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कोई नया नहीं है राजनीति में टिकट न मिलना

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फैसल फरीद, लखनऊ: राजनीति में पार्टियां अपने उम्मीदवार बदला करती हैं। चुनाव के समय लोगों के टिकट कटते हैं और नए लोगों को मिलते भी है। पार्टी के अन्दर भी नेताओं के व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएं टकराती हैं और गुटबाज़ी होती रहती हैं।

ये सब कोई नयी बात नहीं है जैसा अब लग रहा हैं कि उत्तर प्रदेश में सब खत्म हो जायेगा। हर पार्टी में ऐसा होता हैं। आप समाजवादी पार्टी की लिस्ट देखिए तो मात्र 47 मौजूदा विधायकों के टिकट जिसमें मंत्री भी शामिल हैं, के काट दिए गए हैं। 325 घोषित प्रत्याशी की सूची में यह मात्र 14.46 प्रतिशत हुआ। आम तौर पर 20 प्रतिशत टिकट काट दिए जाते हैं। अगर टिकट न बदला जाए तो कैसे नए लोग आएंगे, पुराने कब तक चलेगें।

अब इन 47 लोगों में शायद 15-20 ऐसे होंगे जिनके लिए अखिलेश का खुला समर्थन होगा। बाकी तो अपना टिकट काटने से अब अखिलेश खेमे में स्वतः खड़े हो गए हैं। मतलब मात्र 15-20 टिकट के लिए अखिलेश बड़ा कदम उठाए। ऐसा मुश्किल लगता हैं।

राजनीति के मूल्य अब धीरे धीरे ख़त्म होते जा रहे हैं। किसी नेता का टिकट कटने पर वो तुरंत बागी हो जाता हैं। उसके समर्थक जिनको वो पार्टी का कार्यकर्ता बताने लगता हैं वो भी उसके साथ खड़े होते हैं। असलियत ये होती हैं कि सिर्फ उसके समर्थक खिलाफ हो जाते हैं और राजनीति चलती रहती हैं। शायद 10 सीट ऐसी होगी जहां टिकट काटने से पार्टी हार जाए, वरना रिजल्ट पर असर नहीं पड़ता हैं।

जब नैतिक मूल्यों की राजनीति नहीं रही, आइडियोलॉजी के ऊपर पार्टी के नेतृत्व के ज्यादा करीबी होने का कम्पटीशन है, ऐसे में टिकट काटने में पूरे समाजवाद को खतरे में बताना ठीक नहीं हैं। रही बात अखिलेश समर्थको के इस बात का दावा करने की कि माहौल केवल अखिलेश के पक्ष में हैं, तो जो लोग ज़रा भी उत्तर प्रदेश की राजनीति से वाकिफ हैं वो अच्छी तरह जानते हैं कि अखिलेश के साथ युवाओं का समर्थन है। पार्टी के युवा नेता उनके साथ हैं। लेकिन वो संख्या 50 से ज्यादा नहीं है जो सीरियसली चुनाव लड़ सकते हैं। ज़्यादातर युवा समर्थक नारे लगा सकते हैं, रैली में भीड़ नहीं ला सकते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ कितनी है यह सबको मालूम है। सड़क पर संघर्ष करना और चुनाव में संघर्ष करना दो अलग-अलग बातें हैं। सिर्फ जिंदाबाद-जिंदाबाद करने से कुछ नहीं होता हैं।

ये बात और हैं कि अखिलेश स्वयं कोई फैसला लें। लेकिन वो भी सिर्फ टिकट काटने की वजह से नहीं होगा। बल्कि तमाम दूसरी वजह रहेंगी। अखबारों के लिए लेकिन ये सिर्फ टिकट ही एक कारण दिखेगा। क्योंकि वो उतना ही देख पाते है जितना उनको नेता देखने देता हैं। टिकट सिर्फ एक बहाना होगा और अखिलेश का फैसला इस बात पर होगा कि उनको सबसे ज्यादा इस बात पर यकीन होगा कि वो अकेले चुनाव लड़ सकते हैं और सफल रहेंगे। किसी के टिकट काटने और मिलने से उनके फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

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