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ज़रूर पढ़ें: एक बेटे की अपनी माँ से मोहब्बत की अनोखी मिसाल…

वो एक ग़रीब किसान परिवार में पैदा हुआ था । वो अपने माँ बाप की इकलोती संतान था । उसके जन्म के ४ साल बाद ही पिता का साया उसके सर से उठ गया था । पिता की मृत्यु के बाद उसकी माँ ने उसको बडे लाड और प्यार से पाला और कभी भी उसको उसके पिता के न होने का अहसास तक होने न दिया । अपनी माँ से मिलने वाले प्यार और समर्थन की बदौलत अपनी कडी मेहनत और लगन से वो इंजीनियरिंग तक की पढाई तक पहुँच चुका था । इंजीनियरिंग में ऐडमीशन के दौरान ही उसको अपनी मां के गुर्दे के रोग के विषय में पता चला ।

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एक बेटे के लिये अपने पिता को बचपन में ही खो देने के बाद ये दूसरा सबसे बडा सदमा था । जब वो इंजीनियरिंग के दूसरी साल में पहुँचा तब तक उसकी माँ के गुर्दों ने पूरी तरह काम करना बंद कर उनको डायलायसिस पर ला दिया था । वो हैरान परेशान अपनी माँ को इस गंभीर बीमारी से बचाने के लिये कुछ भी करने को तैयार था । अन्तत: उसने अपने गुर्दे को अपनी माँ को प्रत्यारोपित करने का एक बहुत बडा और साहसिक फैसला ले लिया । एक बेटे का अपनी माँ को इससे बेहतर तोहफा और क्या हो सकता था कि जब उसकी माँ को उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी उसने तब अपने लायक बेटे होने की एक ऐसी मिसाल पैदा की जो आज आपके और हमारे लिये एक आईना है । अपनी इंजीनियरिंग की पढाई बीच मे ही रोककर, उसने गाँव में अपने हिस्से की ज़मीन को बेचकर अपनी माँ को अपना गुर्दा प्रत्यारोपत करा दिया । गुर्दा प्रत्यारोपण का अभी एक महीना ही बीता था कि उसकी माँ को लगाया गया ये ग्राफ्ट भी पूरी तरह से फेल हो गया और वे दुबारा से डायलाईसिस पर आ गयी , अन्तत: गुर्दा प्रत्यारोपण के इस एक महीने के भीतर ही उसकी माँ इस संसार को अलविदा कह गयी । दिन बीतते गये और इस बात को एक साल हो गया । इस एक साल में वो अपनी माँ को याद कर हमेशा रोता रहता था उनकी याद में वो काफी कमज़ोर हो चुका था , भूख लगना भी उसको काफी कम हो गयी थी और एक दिन अचानक उसको तेज़ बुख़ार , सूजन तथा बेतहाशा उल्टियाँ होने के कारण उसके ही परिवार के चाचा ताऊ ने उसको एक हॉस्पीटल में भर्ती करा दिया । अस्पताल में डॉक्टरों के द्वारा करायी जाँचों में जो बात निकल कर आयी उसने उसके पूरे परिवार को हिला कर दिया । वो भी गुर्दे रोग के पूर्ण रूप से चपेट में आ गया , उसका एक गुर्दा पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका था और दूसरा गुर्दा वो पहले ही अपनी माँ को दान दे चुका था । आईसीयू में डाक्टरों और स्टाफ की लाख कोशिशों के बाद भी अन्तत: उसकी सांसों की डोर टूट गयी ।

“जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा,
में अपनी माँ का आख़िरी ज़ेवर बना रहा ” !

उपरोक्त कहानी भूपेन्द्र नाम के एक युवक की है , जिसने अपनी ज़िदगी में अपनी माँ की मोहब्बत में जो कर दिखाया है उसको सुनकर और पढकर लोग हमेशा उससे प्रेरणा लेते रहेंगे । भूपेन्द्र जैसे बेटों पर हर माँ और देशवासी को नाज़ है । तुम्हारी कहानी सदियों तक सुनायी जाती रहेंगी । हमें गर्व है तुमपर दोस्त और हमेशा रहेगा ! श्रधांजलि !

डॉ.उमर फ़ारूक़ अफरीदी की कलम से

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