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गुजरात की तीन अटपटी ख़बरें :डॉ० वेदप्रताप वैदिक‌

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डॉ० वेदप्रताप वैदिक‌
अभी मैं अहमदाबाद आया हुआ हूं। ज्यों ही सुबह अखबार खोले, तीन खबरों ने मेरा ध्यान एकदम खींचा। एक तो अहमदाबाद में लगे संजय जोशी के पोस्टरों ने, दूसरा, पहली कक्षा से ही अंग्रेजी को अनिवार्य करने के इरादे ने और तीसरा, गुजरात में हुए स्थानीय चुनावों के आंकड़ों को छिपाए रखने पर! इन तीनों खबरों ने मुझे यह सोचने के लिए मजबूर किया कि क्या यह वही गुजरात है, जिसे नरेंद्र मोदी ने सारे देश में नमूने की तरह पेश किया था? ये तीनों खबरें गुजराती राजनीति के बौद्धिक दिवालिएपन का सबूत है। इसके लिए मुख्यमंत्री आनंदी बेन को जिम्मेदार जरुर ठहराया जा सकता है लेकिन इसके मूल स्त्रोत नरेंद मोदी ही है। 

संजय जोशी संघ के अत्यंत लोकप्रिय स्वयंसेवक हैं। भाजपा के अध्यक्ष से ज्यादा बड़ी भीड़ आज भी संजय के घर पर रोज़ होती है। संजय किसी बड़े पद पर नहीं हैं लेकिन सारे देश में उनके चाहनेवाले हैं। संजय का महत्व इसलिए भी बढ़ गया कि नरेंद्र मोदी उनको अपना व्यक्तिगत दुश्मन मानते हैं। संजय के खिलाफ मोदी ने पार्टी में मोर्चा खोल रखा है लेकिन अद्भुत हैं, गुजरात के लोग कि मोदी की नाक के नीचे अहमदाबाद में बार-बार संजय के पोस्टर लगाते हैं, नारे लगाते हैं और उनको देखने के लिए यहां भीड़ उमड़ती है। अहमदाबाद की पुलिस उन भाजपा कार्यकत्र्ताओं और संघ के स्वयंसेवकों को गिरफ्तार करना चाहती है, जिन्होंने ‘संजय लाओ, भाजपा बचाओ’ के पोस्टर लगा रखे हैं। जाहिर है कि शहर की पुलिस यह काम किसी न किसी के इशारे पर कर रही है। यह बिल्कुल गैर-कानूनी और अलोकतांत्रिक काम है। इन पोस्टरों की वजह से संजय जोशी कोई गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं बन जाएंगे। वे लगे हुए हैं तो लगे रहें। 18 दिसंबर को यदि मोदी गुजरात आ रहे हैं तो आएं। क्या वे इतने कमजोर हैं कि इन पोस्टरों को देखकर डर जाएंगे?

दूसरी खबर यह है कि गुजरात सरकार पहली कक्षा से ही बच्चों पर अंग्रेजी लादना शुरु करना चाहती है। हिरन पर घास लादने का यह अराष्ट्रीय काम हमारे सर्वज्ञ ओर महान दूरंदेश नेताजी ने ही शुरु किया था। उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर तीसरी कक्षा से अंग्रेजी थोपी थी। उनकी मंशा तो बहुत अच्छी थी कि गुजराती बच्चे नौकरियों में पिछड़े नहीं लेकिन इसके लिए उनमें बुद्धि और साहस दोनों होते तो वे सरकार की भर्ती परीक्षाओं से अंग्रेजी को हटवाते लेकिन उन्होंने शराबखोरी का इलाज़ यही समझा कि शराबी को दो बोतल और पिला दो। इसके मूल में हीनता-ग्रंथि काम कर रही है। इस हीनता से मुक्त होने का आह्वान संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने खुले-आम किया है। गुजरात सरकार जो कुछ करने जा रही है, उससे लाखों बच्चों की बौद्धिक अपंगता तो बढ़ेगी ही, राष्ट्रवाद को भी पलीता लगेगा। इसलिए पिछले डेढ़ साल में हिंदी के मामले में मोदी सरकार डेढ़ इंच भी आगे नहीं बढ़ी है। 

तीसरी खबर यह है कि गुजरात के मुख्य चुनाव आयुक्त बरेश सिंहा ने अभी तक स्थानीय चुनावों के विस्तृत आंकड़े प्रकाशित नहीं किए हैं जबकि उन्हें यह काम 10 दिन पहले ही कर देना चाहिए था। इन चुनावों में भाजपा ने शहरों में 3.3 प्रतिशत, जिला पंचायतों में 6.21 प्रतिशत और तालुका पंचायतों में 5.36 प्रतिशत वोट खोए हैं। कांग्रेस के 9 प्रतिशत वोट बढ़े हैं। बरेश सिंहा गुजरात के मुख्य सचिव थे। वे मोदी के चहेते हैं। उन्हें सेवा-निवृत्ति के बाद यह महत्वपूर्ण पद सौंपा गया है। भला, उनके मुंह से अपने कृपालु की पराजय की कहानी इतनी जल्दी कैसे फूट सकती है?

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