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कश्मीर में पाकिस्तानी शरणार्थियों को लेकर फिर सियासत हुई गरम

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में 1947 के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने लेकर सियासत गरमा गई है। इस फैसले के खिलाफ अलगावादी नेताओं और विपक्षी दलों ने विरोध करने का एलान किया है।

दरअसल, 1947 में देश के बंटवारे के समय कुछ शरणार्थियों ने जम्मू आकर पनाह ली थी। इनकी संख्या तकरीबन 80 हजार के आसपास बाताई जाती है। इतने लंबे समय के बाद भी इन शरणार्थियों को जम्मू-कश्मीर की नागरिकता प्राप्त नहीं है और न ही उन्हें मतदान करने का अधिकार है। ये लोग लंबे समय के अपने हक की लड़ाई लड़ रहते रहे हैं।

कुछ दिन पहले महबूबा सरकार ने शरणार्थियों को आइडेंटिफिकेशन-सर्टिफिकेट देने का ऐलान किया है। हालांकि महबूबा सरकार का दावा है कि जो सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं वो डोमिसाइल नहीं बल्कि आइडेंटिफिकेशन-सर्टिफिकेट यानि पहचान के लिए प्रमाण पत्र मात्र है। सरकार का मानना है कि इसे जम्मू कश्मीर में रह रहे पाकिस्तानी शरणार्थियों को नौकरियां मिलने में आसानी होगी। महबूबा सरकार का कहना है कि यह डोमिसाइल सर्टिफिकेट नहीं है। वहीं राज्य में सकरकार की सहयोगी दल भाजपा चाहती है कि शरणार्थियों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट दिया जाए।

 नेटवर्क 18 के मुताबिक, अलगाववादी नेता हिलाल अहमद ने कहा है कि हम लोग किसी भी तरह से शरणार्थियों को नागरिकता नहीं लेने देंगे। जब रेफरेंडम होगा तब ये लोग हमारे खिलाफ वोट करेंगे। पाकिस्तान के पंजाब से आए हैं ये लोग,  इन्हें वहीं भेजा जाए या तो भारत में पंजाब में बसाया जाए या फिर इनको अंडमान निकोबार भेज दो।

हिलाल ने यह भी कहा है कि लंबे समय भारत के ऊपर कश्मीर के मसला को हल करने का दबाव बढ़ रहा है। तो इसलिए ये मुहिम की जा रही है कि इनको सारे हक दिए जाएं और उनको हमारे खिलाफ इस्तेमाल किया जाए। ये हम किसी भी कीमत में नहीं होने देगें। कश्मीर में एक नई तरह से जंग शुरू होगी। वहीं जम्मू-कश्मीर के निर्दलीय विधायक और अवामी इत्तेहाद पार्टी के चेयरमैन इंजीनियर रशीद ने कहा है कि जो ये शरणार्थियों को नागरिकता दी जा रही है वो सही नहीं है। ये एक विवादित मुद्दा है तो इसकी जनसंख्यिकी को न बदले।

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