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गुजरात के हालात इमरजेंसी से भी बदतर

वज़ीर-ए‍आला ( मुख्यमंत्री) गुजरात नरेंद्र मोदी के कट्टर हरीफ़-ओ-बी जे पी क़ाइद ( लीडर) केशू भाई पटेल ने एक बार फिर मोदी और उन की हुकूमत को निशाना बनाते हुए कहा कि रियासत (राज्य) गुजरात के हालात इमरजेंसी के ज़माने से ज़्यादा ख़राब हैं।

वज़ीर-ए‍आला ( मुख्यमंत्री) गुजरात नरेंद्र मोदी के कट्टर हरीफ़-ओ-बी जे पी क़ाइद ( लीडर) केशू भाई पटेल ने एक बार फिर मोदी और उन की हुकूमत को निशाना बनाते हुए कहा कि रियासत (राज्य) गुजरात के हालात इमरजेंसी के ज़माने से ज़्यादा ख़राब हैं।

याद रहे कि 2001 में जिस वक़्त नरेंद्र मोदी ने वज़ीर-ए-आला का ओहदा सँभाला , इससे क़बल केशू भाई पटेल ही गुजरात के वज़ीर-ए-आला थे। केशू भाई पटेल नरेंद्र मोदी पर तन्क़ीद (समीक्षा) करने का कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं देते और इमरजेंसी का ज़िक्र भी उन्होंने एक ऐसे वक़्त किया है जब इसके नफ़ाज़ ( जारी करने) को 37 साल मुकम्मल ( पूरे) हो रहे हैं यानी आज से 37 साल क़बल उस वक़्त की वज़ीर-ए‍आज़म ( प्रधान मंत्री) इंदिरा गांधी ने मुल्क में इमरजेंसी का ऐलान किया था।

इस मौक़ा पर 82 साला केशू भाई ने नरेंद्र मोदी के हुकूमत करने के तरीक़ा को तन्क़ीद (समीक्षा) का निशाना बनाया। अपने ब्लाग में तहरीर करते हुए केशू भाई पटेल ने कहा कि मुल्क में इमरजेंसी के नफ़ाज़ ( लागू करने ) की आज 37 वीं सालगिरा है और इस मौक़ा पर मैं गुजरात के अवाम को ये याद दिलाना चाहता हूँ कि रियासत गुजरात की सूरत-ए-हाल क़्या है।

उन्होंने कहा कि बाअज़ ( कुछ) लापता हो जाने वाले बच्चों के वालदैन अपनी मुश्किलात को लेकर वज़ीर-ए-आला से रुजू करना चाहते थे लेकिन पुलिस ने उन्हें ही गिरफ़्तार करके पूछ ताछ शुरू कर दी। ऐसे लोग जो सयासी तौर पर ग़ैर मुस्तहकम हैं या उनकी ऊपर तक पहुंच है उन की रसाई वज़ीर-ए-आला तक होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

ये बात समझ में नहीं आती कि वज़ीर-ए-आला आख़िर रियासत के आवामो से इस क़दर ख़ौफ़ज़दा क्यों हैं? केशू भाई पटेल ने इस रैली का हवाला दिया जो एसोसीएशन आफ़ पैरंट्स आफ़ मिस्सिन्ग् चिल्डर्न ( Association of parents of missing childrens) की जानिब से मुनज़्ज़म ( संघठित) की गई थी लेकिन पुलिस ने उन के ख़िलाफ़ ये इस्तिदलाल ( दलील) पेश करते हुए कार्रवाई की रैली के इनइक़ाद (आयोजन) के लिए इजाज़त हासिल नहीं की गई थी।

मैं अर्सा से ये कहता आ रहा हूँ कि गुजरात में इज़हार-ए-ख़्याल की आज़ादी को सल्ब कर लिया गया है।

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