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उर्दू सरकारी ज़बान

आज़ादी के बाद हिंदूस्तान में इंसानी सूबों के क़ियाम की तहरीक पर इंसानी बुनियादों पर सूबों की तशकील अमल में आई, जिस में उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजिस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश हिन्दी ज़बान के चलन वाले सूबे क़रार दिए गए। मग़रिबी बंगाल को बंगाली ज़बान का सूबा, आंधरा प्रदेश को तल्गु ज़बान का सूबा, गुजरात को गुजराती ज़बान का सूबा, पंजाब को पंजाबी ज़बान का सूबा, कर्नाटक को कनड़ी ज़बान का सूबा, केराला को मलयालम ज़बान का सूबा, उड़ीसा को उड़िया ज़बान का सूबा, आसाम को आसामी ज़बान का सूबा, जम्मू-ओ-कश्मीर को कश्मीरी ज़बान का सूबा क़रार दिया गया।

मगर उर्दू ज़बान के सूबा का क़ियाम अमल में नहीं आया जबकि हिंदूस्तान की चौदह मुस्लिमा क़ौमी ज़बानों में उर्दू भी शामिल है और मुल्क में उर्दू बोलने वालों की ख़ासी बड़ी तादाद पाई जाती है। इंसानी बुनियादों पर सूबों के क़ियाम के सिलसिलले में उर्दू ज़बान के चलन वाले सूबों केलिए हैदराबाद, बिहार, दिल्ली, यू पी, अलीगढ़, इलहाबाद और लखनव‌ काबिल-ए-ज़िकर थे मगर इस जानिब तवज्जु ही नहीं की गई ।

पण्डित नहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी बहैसीयत प्राइम मिनिस्टर हकूमत-ए-हिन्द उर्दू वालों की ख़ूब ख़ूब हिमायत की मगर हनूज़ दिल्ली दूर अस्त, वाला मामला ही रहा। जब तक किसी ज़बान को सरकारी सरपरस्ती हासिल ना हो, तालीम उर्दू सरकारी कामों में इस का इस्तिमाल ना हो वो अह्देजदीद के तक़ाज़ों का साथ नहीं दे सकती। हकूमत-ए-हिन्द से दरख़ास्त है का हैदराबाद अगर आंधरा प्रदेश से अलग होता है तो उसी की सरकारी ज़बान उर्दू हो

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