू यूनीवर्सिटी में तालीमी सूरत-ए-हाल भी ख़ुद सहीह नहीं है ।

यूनीवर्सिटी के एक रिसर्च स्कालर ने बताया कि यूनीवर्सिटी में 18 जनवरी 2012 को तातीलात के बाद दुबारा क्लासेस का आग़ाज़ हुआ लेकिन यूनीवर्सिटी का मेस यक्म फरवरी से खोलने का ऐलान किया गया । जिस से हॉस्टल में मौजूदा तलबा को सख़्त मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है । फेसबुक पर यूनीवर्सिटी के एक तालिब-ए-इल्म ने इज़हार ख़्याल करते हुए लिखा कि तलबा के मफ़ाद से हर टीचर सिर्फ अपने ज़ाती मुफ़ाद के लिए ही सरगरदां नज़र आता है ।।

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