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काश ! मसाजिद के सुदूर एसे होते

नुमाइंदा ख़ुसूसी- इस्लाम में मसाजिद की बहुत ही अहमियत और इंतिहाई अज़ीम है सियत है । मसाजिद मराकिज़ इस्लाम और शाइर दीन हैं । मसाजिद रूये ज़मीन पर सब से मुक़द्दस , सब से पाकीज़ा सब से बहतरीन जगह और अल्लाह ताला को सब से ज़्यादा महबूब

नुमाइंदा ख़ुसूसी- इस्लाम में मसाजिद की बहुत ही अहमियत और इंतिहाई अज़ीम है सियत है । मसाजिद मराकिज़ इस्लाम और शाइर दीन हैं । मसाजिद रूये ज़मीन पर सब से मुक़द्दस , सब से पाकीज़ा सब से बहतरीन जगह और अल्लाह ताला को सब से ज़्यादा महबूब हैं । दुनिया में जन्नत के बाग़ और इस्लाम के क़िला और अहल इस्लाम के इजतिमाई निज़ाम के लिए मराकिज़ हैं ।

लिहाज़ा मसाजिद का निज़ाम जिस क़दर बेहतर होगा मुस्लमानों की इन्फ़िरादी-ओ-इजतिमाई ज़िंदगी पर इस के निहायत ख़ुशनुमा असरात मुरत्तिब होंगे । मुस्लमानों का मुआशरा पाकीज़ा बनेगा और इस्लाम की रूह उन की ज़िन्दगियों में जलवागर नज़र आएगी ।

मसाजिद का निज़ाम और आबादी सिर्फ उस की ज़ाहिरी तामीर-ओ-तज़ईन , नक़्श-ओ-निगार और फ़लकबोस मीनारों से नहीं है बल्कि उस की सही आबादी इबादत इलाहि । ज़िक्र ख़ुदावंदी और आमाल मसाजिद से है । इन उमूर के पेश नज़र मसाजिद का सहीह निज़ाम ख़ुदा तरस इमाम , सालेह मोज़न और बा सलाहीयत-ओ-अहल अरकान पर मुश्तमिल कमेटी और इस के सोदूर पर मौक़ूफ़ है । मसाजिद का निज़ाम सही और बेहतर से बेहतर होने का ज़्यादा तर दार-ओ-मदार आम तौर पर सदूर पर होता है ।

इस लिए कमेटी का सदर बहुत ही बा सलाहियत होना चाहीए और इस के लिए सब से बेहतर आलिम बाअमल शख़्स है अगर एसा सदर मोयस्सर ना होसके तो कम अज़ कम दीनदार , सोम-ओ-सलात का पाबंद , अमानतदार , मसाइल वक़्फ़ का जानने वाला , ख़ुश अख़लाक़ , मुंसिफ़ मिज़ाज , इलमदोस्त , अहले इल्म की ताज़ीम-ओ-तकरीम और उन से मश्वरा कर के काम करने वाला दीन और अहल दीन से मुहब्बत और दीनी फ़िक्र रखने वाला सदर होना चाहीए अगर एसा सदर होगा तो बा सलाहियत इमाम-ओ-मोज़न तलाश कर के इन का तक़र्रुर करेगा और उन की सही क़दर और उन का आला मर्तबा जानेगा और उन को ख़िदमत करने का मौक़ा फ़राहम करेगा ।

देनी कामों की अंजाम दही में इन का मेन-ओ-मददगार बनेगा । मगर हम ने इस हवाले से जब शहर की सैंकड़ों मसाजिद का जायज़ा लिया उन की कमेटी और सदूर के ताल्लुक़ से मालूमात हासिल करने की कोशिश की तो इस बात के इन्किशाफ़ से इंतिहाई कलबी तकलीफ हुई कि चंद मसाजिद एसी भी हैं जिन की इंतिज़ामी कमेटी के सदूर पहलवान , रूडी शेटरस , सूदखोर , बे नमाज़ी , पुलिस के मुख़्बिर , लैंड गराबरस , मुक़ामी सतह पर अपने हवारियों के ज़रीया मासूम भोले भाले कमज़ोर-ओ-नातवां और शरीफ उल-नफ़स लोगों पर अपनी धाक जमाने वाले माइतरी कमेटी के अरकान हमेशा पुलिस इस्टेशन की सीढ़ियां चढ़ने उतरने के आदी अनासिर हैं ।

जो सिर्फ अपने असर-ओ-रसूख़ और ताक़त के बल पर मुहल्ले की मसाजिद पर एक तरह से क़बज़ा किये हुए हैं और हर हफ़्ता अपने घर पर पुर तकल्लुफ़ दावत कर के पुलिस के आला ओहदेदारों , सियासतदानों और हटे कटे लोगों को मदऊ करते हैं और अपनी ताक़त और अपने रवाबित का मुज़ाहरा करते हैं । उन की जहालत और दीन से दूरी का आलम ये है कि ना तो वो ख़ुद नमाज़ के पाबंद हैं ना उन के अरकान कमेटी , ना वो इमाम का एहतिराम जानते हैं और ना मोज़न का और ना ही उन के हुक़ूक़ बरवक़्त अदा किये जाते हैं । वटे पली में वाक़ै एक मस्जिद के इमाम साहब के मुताबिक़ 3 माह से उन्हें तनख़्वाह नहीं मिली है और तनख़्वाह के हवाले से जब सदर से गुफ़्तगु की जाती है तो वो बदतमीज़ी से पेश आते हैं ।

नीज़ जब मसले इन मस्जिद के किसी मसला पर इन से तबादला ख़्याल करने घर पहुंचते हैं तो अपनी ताक़त के झूटे ज़ोअम की बीमारी में मुबतला ये सदर साहब टेबल पर लाईसैंस याफ़ता रीवोलवर रख कर बात करते हैं । जिस की वजह से किसी को लब कुशाई की हिम्मत ही नहीं होती और उल्टे पाउं अपने घरों को लौट आते हैं एक और मस्जिद के सदर साहब की दीन बेज़ारी का आलम सुनये कि इन के नूर नज़र की शादी में बारात बड़ी धूम धाम से निकाली गई । दूल्हे मियां बग्घी में सवार थे और उन के सामने बाजे और मरफ़ा के बीच में नौजवान और अधेड़ उम्र के हज़रात मदहोशी में झूम रहे थे ।नीज़ आतिशबाज़ियों का सेल रवां था और अफ़सोस बालाए अफ़सोस ये कि वलीमा में एसा आरकैस्टरा का नज़म किया गया था जिस में नीम ब्रहना कपड़ों में फ़ाहिशा लड़कियां इंतिहाई फ़हश गानों के साथ रक़्स पेश कर रही थीं ।

जिस में जहालत और बेहयाई की तमाम हदें तोड़ दी गइं । चंद मसाजिद के सदूर एसे भी हैं जो अपनी ताक़त दुनियावी असर-ओ-रसूख़ और दौलत के बल पर एक नहीं दो दो मसाजिद की कमेटियों के सदर बने बैठे हैं । कुछ एसे भी हैं जो सिर्फ जुमा की नमाज़ के मौक़ा पर मस्जिद में नज़र आते हैं और बाअज़ एसे भी ख़ौफ़ ख़ुदा और ख़ौफ़ आख़िरत से ख़ाली सदूर हैं जो सिर्फ मसाजिद की आमदनी से नाजायज़ फ़ायदा उठाने के लिए सदर बने बैठे हैं । चुनांचे शहर की एक एसी मस्जिद है जिस की 4 मलगियां सदर साहब के क़बज़े में हैं और वो इन मिलगियों का किराया मस्जिद को 2000 रुपये अदा करते हैं ।

जब कि इन मिलगियों को उन्हों ने दूसरे को बाज़ार के हालिया किराया पर दे रखा है जिस से उन्हें माहाना 8 हज़ार रुपये हासिल होते हैं । श्रम के मारे उस वक़्त हमारी गर्दन झुक गई जब मालूम हुआ कि बाअज़ अफ़राद ने मस्जिद के सदर बन कर इस के तहत मौक़ूफ़ा अराज़ी फ़रोख़त करदी । अल्लामा इक़बाल ने एसे ही लोगों के हवाले से कहा था बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो इस पुर आशूब हालात में ये सवाल ज़हन में बार बार गर्दिश करता है कि अहल मुहल्ला क्यों ग़फ़लत शआरी में मुबतला हैं । वो अपना मिली फ़रीज़ा और दीनी ज़िम्मेदारी क्यों नहीं समझते । जहां एसे बेअमल बल्कि ब अमल सदूर की आख़िरत में सख़्त पकड़ होगी ।

जहां अल्लाह के सिवा कोई ओ-मददगार ना होगा वहीं अहल मुहल्ला से भी बाज़पुर्स होगी । लिहाज़ा उन को चाहीए कि मस्जिद कमेटी के अरकान-ओ-सदूर के लिए उसे अफ़राद का इंतिख़ाब अमल में लाया जाय जो पंच वक़्त नमाज़ी , मुत्तक़ी , परहेज़गार , ख़ुदातरस , दीनी फ़हम का हामिल , रहम दिल , अमानतदार , उल्मा प्रवर , बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करने वाले हूँ ताकि मस्जिद का निज़ाम बेहतर होसके और इस की अफादियत से अवाम बहरे आवर और फ़ैज़याब हो और मुहल्ला में देनी माहौल बने ।।

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