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कश्मीर में पांच गोलियां झेलने वाले जवान ने नोटबंदी से तंग आकर ख़ुद को गोली मारी

आगरा(उप्र) : बैंक से नकदी न मिलने से परेशान केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल(सीआरपीएफ) के एक रिटायर्ड जवान ने खुदकुशी कर ली|  मृतक राकेश चंद को  इलाज के लिए पैसों की जरुरत थी|  वह कई बार बैंक से पैसे निकलवाने के लिए गए लेकिन हर बार उन्‍हें खाली हाथ लौटना पड़ा|  इससे  परेशान और दुखी होकर उन्‍होंने खुद को लाइसेंसी  बंदूक से गोली मार ली|

राकेश आगरा के बुढ़ाना गांव के रहने वाले थे | उनके बेटे के मुताबिक़ मेरे पिता को हार्ट के इलाज के लिए पैसों की जरुरत थी |  उन्‍हें 15 हजार रुपये की पेंशन मिलती थी। डॉक्‍टर के पास जाने और दवाइयों के लिए उन्‍हें 6-7000 रुपये चाहिए थे| कई दिनों से वह ताजगंज स्थित स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा से पैसे निकलवाने जा रहे थे | लेकिन हर रोज़ खाली हाथ लौट रहे थे |
सीआरपीएफ में रहने के दौरान 1990 में कश्‍मीर में तैनाती के समय राकेश को पांच गोलियां लगी थी। राकेश का ऑपरेशन कर ये गोलियां निकाली गईं थी। राकेश आतंकियों की गोलियां तो झेल गए लेकिन नोटबंदी ने उनकी ज़िन्दगी खत्म कर दी |  वे साल 2012 में हैड कांस्‍टेबल पद से रिटायर हुए थे| उनके बेटे सुशील ने बताया कि सीआरपीएफ में रहने के दौरान गोली लगने के बाद से उनके हार्ट में समस्‍या थी |

गौरतलब है कि आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद करने का एलान किया था| जिसके बाद से  लोगों को पैसों की तंगी का सामना करना पड़ा है|  अभी तक देशभर के बैंक और एटीएम में पर्याप्‍त पैसा नहीं पहुँच पाने की वजह से बैंक और एटीएम में  लंबी लाइने लगी हैं| पर्याप्त पैसा नहीं मिलने की वजह से लोगों का गुस्‍सा बढ़ रहा है | जिसकी वजह से कई जगहों पर बैंककर्मियों से मारपीट, झगड़ा, पथराव और सड़कों को जाम करने की खबरें सामने आई हैं|

जनता का मूड  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले के एक महीने के बाद बदल रहा है| इस फैसले के चलते हो रही परेशानियों की वजह से गुस्‍सा बढ़ रहा है | हफिंगटन पोस्‍ट-बीडब्‍ल्‍यू-सीवोटर की ओर से कराए गए ओपिनियन पोल के मुताबिक़ लोग नोटबंदी के फैसले को अब परेशानी मानने लगे हैं| सर्वे के मुताबिक़ ग्रामीण व अर्ध शहरी क्षेत्रों में नोटबंदी की वजह से लोगों के जीवन पर बड़ा असर पड़ा है| नए पोल में नोटबंदी के फैसले को सही मानने वालों की संख्‍या गांवों में 86 से घटकर 80 प्रतिशत से नीचे आ गई।

 

 

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