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औलाद की तालीम-ओ-तर्बीयत

अल्लाह तबारक-ओ-ताला ने इस आलम-ए-आब-ओ-गुल में इंसान को बेशुमार-ओ-बेशबहा नेमतों से नवाज़ा हे, जिन को शुमार करना इंसानी ताक़त से बाहर हे और ये नेमतें इत्नी कसीर तादाद में हे, जिन की तरफ़ एक आम इंसान तो क्या एक जानकार इंसान की भी रसाई नामुमकि

अल्लाह तबारक-ओ-ताला ने इस आलम-ए-आब-ओ-गुल में इंसान को बेशुमार-ओ-बेशबहा नेमतों से नवाज़ा हे, जिन को शुमार करना इंसानी ताक़त से बाहर हे और ये नेमतें इत्नी कसीर तादाद में हे, जिन की तरफ़ एक आम इंसान तो क्या एक जानकार इंसान की भी रसाई नामुमकिन हे। चुनांचे अल्लाह ताला का इरशाद हे और अगर तुम अल्लाह की नेमतों को शुमार करना चाहो तो शुमार नहीं कर सकते।

मगर इन तमाम नेमतों में तीन नेमतें ऐसी हे, जिन के इर्दगिर्द इंसानी ज़िंदगी की चक्की फिर रही हे। गोया ये कहा जा सकता हे कि इंसानी ज़िंदगी में सेहत, माल और औलाद का एक ख़ास मुक़ाम-ओ-मर्तबा हे। सेहत पर इंसानी हयात का दार-ओ-मदार हे, जिस के बगै़र कोई काम वजूद में नहीं आसकता। सेहत के बारे में हुज़ूर अकरम स.व. का इरशाद हे कि बीमारी से पहले तंदरुस्ती की फ़िक्र करो। इसी तरह आप स.व. ने दूसरी नेमत माल की एहमीयत को भी उजागर किया हे। फ़रमाया रोज़ क़ियामत हर बंदा से जो चार सवाल किए जाएंगे, इन में एक सवाल माल के बाबत होगा।

तीसरी नेअमत औलाद हे, जो वालदैन के लिए क़ीमती असासा हें। जिन के सहारे ज़िंदगी की उम्मीदों की इमारतें तामीर की जाती हें। लेकिन इस के बारे में भी शरीयत ने बड़ी वाज़िह हिदायात अता फ़रमाई हें। जिस तरह औलाद पर वालदैन का हक़ हें, वेसे ही वालदैन पर औलाद का भी हक़ हें। वालदैन पर औलाद के हक़ का मत्लब उन की दीनी तालीम-ओ-तर्बीयत और उन की ज़हन साज़ी-ओ-किरदार साज़ी के लिए जद्द-ओ-जहद करना और इस के लिए मुनासिब बंद-ओ-बस्त करना वालदैन के हक़ में फ़र्ज़ एन हें, ताकि उन की औलाद उन की आँखों की ठंडक और दिल की तसल्ली का ज़रीया बन जाए।

मौजूदा मुस्लिम मुआशरा का दर्दनाक-ओ-अफ़सोसनाक पहलू वालदैन का औलाद की दीनी तर्बीयत के बारे में लापरवाही-ओ-बेफ़िकरी है। आदमी अपनी ज़ात की हद तक तो बड़ा दीनदार नज़र आता है, लेकिन इस के और इस के अहल-ओ-अयाल के दरमयान ज़मीन और आस्मान का फ़र्क़ हे। यानी वालदैन तो दीनदार हैं, लेकिन उन की औलाद बेदीनी के सेल रवां मे बेहती चली जा रही हें।
अगर रोज़ अव्वल से ही औलाद को दिनी तालीम दी जाती तो शायद इस किस्म का माहौल देखना नसीब ना होता। आज जिस माहौल में हम अपने बच्चों को तालीम दे रहे हें, इस ने नई नसल को अक़ीदा, ईमान, फ़राइज़ और अहकामात से दूर करदिया हे और हमारे बच्चों को सिर्फ नाम का मुसल्मान बाक़ी रखा हें, जिस का नतीजा ये हुआ कि वही बच्चे वालदैन के सरपर मुसल्लत हो गए और वालदैन के सुकून-ओ-चीन को बर्बाद कर दिया।

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