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गुजरात: जहां 2002 के बाद से मुसलमान दूसरे दर्जे का नागरिक है

27 फरवरी 2002 ही वह दिन था जिसने गुजरात को हमेशा के लिए बदल दिया. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि गोधरा में जो हुआ वह लंबे समय से धीरे—धीरे पक रहा था. उस दिन जो कुछ घटित हुआ उसने गुजरात में महीने भर तक चलने वाली उस हिंसा की शुरुआत की जिसने राज्य के डीएनए को ही दुबारा लिख दिया है.
जब पूरे गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे और राज्य की मशीनरी को मानो लकवा सा मार गया तथा पूरा देश एक बर्बर हिंसा की चपेट में हजारों लोगों का मरता देखता रहा जिसने वह सब ढहा दिया जिसे हम एक अनंत काल से चला आ रहा मान रहे थे. इस घटना के लगभग 10 माह बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जिनकी हिंदुत्ववादी नेता की साख को इससे मजबूती मिली थी कि प्रदेश में फैली हिंसा में राज्य मशीनरी की मिलीभगत थी, को महीनों तक चली अराजकता के बावजूद भारी बहुमत से फिर राज्य का मुख्यमंत्री चुन लिया गया.
उस निर्णायक जानलेवा घटना को 15 साल हो चुके हैं, और उसके बाद तो नरेंद्र मोदी अपने उस पुन: चुने जाने को मुद्दा बनाते हुए अपने राजनीतिक कैरियर को कहीं एक नई ऊँचाई दे चुके हैं. माया कोडनानी जिनको दंगों में अपनी भूमिका के लिए 28 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी वो अब मुश्किल से दो साल की सजा काटकर आजाद घूम रही हैं. दंगों में शामिल होने के एक और दोषी बाबू बजरंगी जिनको जेल की सजा सुनाई गई थी को अब तक कई-कई वजहों से इतनी बार बेल मिल चुकी है कि अब उसको उंगलियों पर नहीं गिना जा सकता.
इस बीच जाकिया जाफरी जिनके पति अहसान को दंगाइयों ने गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड के दौरान मार दिया था अब भी न्याय के लिए भटक रही हैं. अब यह एक व्यर्थ सी खोज लगने लगी है और निश्चित रूप से उनके शेष जीवन में शूल की तरह चुभती ही रहेगी.
हिंसा की चपेट में आए लोगों को किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति के अभाव के बावजूद, अब लगता है कि 2002 के गुजरात के दंगे इतिहास के पन्नों पर धकेले जा चुके हैं जिसका प्रमाण है मोदी का लगातार आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच जाना. अब जब भी दंगों का मुद्दा उठाया जाता है तो मोदी के साथ खड़े हुए लोग इसे भुलाया जा चुका बताते हुए अदालत से मिली क्लीनचिट को मोदी के मुख्यंमत्रित्व काल के दौरान हुई हिंसा के सामने रखते हैं.

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कैच को दिए एक साक्षात्कार में सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, जो कि 2002 के बाद से ही गुजरात पीड़ितों के लिए न्याय दिलाने के लिए काम कर रहे हैं, ने बताया कि क्यों हिंसा को कभी नहीं भुलाया जा सकता और क्यों मोदी गुजरात को कलंकित करने वाले के दंगों के खून के दाग से अपना दामन कभी नहीं छुड़ा सकेंगे.
सवाल-जवाब
स्वतंत्रता के बाद भारत में सांप्रदायिक दंगे कोई नई बात नहीं है. फिर 2002 के दंगे किस प्रकार से अलग हैं ?
2002 निश्चित रूप से हिंसा के एक पैटर्न का भाग है. स्वतंत्रता के बाद हुए दंगों को मैं तीन व्यापक चरणों के रूप में देखता हूं. पहला चरण दिल्ली तक आता है, जिसमें हम सापंद्रायिक हिंसा के कई बड़े-बड़े वाकये देखते हैं जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय को बड़ी क्षति पहुंची, लेकिन इसमें कुछ-कुछ नुकसान दोनों ही पक्षों को हुआ. इसके बाद दूसरे चरण में बड़े पैमाने पर सीधे-सीधे अल्पसंख्यक समुदाय का क्रूर नरसंहार देखते हैं, जिसे राज्य का लगभग खुला समर्थन रहा और जिसकी परिणति अंतत: 2002 की हिंसा के रूप में हुई.
तीसरा चरण उस हिंसा का है जिसमें मुजफ्फरनगर और कोकराझार की घटनाएं आती हैं, जहां मरने वालों की संख्या तो उतनी नहीं है लेकिन वहां लोगों का विस्थापन बहुत हुआ है और सामाजिक बंटवारे की खाई जहां अब स्थाई सी हो चुकी है.

2002 के दंगों को इन विभिन्न प्रकार के वाकयों के संदर्भ में ही देखना होगा, लेकिन कुछ और भी चीजें जो कि 2002 के दंगों को बिल्कुल अलग पंक्ति में खड़ा करता है. इसी में से एक है क्रूरता की सीमा. मैं पहले भी कई प्रकार की हिंसा से निपट चुका हूं जिसमें इंदौर में 84 के दंगों के दौरान हुई हिंसा शामिल है लेकिन मैंने कभी इस तरह की हिंसा और क्रूरता कभी नहीं देखी जिसमें महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया गया.
2002 और 1984 के दंगों में जो बातें समान हैं वह है इनमें राज्य की मिलीभगत, इसके बाद राज्य की तरफ से किसी तरह पुनर्वास के प्रयास, यहां तक कि रिलीफ कैंप तक नहीं खोलना. साथ ही इसके बाद राज्य के मुखिया द्वारा पीड़ित समुदाय के प्रति खुले तौर पर द्वैष और वैमनस्य का भाव प्रदर्शित करना और बाद में भी इसका जारी रहना.
जब मोदी से पूछा गया कि उन्होंने रिलीफ कैंपों की स्थापना क्यों नहीं कि तो उनका जवाब था कि वे बच्चे पैदा करने की फैक्ट्री नहीं खोलना चाहते थे. जिन लोगों की सहायता करने की आपकी संवैधानिक जिम्मेदारी है उनके प्रति इस तरह की घृणा का कोई दूसरा उदाहरण मुझे याद नहीं आता. यहां तक कि इस हिंसा के बाद निकाली गई गौरव यात्रा में इस हिंसा का जश्न तक मनाया गया. 2002 को यह सारी चीजें बिल्कुल अलग बनाती हैं.

सत्ता पक्ष का कहना है कि हिंसा तो प्रतिक्रियास्वरूप हुई, लेकिन इस बात के प्रमाण हैं कि इसके पीछे योजनाबद्ध उकसावा था
यह कहना कि हिंसा प्रतिक्रियास्वरूप थी इसमें समस्या है. दरअसल हमें इन दंगों को गोधरा के बाद हुए दंगे पुकारना बंद करना होगा क्योंकि ये दंगे इससे कहीं अधिक थे और इनको गोधरा के बाद के दंगे कहने से ऐसा लगता है कि ये दंगे इसके पहले हुई किसी घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप हुए थे. जबकि ऐसा है नहीं. यह विचार कि प्रतिक्रिया स्वरूप हुए दंगे नैतिक रूप से क्षमायोग्य हैं इसमें समस्या है.

लेकिन इसमें जितने व्यापक रूप से लोग शामिल थे और उनके पास जितनी तैयारी थी और ठीक—ठीक जानकारी थी और जो कि 20 से अधिक जिलों में हुआ उससे संदेह पैदा होता है. जैसे कि लोगों को पता था कि अहमदाबाद के मॉल में एक दुकान पर सोनेवाला साथी मुस्लिम है. इसके बाद आपके पास गैस सिलेंडर थे, हथियार थे, रसायन थे और लोगों को लामबंद किया हुआ था …इस तरह के तमाम प्रमाण हैं जिससे यह लगता है कि जो हिसंक घटनाक्रम हुआ वह योजनाबद्ध था.
मोदी के समर्थक कहते हैं कि कोर्ट ने उनको क्लीनचिट दे दी है, क्या उनको निर्दोष सिद्ध करने के लिए काफी है.
बिल्कुल नहीं. एसआईटी की रिपोर्ट में कई प्रकार की समस्याएं थीं जिनको सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट रघु रामचंद्रन ने कोर्ट के सामने रखा था. एसआईटी की रिपोर्ट अधिक से अधिक इतना ही कहती है कि ऐसा कोई अखंडनीय प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित होता हो कि मोदी ने इस बात के स्पष्ट निर्देश दिए कि हिंसा होने दी जाए. इस तरह का क्लीयेरेंस एक प्रकार से टेक्नीकल होता है क्योंकि इस तरह के प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता.
लेकिन जो हुआ, सरकार के जो वक्तव्य आए और यह हकीकत कि हिंसा कई सप्ताह तक चलती रही, इससे तो दूसरे ही संकेत मिलते हैं. मैं सरकार के लिए काम कर चुका हूं और यह जानता हूं कि कोई भी दंगा वह कितना ही बड़ा क्यों न हो वह कुछ घंटों से अधिक देर तक नहीं चल सकता अगर राज्य ऐसा नहीं चाहता हो.
2014 के चुनावों में हमसे बार-बार कहा गया कि 2002 के दंगे भूलकर आगे बढ़ना चाहिए. आपका इस पर क्या कहना है.
मुझे लगता है कि हमें इस तरह से भूलकर आगे बढ़ने का कोई हक नहीं है जब तक कि वे पीड़ित लोग जो हिंसा का शिकार हुए हैं, जो इसके बाद बचे हुए हैं, वे इसके लिए तैयार नहीं हों.

अब तक के अनुभव से मैं यह जानता हूं कि इस तरह की हिंसा से पीड़ित लोगों के लिए चार चीजें जरूरी होती हैं. सबसे पहली यह मानना कि गलती हुई है. दूसरा पश्चाताप. पुनर्वास और न्याय. गुजरात इस मामले में एक बिल्कुल एक्सट्रीम केस है कि इसमें न केवल ये चारों नहीं हुए राज्य के नेतृत्व ने इसके विपरीत ही काम किया है. गलती मानने के बजाय इसको तवज्जो नहीं दी गई. वास्तविक आंकड़ों को खारिज किया गया. उस समय के कैबिनेट मिनिस्टर जॉर्ज फर्नांडीस ने तो संसद में यहां तक कहा कि इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं, इसमें ऐसी क्या खास बात है.

पश्चाताप की जगह गौरव यात्रा निकाली गई जिसमें हिंसा का जश्न मनाया गया. पुनर्वास बहुत ही अधिक कम रहा, यहां तक कि सरकार ने रिलीफ कैंप तक नहीं लगाए. और न्याय अब भी धोखा बना हुआ है.
इस तरह की स्थिति में मैं नहीं समझता कि हम सब लोगों के लिए, जो कि इस हिंसा से सीधे पीड़ित नहीं हुए हैं, नैतिक रूप से यह सही होगा कि हम इसको भूलकर आगे बढ़ जाएं. जब तक कि हम जो हुआ उसको ठीक नहीं करते हैं तब तक जो जहर समाज में आ गया है वह कई रूप लेगा और फैलता रहेगा.
ज़किया जाफ़री को 15 साल बाद भी न्याय नहीं मिला है. वहीं मोदी अब भारत के प्रधानमंत्री हैं. यह सब भारत के बारे में क्या कहता है.
मुझे लगता है कि इससे स्थिति के उस सामान्यीकरण के बारे में गहरे सवाल उठते हैं जो कि किसी भी लोकतंत्र और मानवता की मूल चिंता होना चाहिए. इस सामान्यीकरण को हमने तब भी हो जाने दिया जबकि हमने रथ यात्रा में एल के आडवाणी की भूमिका भुलाकर उनको एक उदारवादी राजनेता के रूप में प्रतिष्ठित होने दिया. कांग्रेस के नेताओं के साथ भी यह हुआ है.

पर देश की मुख्य पार्टी के लिए यह सब करना मुझे लगता है कि मोदी के चुनाव के पहले कभी संभव नहीं हुआ. अभी देश की मुख्य पार्टी का नेतृत्व ऐसे हाथों में है जो कि वाजपेयी की तरह उदारता का कोई चोला भी नहीं पहने हुए है. ऐसी पार्टी को देश में बहुमत मिल जाना मुझे इसके पहले कभी संभव नहीं लगा. मैं अब भी मानता हूं कि अधिकांश भारतीय अपने रुझान में धर्मनिरपेक्ष हैं और ऐसे में मोदी का इस तरह से उभरना निश्चित रूप से धर्मनिरपेक्षता के लिए एक गंभीर चुनौती की तरह लगता है. ऐसे समय में हमें एक दूसरे से ज्यादा एकता और एकजुटता दिखाने की जरूरत है.
आपने गुजरात के एक डिफरेंट मॉडल की बात की है जिसे आप मुस्लिमों का दलितीकरण कहते हैं. विस्तार से बताएं.
2002 की हिंसा से भी डरावना है वह जो कि गुजरात में इसके बाद हुआ. हम वह हिंसा नहीं देखते जो कि वहां अब बस चुकी है, हमारा ध्यान सिर्फ उसी पर जाता है जबकि सड़कों पर खून बहे या फिर आसमान में धुआं उठता दिखे. हम वह हिंसा नहीं देखते जो लोगों के दिल और आत्मा में घृणा और भय के रूप में बस जाती है. यह वह हिंसा है जो कि मैंने सबसे सफल रूप में गुजरात में 2002 के बाद देखी है.
सामान्यत: इस प्रकार की हिंसा के बाद कुछ सामाजिक मरहम लगाने की प्रक्रिया होती है. गुजरात में ऐसा कुछ नहीं हुआ. जो घृणा सामाजिक ढांचे में भर दी गई वह केवल बढ़ती ही जा रही हे. गुजरात के मुस्लिमों ने इस भेदभाव के साये में जीना सीख लिया है. वे अब अपनी मुस्लिम पहचान को जितना अधिक हो सके उतना अधिक छिपाने की कोशिश करते हैं.

अब आप मुस्लिमों के धार्मिक सिंबल उनके रिक्शा या दुकानों पर नहीं पाएंगे. उनके नाम न्यूट्रल होने लगे हैं. दरअसल लोग अपनी धार्मिक पहचान को कई तरीके से छिपाने लगे हैं और रोज के जीवन में होने वाले भेदभाव के साथ जीना स्वीकार कर चुके हैं. यह वैसा ही जैसे दलित 2000 सालों से अधिक के भेदभाव के कारण दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह जीवन जीने के लिए मजबूर किए गए हैं.
गांवों में यह और भी स्पष्ट है. लोगों को घर छोड़ कर जाने के लिए मजबूर किया गया और उनसे कहा गया कि वे वापस नहीं लौटें. कुछ गांव तो ऐसे भी हैं जो कि गर्व सहित यह घोषणा करते हैं कि यह गांव मुस्लिमों से मुक्त हो चुका है. जिन गांवों में उनको लौट कर आने दिया गया, उनको वहां कुछ शर्तों के साथ ही आने दिया गया कि उनकी अजान की आवाज सुनाई नहीं देना चाहिए और वे धार्मिक क्रिया कलाप भी चुपचाप ही करें, आदि.
यह संविधान की भावना के विपरीत दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर जीने का सामान्यीकरण है. गुजरात की सबसे परेशान करने वाली विरासत यही है और मोदी के नेतृत्व में इस मॉडल का अब कदम दर कदम राष्ट्रीयकरण हो रहा है.

साभार:- कैच हिंदी

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