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ए बंदा-ए-ख़ुदा मुख़लिस बन

हज़रत अब्बू सईद ख़ुदरी रज़ी अल्लाह ताअला से रिवायत हैके रसूल-ए-पाक (स०) ने फ़रमाया अगर कोई शख़्स किसी एसे बड़े पत्थर के अंदर भी कोई नेक काम करे कि जिस में ना तो कोई दरवाज़ा हो और ना कोई रोशनदान, तो इस का वो अमल लोगों में मशहूर हो जाएगा, ख़ाह वो

हज़रत अब्बू सईद ख़ुदरी रज़ी अल्लाह ताअला से रिवायत हैके रसूल-ए-पाक (स०) ने फ़रमाया अगर कोई शख़्स किसी एसे बड़े पत्थर के अंदर भी कोई नेक काम करे कि जिस में ना तो कोई दरवाज़ा हो और ना कोई रोशनदान, तो इस का वो अमल लोगों में मशहूर हो जाएगा, ख़ाह वो अमल किसी तरह का हो।

हदीस शरीफ़ का मफ़हूम ये हैके अगर ये फ़र्ज़ करलिया जाये कि कोई शख़्स पत्थर के अंदर भी घुस कर कोई नेक काम करे कि जिस में ना कोई दरवाज़ा होता है और ना कोई रोशनदान और इस तरह इस पत्थर के अंदर ना तो दाख़िल होकर और ना बाहर से झांक कर देखा जा सकता है कि इंद्र कौन शख़्स क्या काम कर रहा है तो इस सूरत में भी वो शख़्स अपने इस नेक काम के साथ लोगों में मशहूर हो जाता है।

हदीस शरीफ़ का हासिल ये हैके अच्छे काम कितने ही पोशीदा तौर पर और कैसी ही तन्हाई में क्यों ना किए जाएं और इस बात की कितनी ही कोशिश क्यों ना की जाये कि वो (अच्छे काम) लोगों के इलम में ना आएं, मगर फिर भी वो लोगों पर अयाँ हो जाते हैं।

पस अल्लाह ताअला की मस्लिहत अगर ख़ुद इस बात का तक़ाज़ा करती हैके बंदों के नेक अमल जो सिदक़-ओ-इख़लास के साथ सादर होते हैं, लोगों पर आश्कारा हूँ, ताके एक दूसरे को इसी तरह नेक राह इख़तियार करने की तरग़ीब हासिल हो तो फिर उसकी क्या ज़रूरत हैके कोई शख़्स अपने नेक अमल को ज़ाहिर करने के लिए रयाकारी की हद तक पहुंच जाये और उसकी क़बूलीयत-ओ-सवाब से ख़्वाहमख़्वाह महरूम रहे।

मुख़लिस बंदे को चाहीए कि वो अपने अच्छे कामों को छुपाए और इख़लास हासिल करने में ज़्यादा से ज़्यादा एहतियात करे।

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