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एक मुसलमान के जनाजे में साधु-संत का रेला

अयोध्या : किसी मुसलमान के जनाजे में साधुओं का रेला लगा हो, ये शायद ही किसी ने देखा या सुना हो. ये अवध की मिट्टी का ही असर है कि बाबरी मस्जिद के इकलौते बचे पक्षकार जिसने अपनी पूरी उम्र बाबरी मस्जिद की कानूनी लड़ाई के नाम कर दी हो, उसके जनाजे में अयोध्या के साधु-संत भी पहुंचे और वो भी नम आखें लिए. अयोध्या विवाद के समाधान की कोशिशों को लिए जिस शख्स ने आखिरी सांस ली, वो हाशिम अंसारी 96 साल की उम्र में ये हसरत लिए सदा के लिए चले गए.

हाशिम अंसारी वो चेहरा वो नाम, जिसने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले में अपने आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी लेकिन उनकी उसकी ये हसरत अधूरी रह गई कि वो जीते जी इसका समाधान देख लें. हाशिम अंसारी के अंतिम दर्शन को निर्मोही अखाड़े और हनुमानगढ़ी के कई साधु-संत पहुंचे थे. यहां पहुंचे संतो के मुताबिक, ‘वह हमेशा लड़ाई लड़ने के साथ-साथ सुलह की बात करते रहे. वह हमेशा चाहे निर्मोही अखाड़ा हो, परमहंस जी हो या ज्ञानदास जी हो सभी से सामंजस्य रखते थे. उनकी इच्छा थी की उनके जीते जी राम मंदिर बन जाए लेकिन यह हो नहीं सका.’

हाशिम अंसारी ने मंदिर-मस्जिद विवाद और निजी दोस्ती का आपस में कभी भी घालमेल नहीं किया. यही कारण रहा कि विवादित स्थल के प्रमुख दावेदारों में निर्मोही अखाड़े के रामकेवल दास और दिगम्बर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्र दास से हाशिम की अंत तक गहरी दोस्ती रही. परमहंस और हाशिम तो प्रायः एक ही सवारी से मुकदमे की पैरवी के लिए साथ-साथ अदालत तक जाते थे और इस बीच उनका नाश्ता-खाना भी साथ ही होता था. रामकेवल दास और परमहंस रामचंद्र दास इन दोनों दोस्तों के दुनिया में न रहने के बाद हाशिम ने हनुमान गढ़ी के महंत और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञान दास से मिलकर अपनी भावनात्मक परपरा को आगे बढ़ते हुए सुलह-समझौते की कोशिशों को जारी रखा इसीलिए ज्ञान दास समेत राम मंदिर से जुड़े पक्षकार और समर्थक संगठनों के पदाधिकारी हाशिम के निधन के बाद मगीन होकर उनके घर पहुंचे और सभी ने एक ही लाइन दोहराई कि हाशिम तो कभी विरोधी लगे ही नहीं.

हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास कहते हैं कि हाशिम ये चाहते थे की मंदिर-मस्जिद जो भी है, जीते-जी समाधान कर लिया जाए. ज्ञानदास याद करते हैं- हम ईद के दिन आए थे. ये पैरों से लाचार हो चुके थे. हमारे पास आ-जा नहीं पाते थे. पहले अक्सर अपने पुत्र इकबाल के साथ हमारे पास जाया करते थे और राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद की मंत्रणा करते रहते थे और हम दोनों चाहते थे कि जीते जी इस मसले का समाधान निकल आए. अभी ईद के दिन कह रहे थे कि‍ अपने उत्तराधिकारी इकबाल को आपको सौंप रहा हूं हम हमेशा इकबाल का ध्यान रखेंगे.

परमहंस और हाशि‍म केस की पैरवी के लिए साथ जाते थे
अयोध्या मामले से जुडे वकील विरामनराम लाला हाशिम अंसारी और रामचन्द्र परमहंस की दोस्ती याद करते हैं और कहते हैं- हाशिम व्यक्तिगत रूप से बहुत ही भले इंसान थे रामचंद्र परमहंस जो मंदिर मामले में वादी थे और 1951 में मुकदमा दायर किया था. उनके साथ उनका इतना अंतरंग सम्बन्ध था कि‍ रोज सुबह-शाम उनके साथ बैठना. आम तौर पर दोनों साथ-साथ मुकदमे की पैरवी में जाते थे. सोसाइटी का मुकदमा परमहंस अपनी तरफ से और हाशिम अपनी तरफ से पैरवी करते थे.

केस पर नहीं पड़ेगा असर
मंदिर-मस्जिद मामले के कानूनी जानकारों का कहना है कि भले ही 1961 में बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक को लेकर मुकदमा करने वाले 9 मुस्लिम पक्षकारों में हाशिम अब तक अकेले जीवित बचे थे लेकिन अब उनके भी न रहने पर मुकदमे पर कोई असर नहीं पडेगा क्योंकि मुकदमा प्रतिनिधि नेचर का है न कि व्यक्तिगत. बहरहाल 96 साल की उम्र मे हाशिम अंसारी चले गए लेकिन अपने बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि के समाधान का एक अनकहा ब्लूप्रिंट जरूर छोड़ गए, जिस पर चलते हुए शायद इस मामले का हल इंसानियत की परिधि में निकल आए.

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