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ग़ुस्सा ने मेरी ज़िंदगी तबाह करदी, काश मैं अपने ग़ुस्सा पर क़ाबू रखता

ग़ुस्सा इंसान को तबाही-ओ-बर्बादी, पछतावे और अफ़सोस के गहरे दलदल में ढकेल देता है। ग़ुस्सा दरअसल जाहिलियत है जो दूसरों में किसी इंसान की क़दर-ओ-मंजिलत ख़त्म कर देता है लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि ग़ुस्सा इस बात पर आए जो ग़ुस्सा के काब

ग़ुस्सा इंसान को तबाही-ओ-बर्बादी, पछतावे और अफ़सोस के गहरे दलदल में ढकेल देता है। ग़ुस्सा दरअसल जाहिलियत है जो दूसरों में किसी इंसान की क़दर-ओ-मंजिलत ख़त्म कर देता है लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि ग़ुस्सा इस बात पर आए जो ग़ुस्सा के काबिल हो लेकिन फिर भी हमारे नबी सलल्लाह अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को ग़ुस्सा पर क़ाबू पाने की हिदायत दी है। आप सलल्लाह अलैहि वसल्लम का इरशाद मुबारक है कि किसी को ग़ुस्सा आ जाए तो वो खड़ा हो तो बैठ जाए। बैठा हो तो लेट जाए और फ़ौरी पानी पी ले। क़ारईन आप को बतादें कि नुमाइश में क़ैदीयों की तैयार करदा अशीया की फरोख्त के लिए हर साल स्टाल क़ायम किया जाता है।

इस स्टाल की तैयारी में भी उम्र क़ैद काट रहे क़ैदी अहम रोल अदा करते हैं। जब राक़िम उल-हरूफ़ इस स्टाल का जायज़ा लेने पहूँचा तो देखा कि तक़रीबन 10 क़ैदी कारपेट्रों की हैसियत से स्टाल बनाने में मसरूफ़ हैं। हमारी मुलाक़ात 29 साला क़ैदी मुहम्मद उमर साकिन मौलाअली से हुई। इस स्टाल पर क़ैदीयों से काम लेने वाले इंस्ट्रक्टर से इजाज़त लेकर हम ने मुहम्मद उमर से बातचीत की। उन्हों ने बताया कि साल 2003 में उन के हाथों मामूली मसला पर पड़ोस का कत्ल हो गया था। कत्ल की वजह पूछने पर इस ने ख़ामोशी इख़तियार की और सिर्फ़ ये कहने पर इकतिफ़ा किया कि दोस्तों की बातों में आकर इस ने इस भयानक ग़लती का इर्तिकाब किया।

एक सवाल पर उस ने बताया कि इस जुर्म के मौक़ा पर उस की उम्र सिर्फ़ 20 साल थी और वो अपनी सज़ाए उम्र क़ैद के 9 साल मुकम्मल कर चुका है। वो बार-बार अपने किए पर पछता रहा था और यही कह रहा था कि उसे ऐसा जुर्म हरगिज़ नहीं करना चाहीए था। अपने ख़ानदान के बारे में पूछे गए सवाल पर मुहम्मद उमर ने बताया कि उस के 5 भाई और एक बहन है। वालिद कारोबार करते हैं। अपनी तालीम के बारे में उमर ने बताया कि इस ने दसवीं जमात तक तालीम हासिल की और उसे उम्मीद थी कि ज़िंदगी में वो ज़रूर कामयाब होगा लेकिन ज़िंदगी में 2003 के दौरान एक ख़तरनाक मोड़ आया, जिस ने सारे ख़ाबों को चकनाचूर कर दिया और सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया।

मुहम्मद उमर का ये भी कहना है कि जब वो क़ैद-ओ-बंद की सऊबतों से आज़ाद होगा तो एक अच्छे शहरी की तरह ज़िंदगी गुज़ारेगा। बिज़नस के ज़रीया अपनी और अपने अरकान ख़ानदान की ज़िंदगीयों को संवारने की कोशिश करेगा। इस ने मज़ीद बताया कि जेल में क़ैदीयों से 6 घंटे काम लिया जाता है और 50 रुपये यौमिया उजरत अदा की जाती है, लेकिन ये रक़म क़ैदीयों को देने की बजाय उन के बैंक अकाउंट्स खोल कर उस में जमा करवाई जाती है। रिहाई के वक़्त सारी रक़म वापिस दी जाती है। मुहम्मद उमर के मुताबिक़ जेल में एक बयारक को मुस्लिम क़ैदीयों ने नमाज़गाह में तबदील कर दिया है और उस में वो पंजवक्ता नमाज़ें अदा करते हैं।

पेरोल पर अपनी रिहाई के बारे में मुहम्मद उमर ने बताया कि 9 साल के दौरान सिर्फ़ एक मर्तबा 14 यौम के लिए वो अपने घर गया था। उस ने जेल सुपरिन्टेन्डेन्ट और मिस्टर श्रीनिवास और जेलर की भी सताइश की और कहा कि दोनों क़ैदीयों से अच्छा बरताव करते हैं। बहरहाल मुहम्मद उमर की कहानी ये बताती है कि ग़ुस्सा ने उसे जेल की सलाखों के पीछे पहूँचा दिया। [email protected]

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