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उर्दू शायरी को भुला देना सानिहा जस्टिस काटजू का इज़हार-ए-अफ़सोस

नई दिल्ली, २० सितंबर ( पी टी आई) ये कितना बड़ा सानिहा (दुर्घटना/घटना/मूसीबत) है कि हम ने दुनिया की बेहतरीन शायरी को भुला दिया है। ये अलफ़ाज़ सदर नशीन प्रेस कौंसल जस्टिस मारकंडे काटजू के हैं जिन्होंने मुल्क में उर्दू शायरी के हाल-ए-ज़ार प

नई दिल्ली, २० सितंबर ( पी टी आई) ये कितना बड़ा सानिहा (दुर्घटना/घटना/मूसीबत) है कि हम ने दुनिया की बेहतरीन शायरी को भुला दिया है। ये अलफ़ाज़ सदर नशीन प्रेस कौंसल जस्टिस मारकंडे काटजू के हैं जिन्होंने मुल्क में उर्दू शायरी के हाल-ए-ज़ार पर तब्सिरा करते हुए ये जुमला (वाक्य) कहा ।

वो एक तक़रीब ( सामारोह) से ख़िताब ( संबोधन) कर रहे थे । उन्होंने कहा कि वो कई ममालिक ( देशों) की शायरी का मुताला ( समीक्षा/ परीक्षण) करचुके हैं लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि उर्दू शायरी अपने क़ारी या सामा को जो बेपायाँ मुसर्रत अता करती है वो बेमिसाल है ।

ये कितना अज़ीम सानिहा (बहुत बड़ी घटना) है कि हम ने दुनिया की बेहतरीन शायरी फ़रामोश (भुला) कर दी है । इस से साफ़ ज़ाहिर है कि हम कितने बेवक़ूफ़ हैं । हम ख़ुद अपने ख़ज़ाना को मुस्तर्द कर ( छोड़) रहे हैं । उन्होंने कहा कि हिंदूस्तान का तमद्दुन (एक् दूसरे से मिलना) संस्कृत उर्दू लिसानी तमद्दुन ( एक दूसरे से मिले) है जो मुल्क के गोशा गोशा में फैल गया है ।

संस्कृत क़दीम ( पूरानी) हिंदूस्तान और उर्दू जदीद (नया/ आधुनिक) हिंदूस्तान की नुमाइंदा है । दोनों हमारे तमद्दुन का तसलसुल हैं । संस्कृत और उर्दू का रिश्ता दादी और पोती का रिश्ता है । सदर नशीन प्रेस कौंसल ने कहा कि माज़ी (पुराने दिनो/ प्राचीन) में ज़बानों का रिश्ता मज़ाहिब से जोड़ा गया जो दुरुस्त नहीं है ।

उन्होंने कहा कि हिंदूस्तान की आबादी की अक्सरीयत ( भहुसंख्यक) तारकीन-ए-वतन (Refugee) इस्लाफ़ की औलाद है । ये सिलसिला सदीयों से जारी है ।

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