Friday , September 22 2017
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एडिटोरियल: RSS और मीडिया की दोगली सोच ,भारत तो बने हिन्दू राष्ठ्र लेकिन कोई देश ना बने मुस्लिम राष्ठ्र

भारत और बांग्लादेश ,दोनों पडोसी देश है मगर बांग्लादेश मुस्लिम आबादी का बहुमत वही भारत में हिन्दू आबादी का है बहुमत .

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दोनों मुल्कों का एकाकी इतिहास रहा है ,1947 में बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के नाम से भारत से अलग हो गया जिसको 1971 में भारत के सहयोग से आजादी मिली है .

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बांग्लादेश को एक मुल्क बनने के लियें लाखो नागरिको की शहादत देनी पड़ी क्युकी देश के अन्दर भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे जो इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान से जुड़े रहना चाहते है हलाकि ऐसे लोग का बहुमत नही रहा होगा ,जमाते इस्लामी बांग्लादेश में उस समय ऐसी पार्टी बनकर उभरी थी जो एकीकृत पाकिस्तान के नाम पे बांग्लादेश बनने के ख़िलाफ़ थी इसलियें इस बात के पक्के साबुत ज़रूर होंगे कि बांग्लादेश के गृहयुद्द के समय पाक आर्मी को ये पार्टी बागियों के बारे में जानकारी देती रही होगी ,पाकिस्तान की आर्मी ने जंग में बगावत को कुचलने के लियें बंगाल में काफी नरसंहार भी किया था आखिरकार बांग्लादेश का वजूद सामने आता है पाकिस्तान की आर्मी सरेंडर करके वापस पाकिस्तान लौट जाती है वही जमाते इस्लामी के नेता भूमिगत हो जाते है और समय अनुकूल देख के बांग्लादेश में फिर सक्रीय होकर देश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी बन जाते है .

लेकिन जमाते इस्लामी कभी भी पुरे मुसलमान को अपने पक्ष में लामबंद नही कर पाई इसकी एक वज़ह उसका गृहयुद्द में पाक आर्मी को साथ देना था दूसरा वहां की जनता में सेकुलर समाज की परम्परा भी पहले से रही है .

जमाते इस्लामी सिर्फ़ एक बार बंगलदेश नेशनलिस्ट पार्टी के साथ अलायन्स में सरकार बनाने में सफल होती है 2002 में हुयें उस चुनाव में पार्टी को 325 में से सिर्फ़ 16 सीट्स मिली थी जिसमे कि हालही में फ़ासी पे लटकने वाले जामत के नेता मोती उर रहमान निजामी भी थे .

जहाँ तक निजामी की बात की जाये तो भारत की मीडिया ने एक तरह से एकतरफा निजामी की फ़ासी को पूरी तरह इन्साफ वाली प्रक्रिया बताया साथ ही यूएन ,मानवाधिकार संघठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की चिन्ताओ को भारत की मीडिया ने बिलकुल स्थान नही दिया जब भी न्यूज़ कवर की जमाते इस्लामी को कट्टर मुस्लिम पार्टी बताया बात गलत नही है जमात कट्टर मुस्लिम पार्टी है बिलकुल वैसे ही जैसे भारत में संघ परिवार कट्टर हिन्दू संघठन है और आरएसएस द्वारा प्रायोजित भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह से हिन्दू वादी पार्टी है

अब दोनों देशो के राजनैतिक हालात का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो भारत में हिन्दू वादी पार्टी सत्ता में है वही बांग्लादेश में मुस्लिमवादी पार्टी के नेता एक के बाद एक फ़ासी पे चढ़ रहे है भारत में किसी कट्टर बहुसंख्यक के किसी नेता की फ़ासी का संज्ञान तो इन बीस वर्षो में नही मिल रहा है .
अगर 1971 के नरसंहार की बात की जाये तो उस तरह नरसंहार मुस्लिमो के साथ अभी तक नही हुआ लेकिन गुजरात और मुज़फ्फरनगर में हुआ नरसंहार भी कोई छोटा नही था .
लेकिन अफ़सोस इन भारत में हुयें दंगो पर ज़िम्मेदार लोग सज़ा पाना तो दूर की बात जितना बड़ा दंगा उतना बड़ा नेता के फार्मूला पे उल्टा सज़ा की जगह ईनाम मिला .
इन सब में भारतीय मीडिया और आरएसएस की सोच से मेल खाने वालो की अजब सोच रही ,यहाँ पे हिन्दूवाद फ़ैलाने की पुरजोर वकालत लेकिन किसी दुसरे देश में मुस्लिमवाद बढने की चिंता .

ये कैसा विरोधाभास है .
अच्छा तो तब होता जब भारत में हम हिंदूवादी पार्टियों ,संघठन को विराम लगाये उसके बाद विदेश में दुसरे मज़हब के कट्टरपंथ की तरफ जाने पर चिंता ज़ाहिर करे .

सिआसत हिन्दी के लियें इमरोज़ खान द्वारा आर्टिकल लिखा गया है

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