Wednesday , October 18 2017
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क्या युपी का अगला मुख्यमंत्री मुसलमान बन सकता है ?

73 जिलों वाले उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 403 सीट हैं। लगभग सभी जिलों में एक से दो सीट मुस्लिम बाहुल्य हैं। कुछ जिलों में तीन से चार सीट मुस्लिम बाहुल्य हैं। वहीँ कुछ जिलों में कुछ ऐसी सीट भी हैं जहाँ मुसलमान ही हार जीत का फैसला करते हैं। लिहाजा मुस्लिम प्रत्याशी मुसलमानों के दम पर 150 सीट बड़ी आसानी से जीत सकते हैं। इसका मतलब साफ़ है कि उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री मुसलमान बन सकता है, लेकिन ऐसा होना मुश्किल ही नही नामुमकिन है?

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मुठ्ठी भर दलितों के दम पर राजनीति करने वाली मायावती ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 100 मुस्लिम प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने का ऐलान कर दिया है। अभी नेता जी यानी मुलायम सिंह यादव की घोषणा बाकी है। हो सकता है नेता जी 150 मुस्लिम प्रत्याशियों को चुनावी दंगल में टाल ठोंकने की इजाजत दे दें। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी कम से कम 50-50 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारेगी। रालोद भी 50 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतार सकती है। अब बात करते हैं दो दिग्गज मुस्लिम नेताओं की?
असदउद्दीन ओवैसी 403 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का मन बना चुके हैं। वह कम से कम 250 मुस्लिम प्रत्याशी तो चुनाव मैदान में उतारेंगे ही। डॉ. अय्यूब भी 50 मुस्लिम प्रत्याशियों पर अपना भाग्य आजमाएंगे। पडोसी राज्यों के दल भी मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर अपनी किस्मत आजमाएंगे। लिहाजा दलीय 700 से 800 मुस्लिम प्रत्याशी मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं। निर्दलीय मुस्लिम प्रत्याशी जीत के समीकरण बिगाड़ने से नही चूकेंगे। नतीजा यही होगा कि जिन 150 सीटों को मुसलमान बड़ी आसानी से जीत सकता है। उन जीती जिताई सीटों में से 50 से 70 सीट को अपने नाम करने के लिए भी जद्दो जहद करनी पड़ेगी।
अब सरकार सपा की बने या फिर बसपा की? दो चार मुस्लिम विधायक मंत्री बन ही जाएंगे? उसके बाद हम आप अपनी किस्मत को दोष देकर एक दूसरे पर कीचड़ उछालेंगे? किसकी वजह से ये हार गया, उसकी वजह से वो हार गया? लेकिन पहले से ये मुक़र्रर नही करेंगे कि हम अपना वोट कहाँ दें जो हम अपने वोट की ताकत को जान सकें। दलितों ने एकजुट होकर अपने वोट की ताकत का एहसास कराया तो बसपा सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन बैठी। यादवों से मुलायम सिंह यादव का दामन थामे रखा तो नेता जी तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और अब अखिलेश यादव सूबे के हाकिम हैं। दलित और यादव दोनों समुदाय एक होकर भी मुस्लिम समुदाय के बराबर नही हैं। उसके बाबजूद उनके नेता सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
बस चुनाव आने दो फिर देखना कोई सपा तो कोई बसपा का झंडा हाथ में लेकर हलक फाड़ फाड़कर जयकारे लगाता नजर आएगा। हमारी कौम के दलाल इन नेताओं से अपनी कौम के वोटों का सौदा कर लेंगे और हमें बरगलायेंगे कि इस्लाम खतरे में है? उसे वोट दोगे तो ऐसा हो जायेगा? इसे वोट दोगे तो वैसा हो जायेगा? कुल मिलाकर अपना ही सत्यानाश हो जायेगा? क्या इस बार विधानसभा चुनाव में कौम के वोटों के दलालों को खदेड़ा जाए और असदउद्दीन ओवैसी को अपना नेता चुन लिया जाये? फिर देखना कैसे बदलेगा उत्तर प्रदेश का निजाम और कैसे बदलेगी मुसलमानों के विकास की तस्वीर?
मेरी बात से हो सकता है कई लोग सहमत न हॉ ऐसा होना भी चाहिये , एख्तलाफ या मतभेद बेहतर नस्बुलऐन या उद्देश्य के लिये बहुत ज़रूरी है लेकिन मुझे ये बात डंके की चोट पर कहनी है कि यदि दलित तबका सिर्फ अपनी एक पार्टी बसपा को वोट देकर , दलित नेत्री मायावती पर केंद्रित होकर उनको मुख्य मंत्री बना सकता है ! यादव सपा पर केंद्रि होकर ,यादव मुलायम सिंह और अखिलेश यादव को मुख्य मंत्री बना सकता है तो मुस्लिम क्यों नही केंदित होकर अपना एक नेता और पार्टी बना सकते हैं ! हमें मुख्यमंत्री की कुर्सी नही चाहिये हमें अपने वजूद को एहसास कराना ही असल मकसद है ! मुस्लिम क्यों अपने नेताओं में फरिश्तों की खूबी ढूढने लगते है ,? दूसरों की अफवाह पर हम अपने ही नज़रों से अपने नेताओं को क्यों गिरा देते है ? आज़ादी के बाद से आज तक मुस्लिमों के साथ यही किया गया और मुस्लिम भी इन्ही साज़िशों का शिकार होकर अपनी कौम में पैदा होने वाली सलाहियतों का गला घोंटते रहे !
ये मिसाल मुस्लिमों के सामने है, कि किस तरह कोइ दसवी पास या फेल, निरन्तर जुमलेाज़ी करने वाला , इतिहास को भूगोल , और भूगोल को समाज शास्त्र बनाने वाला , माईथोलोजी को साईंस का नाम देने वाले को ,अर्थात उस में सब प्रकार की कमियां होने के बाद भी मुट्ठी भर लोग उसे आज बडा नेता बनाकर खडा करने में सफल हो जाते हैं ! हमारे पास बहुत बेहतर सलाहियतों वाले उच्च शिक्षित लोग है ! लेकिन हमें सिर्फ उनमे बुराइयाँ ही नज़र आती है. इस पर हमें ठन्डे दिमाग से सोचने की ज़रूरत है।

BY: Hafiz Abdul Samad
(लेखक आॅल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सीसामऊ विधानसभा सदर हैं )

यह लेखक के निजी विचार हैं

HAFIZ ABDUL SAMAD
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