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गर्भवती लड़कियों को स्कूल से बैन कर दिया जाना चाहिए : तंजानिया के राष्ट्रपति

डेडोमा : तंजानिया के राष्ट्रपति का मानना है कि गर्भवती लड़कियों को स्कूल से बैन कर दिया जाना चाहिए। पिछले हफ्ते एक रैली में बोलते हुए राष्ट्रपति जॉन मागुफूली ने कहा, ‘जबतक मैं राष्ट्रपति हूं, तब तक किसी भी गर्भवती लड़की को स्कूल लौटने की इजाजत नहीं होगी। समझिए कि प्रेगनेंट होने के बाद आप खत्म हो गईं।’ राष्ट्रपति ने कहा कि बच्चा होने के बाद लड़कियों का ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता और उनकी मौजूदगी स्कूल की बाकी छात्राओं पर बुरा असर डालेगी। स्कूली पढ़ाई के दौरान ही गर्भवती हो जाने वाली महिलाओं का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा, ‘गणित के कुछ सवाल हल करने के बाद ऐसी लड़कियां क्लास के शिक्षक से पूछेंगी कि क्या वे अपने बच्चे को दूध पिलाने जा सकती हैं।’

‘द गार्डियन’ की एक खबर के मुताबिक, राष्ट्रपति के इस बयान की काफी आलोचना हो रही है। मानवाधिकार संगठनों ने मागुफूली के इस फैसले को असंवैधानिक बताया है। 1960 के दशक में बने एक कानून ने तंजानिया के सभी सरकारी स्कूलों में युवा छात्राओं के मां बनने के बाद उनकी स्कूली पढ़ाई पर प्रतिबंध लगा दिया था। 2013 में आई सेंटर फॉर रिप्रॉडक्टिव राइट्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक के दौरान 55,000 से ज्यादा गर्भवती लड़कियों को स्कूल से निकाला जा चुका है। महिला संगठनों का कहना है कि यह कानून तंजानिया के लोगों की सोच से मेल नहीं खाता। साथ ही, यह कानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नियमों के खिलाफ भी बताया जा रहा है।

2015 में सत्तारूढ़ पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था कि वह गर्भवती छात्राओं को बच्चे के जन्म के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखने का मौका देगी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कानून के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया है। ईक्वलिटी नॉउ के अफ्रीका ऑफिस की निदेशक फैजा जामा मुहम्मद ने बताया, ‘हमें सुनिश्चित करना होगा कि लड़कियां स्कूल जाएं और पढ़ाई पूरी करें। यह उनका अधिकार है। अगर इसके लिए हमें सरकारी फैसले को अदालत में चुनौती देनी पड़े, तो ऐसा करने से भी हम नहीं झिझकेंगे।’

 राष्ट्रपति के बयान के बाद तंजानिया में #StopMagufuli हैशटैग कई दिनों तक ट्रेंड करता रहा। इस प्रतिबंध का विरोध करने के लिए एक ऑनलाइन याचिका भी दायर की गई है। इसपर अबतक 2,500 लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं। आंकड़ों के मुताबिक, तंजानिया में 15 से 19 साल की उम्र की करीब 21 फीसदी लड़कियों ने बच्चे को जन्म दिया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बड़ी संख्या में लड़कियां बलात्कार, यौन हिंसा और जबरन शारीरिक संबंध बनाए जाने की शिकार होकर गर्भवती हो जाती हैं। इनकी दलील है कि पढ़ाई छूट जाने पर गरीबी और अशिक्षा और ज्यादा बढ़ेगी। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को गर्भवती छात्राओं पर प्रतिबंध लगाने की जगह कच्ची उम्र में उनके प्रेगनेंट होने की समस्या से निपटने की रणनीति तैयार करनी चाहिए।
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