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ख़ुशहाल मुस्लमानों के शहर में बदहाल मुस्लमान कचरा चुनने पर मजबूर

अबू ऐमल हैदराबाद फर्खुन्दा बुनियाद हिंदूस्तान में ख़ुशहाल मुस्लमानों का शहर, एक ऐसा शहर जहां के दरोदीवार आज भी ममलिकत दक्कन पर मुस्लिम हुक्मरानों की तक़रीबन 745 साल तक की गई ग़ैरमामूली हुक्मरानी की गवाही देते हैं। इस शहर और इस के

अबू ऐमल हैदराबाद फर्खुन्दा बुनियाद हिंदूस्तान में ख़ुशहाल मुस्लमानों का शहर, एक ऐसा शहर जहां के दरोदीवार आज भी ममलिकत दक्कन पर मुस्लिम हुक्मरानों की तक़रीबन 745 साल तक की गई ग़ैरमामूली हुक्मरानी की गवाही देते हैं। इस शहर और इस के अतराफ़-ओ-अकनाफ़ में दुनिया को दावत नज़ारा देने में मसरूफ़ फ़न तामीर की शाहकार तारीख़ी इमारतें इस बात का सबूत हैं कि यहां के मुस्लमानों की ख़ुशहाल माज़ी में भी मिसाल थी। हुकमरानों की रहम दिल्ली, सख़ावत-ओ-मुरव्वत का ये हाल था कि हिंदूस्तान की दीगर रियास्तों और दुनिया के मुख़्तलिफ़ ममालिक से लोग बिलख़सूस मुख़्तलिफ़ शोबा-ए-हियात के माहिरीन इस शहर का रुख करने को तर्जीह देते थे।

ये ऐसा शहर था, जहां हर फ़र्द के चेहरा पर ख़ुशी-ओ-मुसर्रत झलकती थी। ऐसा लगता था कि ग़ुर्बत ने इस शहर का रुख करने से एह्तिराज़ क्या हो। ग़ुर्बत जैसा लफ़्ज़ लोग यहां कम सुना करते थे, लेकिन क़ुदरत तबदीली चाहती है और इसी क़ुदरती निज़ाम के तहत एक ऐसा वक़्त भी आया कि आज मुस्लमानों का ख़ुशहाल शहर समझा जाने वाला हैदराबाद के मुस्लमानों की मआशी हालत देख कर हैरत होती है कि यही थे वो जिन की कल तक यहां हुक्मरानी थी और आज उन की बेबसी का चहारदांग आलम में चर्चा है। बाअज़ औक़ात ग़ुर्बत के मनाज़िर देख कर बेइख़्तयार आँख में आँसू आ जाते हैं। इस तरह का एक तकलीफ़देह मंज़र हमारी आँखों को आज देखना पड़ा। जब चारमीनार, शाह अली बंडा सड़क पर एक 70 ता 75 साला ज़ईफ़, नहीफ़-ओ-लागर मुअम्मर ख़ातून को हम ने एक बड़े काटून में सड़क से और दुकानों से फेंकी गई नाकारा अशीया को जमा करके सर पर उठा कर चलते देखा, चलने के दौरान इस के क़दम लरज़ रहे थे।

इस की बेचारगी और मुहताजगी उस की बदहाली से बिलकुल आशकारा हो रही थी। वो चिलचिलाती धूप में नंगे पैर चल रही थी जबकि इस शदीद गर्मी में नंगे पैर 10 क़दम भी चला जाय तो मालूम होगा के तलवों की गर्मी से दिमाग़ कैसे खोलता है। इस ख़ातून से जब हम ने बात की तो इस ने अपनी इंतिहाई मुख़्तसर गुफ़्तगु में बताया कि वो चारमीनार, शाह अली बंडा की सड़कों पर और दुकानों के सामने फेंके गए काग़ज़ात प्लास्टिक वग़ैरा चुन कर किसी की मदद से इस वज़न काटूँ को अपने कमज़ोर सर पर रखती है और अलीआबाद में ले जाकर उसे फ़रोख़त करती है, जिस से उसे 60 -70 रुपय मिल जाते हैं। इस मामूली रक़म से वो अपना और अपने नवासों का बंद-ओ-बस्त करती है। इस का कहना है कि मैं रोज़ाना ख़ाली काटून लेकर इसी तरह नाकारा चीज़ें जमा करके गुज़र बसर करती हूँ और जब तक मेरे पैरों में जान रहेगी में मेहनत करके ज़िंदगी गुजारूंगी, क्योंकि ये भीक मांगने और हाथ फैलाने से बेहतर है।

क़ारईन हम ने देखा कि ये उमरदराज़ ज़ईफ़ ख़ातून वज़नी काटूँ को सर पर उठाए जब चल रही थी, तो ऐसा महसूस हो रहा था कि वो चार क़दम भी नहीं चल पाएगी और जब वो अलीआबाद में एक कबाड़ी की दुकान पर पहुंची तो इस में इतनी भी ताक़त नहीं थी कि वो ख़ुद इस काटून को अपने सर से उतार सके। दुकानदार को इस ने काटून उतारने को कहा। इस के बाद वो पसीना में शराबोर कुछ देर तक बिलकुल ख़ामोश बैठ गई। इस की सांसें तेज़ी से चिड़ रही थीं। इस की आवाज़ बिलकुल बंद थी। थोड़ी देर के बाद इस ने दुकानदार से कहा इसे तोलो। इस ज़ईफ़ा की ग़ुर्बत और तंगदस्ती देख कर हमारे साथी ने कहा कि सच्चर कमेटी ने बड़े हक़ीक़त पसंदाना अंदाज़ में मुस्लमानों को मुल्क का सब से पसमांदा तरीन तबक़ा क़रार दिया है। काश ! इस रिपोर्ट की मुख़ालिफ़त करने वाले हज़रात भी इस मुस्लिम ख़ातून की लाचारी और बेबसी को देखते। इस ख़ातून ने कहा कि मेरे ज़िंदा रहने का सिर्फ यही ज़रीया है जिसे मैं मौत तक नहीं छोड़ूँगी। मुकम्मल बुर्क़ा में मलबूस इस ख़ातून ने दौरान गुफ़्तगु जब हम ने इस का पता दरयाफ्त किया तो इस ने इसरार के बावजूद घर का पता नहीं बताया।

सिर्फ इतना कहा कि मैं फ़लक नुमा के पास एक झोंपड़ी में रहती हूँ। क़ारईन ! हम में से अक्सर लोग अपने आस पास के माहौल और वहां के मुस्लमानों की मआशी हालत को देख कर मुतमइन हो जाते हैं और ये समझते हैं कि शहर में बसने वाले तमाम मुस्लमान किसी क़दर ख़ुशहाल हैं जब ज़मीनी हक़ायक़ इस के बरअक्स है। जिसे जानने के लिए हर मुस्लमान को उस्मानिया दवाख़ाना, मुस्लिम बस्तीयों और झोंपड पट्टियों का हर माह मुआइना करना चाहीए ताकि अंदाज़ा हो के ग़ुर्बत, मुसीबत, बीमारी और परेशानी क्या होती है और ये ग़रीब लोग इन हालात में कैसे गुज़र बसर करते हैं क्योंकि जब इंसान अपने से कमतर को देखता है तब ही उस की ज़बान से अल्हम्दुलिल्ला जैसे मुबारक अलफ़ाज़ निकलते हैं। क़ारईन ये मुअम्मर ख़ातून अपने रोज़मर्रा के इस काम के साथ साथ जुमा के दिन शाह अली बंडा की एक मस्जिद में मुस्लियों के जूतों की हिफ़ाज़त भी करती है और ये ग़रीब ख़ातून हर वक्त मुकम्मल हिजाब में रहती है।

क़ारईन ! ग़ुर्बत की मारी इस ख़ातून की दर्द भरी कहानी पढ़ कर हमारी तरह आप के ज़हन में भी कई सवालात गर्दिश कर रहे होंगे कि एक वक़्त ऐसा भी था कि दक्कन में पहले कभी ऐसे मनाज़िर देखने में नहीं आते थे। हर तरफ़ ख़ुशहाल लेकिन शानदार माज़ी रखने वाले हम मुस्लमान आज हर लिहाज़ से पसमांदगी का शिकार हो गए? हम अगर हक़ीक़त पसंदाना जायज़ा लें तो हमें मालूम होगा कि हज़ारों की तादाद में ग़ुर्बत-ओ-इफ़लास के बाइस इस तरह ग़रीब औरतें घरों में काम काज करते हुए दो वक़्त की रोटी का इंतिज़ाम करने में लगी होती हैं। इन के दिल रोते हैं लेकिन उन की आवाज़ हमारी कानों में नहीं आती क्योंकि मुफ़ाद परस्ती और अपनी ख़ुशीयों के शोर में हमें कुछ सुनाई नहीं देता।

हमें ये ग़रीब रोते तो दिखाई देते हैं लेकिन उन की आँखों से गिरने वाले आंसूओं पर हमारी नज़र नहीं पड़ती। नीज़ हम पैर हाथ फैलाने वाले को ग़रीब समझ कर इस का तआवुन कर देते हैं, लेकिन हक़ीक़ी ग़रीबों तक हम नहीं पहुंच पाते। काश ! हम यानी मिल्लत का हर फ़र्द अपने ग़रीब भाई बहनों की जानिब तआवुन का हाथ आगे बढ़ाते ताकि फिर हमें कोई मजबूर-ओ-बेबस माँ सड़कों पर इस तरह नाकारा अशीया जमा करती हुई नज़र ना आए।

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